क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा साथियों, फऱीदाबाद नगर निगम चुनाव का ऐलान हो चुका है। अपना पार्षद चुनने के लिए हम लोग 2 मार्च को मतदान करेंगे। ‘जानी-मानी पार्टियों के वही जाने-माने नेता’ कब से पैसे इकट्ठे कर रहे थे कि चुनाव की घोषणा हो और वे ठगों वाली भोली सूरत बनाकर, लंबा तिलक लगाकर, हाथ जोड़कर ‘जन-सेवा का अवसर’ मांगने निकलें और अपनी लूट की कमाई से दारू और पैसे बाटें। सभी जानते हैं भाजपा-कांग्रेस के इन ‘जन-सेवकों को ‘जन-सेवा’ की चुहल मतदान से एक महीना पहले ही मचती है, और मतदान समाप्त होते ही खत्म हो जाती है। इन पार्टियों की ठगी का लंबा इतिहास है सभी जानते हैं।
‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा, फऱीदाबाद’ के अध्यक्ष, कॉमरेड नरेश इसी वार्ड 2 की मज़दूर बस्ती, आज़ाद नगर की झुग्गी नंबर 1917 में एक कारखाना मज़दूर कार्यकर्ता हरिशंकर शाह के घर पैदा हुए। कारखाने में काम करते हुए उनका हाथ प्रेस मशीन से छिता, एसटीडी-पीसीओ चलाया, वह वक़्त गुजरा तो ओला-उबर की गाड़ी चलाकर जीवन चलाया लेकिन मज़दूर कार्यकर्ता की होने अपनी जि़म्मेदारी कभी नहीं छोड़ी। साथी नरेश को मजदूर अपना पार्षद क्यों चुनें?
1) क्योंकि, उनकी जनसेवा चुनाव से जुड़ी नहीं है। चुनावों से पहले भी चलती थी और चुनाव परिणाम के भी बाद में भी चलती रहेगी। लखानी अग्निकांड, आज़ाद नगर में झुग्गी बचाओ आंदोलन, व्हर्लपूल, लखानी, वमानी समेत अनेक कंपनियों के मज़दूरों को न्याय दिलाने के आंदोलनों में अगुवा कतार में रहने वाले कामरेड नरेश को अगर आप अपना पार्षद चुनते हैं तो मज़दूरों की आवाज़ नगर निगम में भी बुलंदी से गूंजेगी। प्रशासन को मज़दूरों और मज़दूर बस्तियों के बारे में अपना रवैया बदलना पड़ेगा। 2) लखानी कंपनी ने अपने कई सौ मज़दूरों को बिना उनका हिसाब दिए दुत्कार कर काम से निकाल दिया था। उनके वेतन से कटी 1.15 करोड़ रुपये की पीएफ़ राशि भी जमा नहीं की थी। मज़दूर अपनी मेहनत का पैसा मांगने जाते तो उन्हें खदेड़ा जाता था। ‘क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा’ ने उन मज़दूरों को संगठित किया, सड़कों और श्रम अदालत में लड़े। अभी तक मजदूरों का 3 करोड़ से ज्यादा रुपया उनके खातों में जमा हो चुका है। उसी तरह वमानी के मज़दूर जिन्हें कभी बोनस नहीं मिला था, विदेशों से आने वाली प्रोत्साहन राशि नहीं मिली थी, उनके हक़ की 1 करोड़ 16 लाख रुपये भी उनके खातों में जमा हो चुके हैं। अनेक बेईमान कारखानेदारों को जो मज़दूरों का पैसा खा जाना और उन्हें जलील करना अपना हक समझते हैं, देश के क़ानूनों का पालन करना और मज़दूरों से बात करने का सलीका आपके संगठन ने ही सिखाया है। 