डीन को मिला जवाब, ‘हम डॉक्टर हैं, चोर नहीं’ फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) आठ अगस्त 2025 से डीन का कार्यभार सम्भाल चुके डॉ. कालीदास दत्ताराय ने इस छोटे से कार्यकाल में पूरे संस्थान का हाल बेहाल कर दिया है। उनके इस छोटे से कार्यकाल में पांच जनवरी को यहां चौथी हड़ताल चल रही है। डीन बहादुर हैं कि मूर्खतापूर्ण तानाशाही रवैया छोडऩे को तैयार नहीं। करीब 250 पीजी छात्र व इतने ही सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर (एसआर) न केवल हड़ताल पर चले गए बल्कि जान कर डीन के विरुद्ध तगड़ी नारेबाजी करी। वे कह रहे थे, ‘एक दो तीन चार, नहीं सहेंगे अत्याचार’, ‘तानाशाही नही चलेगी’, ‘हम डॉक्टर हैं, चोर नहीं’, ‘डीन की बद्तमीजी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी’ हुआ यह था कि दो जनवरी को एक पीजी छात्र बीमार होने पर अपने एक साथी डॉक्टर से मल्टी विटामिन, पेरासिटामोल व सेट्राज़ीन आदि मामूली किस्म की दवाएं दो महीने के लिए लिखवा लाया। फार्मासिस्ट ने इसकी शिकायत डीन तक पहुचा दी। बस क्या था, डीन ने दवा लिखने वाले तथा दवा लेने वाले दोनों डॉक्टरों को तलब कर लिया। उन्हें बुरी तरह से हड़काया। उन पर आरोप लगाया कि वे चोर हैं और वे दवाईयां बेचते हैं। उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करा कर सीबीआई के हवाले करने के साथ-साथ कॉलेज से भी रेस्टिकेट कर दिया जाएगा। उनका कैरियर बर्बाद हो जाएगा। पहले से ही बीमार चल रहा दवा लेने वाला पीजी छात्र (डॉक्टर) इस कदर सकते में आ गया कि उसका सारा बैलेंस बिगड़ गया। रक्तचाप काबू से बाहर हो गया। उसे तुरन्त एमरजेंसी में भर्ती करना पड़ा। करीब छ:-सात घंटे बाद उसकी हालत में कुछ सुधार आया।
पीजी छात्रों व एसआर डॉक्टरों के भड़कने के लिए इतना भर काफी था। ज्यों ही कानों-कान उक्त समाचार इन लोगों तक पहुंचा तो वे सब काम छोड़ कर हड़ताल पर उतर आए। डीन तथा प्रशासन के विरुद्ध जोरदार हंगामा करते हुए नारेबाजी के साथ डीन कार्यालय की ओर बढ़ चले। हमेशा की तरह ऐसी हालत में डीन बहादुर एमएस (चिकित्सा अधिक्षक) डॉक्टर संदीप को आगे कर देते हैं। एमएस ने हड़ताली डॉक्टरों को समझाने-बुझाने एवं बहलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन डॉक्टर उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे। उनकी मांग थी कि डीन खुद आकर डॉक्टरों से माफी मांगे तथा भविष्य में इस तरह की बद्तमीजी न करने का आश्वासन दें। उनकी यह भी मांग थी कि उन्हें मेडिकल कवर दिया जाय। दिन-रात मरीजों के बीच रहने के चलते उन्हें संक्रमित होने का खतरा हमेशा बना रहता है। उनका यह भी तर्क था कि अब से पहले तक तो उन्हें यह सुविधा प्राप्त थी तथा कॉर्पोरेशन के अन्य अस्पतालों में यह सुविधा उपलब्ध है तो उन्हें इससे वंचित क्यों किया जा रहा है? जवाब में एमएस का कहना था कि यह मुख्यालय स्तर का मामला है, वे इस पर कोई फैसला नहीं ले सकते। कोई निर्णय न होने के कारण हड़ताल जारी रही।