3) 11/12 अगस्त 2022 की रात आज़ाद नगर की मासूम गुडिय़ा बस्ती में शौचालय न होने के कारण बेइंतहा दरिंदगी का शिकार हुई थी। जनाक्रोश की उसी ऊर्जा से ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ वजूद में आया। पीडि़ता को न्याय दिलाने, आज़ाद नगर बस्ती में नए शौचालय का निर्माण और सामुदायिक भवन का नवीनीकरण संगठन के नेतृत्व में मज़दूरों ने लड़कर हासिल किए हैं। डीसी को 2 लाख का चेक लेकर खुद पीडि़ता विधवा दलित महिला मज़दूर की झोंपड़ी में आना पड़ा था। सभी मज़दूर बस्तियों की तरह आज़ाद नगर को भी भाजपा सरकार अवैध बताकर तोड़ डालना चाहती है। बावजूद इसके किसी ‘अवैध’ बस्ती में नए शौचालय का निर्माण और कहीं नहीं हुआ। मज़दूरों की आवास समस्या पर आंदोलन जारी रहेगा। ‘2022 तक जहां झुग्गी वहां पक्का मकानÓ वाले मोदी के वादे का क्या हुआ? भाजपा प्रत्याशी से ज़रूर पूछना। 4) आज़ाद नगर में नगर निगम का पानी आता ही नहीं था। संगठन से जुड़े बस्ती के 500 लोग पिछले साल जुलाई महीने में पूर्व मंत्री मूलचंद शर्मा के दफ्तर को घेर कर तब तक बैठे रहे थे जब तक बस्ती से पानी सप्लाई का फ़ोन नहीं आया।
अभी भी हालांकि, पानी पर्याप्त नहीं है, मंत्री की रैनीवेल वाली कहानी भी साथ नरेश ने वहीं यमुना के किनारे जाकर चेक की थी। क्या आपने कोठियों में रहने वाले कारखानेदारों को हाथ में बाल्टी लिए पानी के लिए लड़ते-झगड़ते देखा है? ‘सुई से जहाज तक और अनाज से ताज तक’, सारा निर्माण करने वाले मेहनतकश मज़दूरों को इंसान क्यों नहीं समझा जाता?
देश में राज करने वाली भाजपा और कांग्रेस जवाब दें, क्या मजदूर टैक्स नहीं देते? साथियों याद रखिए सरकार का खजाना जीएसटी से भरता है। मज़दूर और मालिक जीएसटी का भुगतान समान दर से करते हैं। चूंकि मज़दूर और मेहनतकश किसान कुल आबादी का 95 प्रतिशत हैं इसलिए साल भर में जीएसटी की 22 लाख करोड़ की वसूली में 95 फीसदी हिस्सेदारी हमारी है। खून मज़दूरों का चूसते हो और खर्च अमीरों पर करते हो, यह अन्याय नहीं चलेगा। ”जो सरकार लोगों की मूलभूत ज़रूरतें भी पूरी न कर पाए ऐसी सरकार को उखाड़ फेंकना लोगों का अधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य बन जाता है। “शहीद-ए-आज़म भगत सिंह”
5) शासन मज़दूरों को इंसान ही नहीं मानता। ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज को ही देख लीजिए, मज़दूरों के वेतन से होने वाली मासिक कटौती की 1 लाख 88 हजार करोड़ रुपयों की भारी भरकम रक़म कार्पोरेशन के पास पड़ी होने के बावजूद यहां डॉक्टरों व अन्य स्टाफ की कमी है, बेड और दवाएं भी पर्याप्त नहीं है। मेडिकल कॉलेज को छोड़ भी दिया जाए तो ईएसआईसी की शहर भर की 14 डिस्पेंसरियां दवाओं, स्टाफ और आधारभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रही हैं। क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा ने ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मेन गेट के सामने ‘हेल्प डेस्क’ लगाकर बीमार मज़दूरों के प्रति अपनी जि़म्मेदारी निभाई है, निभा रहे हैं, जीतें या हारें, आगे भी निभाएंगे। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन द्वारा कंपनियों से मिलीभगत करके मज़दूरों के साथ किए जाने वाले घोटाले का खुलासा भी इसी संगठन ने किया है। संगठन की पहल पर ही दिल्ली मुख्यालय से यहां एक विशेष अधिकारी को नियुक्त किया गया जिसने 100 से अधिक डिफॉल्टर कंपनियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की।