छ: जनवरी को भी करीब आधा दिन हड़ताल जारी रही। हड़ताली डॉक्टरों को डराने के लिए अस्पताल में पुलिस को भी बुलाया गया। बेशक पुलिस के पास न तो कोई लिखित शिकायत थी और न ही डॉक्टरों के विरुद्ध कोई ऐसा आरोप था जिसमें पुलिस हस्तकक्षेप कर सकती। ऐसे में पुलिस अपनी शकल दिखा कर व हड़तालियों को अपनी मौजूदगी का एहसास करा कर चली गई। इसके चलते हड़तालियों का जो प्रोग्राम आपातकालीन सेवाएं बंद करने का था वह तो रद्द हुआ सो हुआ, हड़ताल भी वापस ले ली गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार डीन तथा हड़ताली डॉक्टरों के बीच हुई वार्ता में तय पाया गया कि किसी भी डॉक्टर के विरुद्ध कोई दण्डात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। उन्हें मेडिकल कवर दिलाने के लिए मुख्यालय से वार्ता की जाएगी। समय पर वेतन न मिलने की उनकी शिकायत को दूर करके हर महीने 10 तारीख तक उन्हें वेतन दे दिया जाएगा। इसके अलावा उनकी अन्य छोटी-मोटी मांगों पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा। यह भी तय पाया गया कि भविष्य में जब भी कोई बात होगी तो हड़ताल पर जाने की अपेक्षा तुरन्त एमएस अथवा डीन से बात-चीत की जाएगी। हड़ताली डॉक्टरों ने इस संवाददाता को यह भी बताया कि प्रशासनिक कार्यालय में बैठे बाबू लोग उनके साथ भिखारियों जैसा बर्ताव करते हैं। इन लोगों ने भिखारी समझे जाने वाले डॉक्टरों के लिए मिलने का समय दो बजे से चार बजे तक का रखा है। उन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं कि इस समय के दौरान वे किसी भी गंम्भीर कार्य में व्यस्त हो सकते हैं। देखा जाय तो डॉक्टरों को इन बाबुओं के पास जाने की अपेक्षा सीधे एमएस अथवा डीन के पास ही फरियाद करनी चाहिए और बार-बार करनी चाहिए, इतनी बार करनी चाहिए कि जब तक सम्बन्धित बाबू रास्ते पर न आ जाए।
बेशक हड़ताली डॉक्टरों ने मरीजों की भलाई को देखते हुए हड़ताल वापस ले ली, लेकिन प्रशासन को यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसने डॉक्टरों को डरा-धमका कर हड़ताल समाप्त करा दी है। हड़ताल का मुख्य कारण चिकित्सा सुविधा को लेकर बना था। सर्वविदित है कि प्रत्येक संस्थान एवं नियोक्ता का दायित्व होता है कि वह अपने कर्मचारियों को यह सुविधा उपलब्ध कराएं। यदि यह कंट्रीब्यूटरी है तो कंट्रीब्यूशन लेकर कराए। फिलहाल कॉर्पोरेशन के तमाम कर्मचारी व अधिकारी कंट्रीब्यूशन के आधार पर यह सेवा अपने ही अस्पतालों से ले रहे हैं। इस संस्थान में एमबीबीएस कोर्स करने वाले तमाम छात्रों को चिकित्सा सेवा दिए जाने का पत्र मुख्यालय द्वारा काफी समय पहले जारी किया जा चुका है। तमाम नियमित फैकल्टी तथा छोटे-बड़े बाबू कंंट्रीब्यूशन के आधार पर यह सेवा प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि पीजी कर रहे व एसआर तथा ठेके पर चल रहे फैकल्टी वालों को इस कवर से बाहर क्यों रखा गया है? इनसे भी तो कंट्रीब्यूशन लेकर यह सेवा प्रदान की जा सकती है। जब कॉर्पोरेशन इन्हें वेतन देती है तो उसी में से उतना ही कंट्रीब्यूशन काटा जा सकता है जो औरों के वेतन से काटा जा रहा है।