फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीते सप्ताह कॉर्पोरेशन द्वारा अपने अस्पतालों में की गई उथल-पुथल के बाद शनिवार 9 अगस्त को डॉ. चव्हाण कालिदास दत्तात्रेय ने यहां के मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डीन का पदभार सम्भाल लिया। वे बीते तीन साल से चेन्नई स्थित कॉर्पोरेशन के मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डीन पद पर तैनात थे। इससे पूर्व वे नासिक स्थित मेडिकल यूनीवर्सिटी में बतौर रजिस्ट्रार रह चुके थे। महाराष्ट्र के लातूर से आने वाले डॉ. चव्हाण ने फोरेंसिक मेडिसिन का अध्ययन किया है। नवनियुक्त डीन ने कार्यभार सम्भालते ही पूरे संस्थान विषेशकर अस्पताल का गम्भीर निरीक्षण किया। उन्होंने अस्पताल में जगह-जगह लगी लम्बी लाइनों पर गम्भीर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि किसी को भी चार मिनट से ज्यादा लाइन में प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। वे इसके लिए आवश्यक व्यवस्था करेंगे। उन्होंने न केवल परिसर में बल्कि अस्पताल के भीतर घूमते आवारा कुत्तों पर भी चिंता व्यक्त करते हुए इन्हें बाहर खदेडऩे के निर्देश दिए हैं। वे शीघ्र ही ऐसी व्यवस्था करेंगे कि कुत्ते परिसर में प्रवेश ही न कर सकें। अस्पताल में कुत्तों के आकर्षण का मुख्य स्रोत यहां से निकलने वाला बायो वेस्ट होता है। जिसके विधिवत निस्तारण का प्रबन्ध वे शीघ्र करने जा रहे हैं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने इस संवाददाता को बताया कि चेन्नई में भी वे एक हजार बेड का अस्पताल चलाते थे जहां सुपर स्पेशलिटी सेवाएं भी इन्होंने शुरू की थीं; वहां भी ओपीडी यहां के बराबर ही रहती है और स्टाफ यहां की अपेक्षा कम रहने के बावजूद इतनी लम्बी-लम्बी लाइनें नहीं लगतीं। वे इसी स्टाफ से बेहतर प्रबन्धन करने का प्रयास करेंगे। ऑनलाइन दवा वितरण में आने वाली समस्याओं के बारे में उनका कहना था कि यदि सर्वर डाउन होता है तो काम को रोकने की बजाय उसे ऑफ लाइन यानी कि रजिस्टर में मैनुअल एंट्री करके चलाया जाएगा। डेटा ऑपरेटरों द्वारा की जाने वाली एंट्री व्यवस्था को उन्होंने गलत ठहराते हुए बताया कि चेन्नई में खुद डॉक्टर ही ऑनलाइनन एंट्री का काम अपने हाथ से करते हैं तो यहां क्यों नहीं कर पाएंगे? उन्होंने इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि ऐसा करने से तो डॉक्टर का काफी वक्त खराब हो जाएगा जिसकी वजह से वह मरीज़ों को पूरा समय नहीं दे पाएगा।
जब इस संवाददाता ने उनके कमरे में प्रवेश किया तो वे अपने स्टाफ को भीड़ से निपटने से सम्बन्धित हिदायतें जारी कर रहे थे। उनका कहना था कि नौ बजे का मतलब है कि नौ बजे सारा काम शुरू हो जाना चाहिए। इतना ही नहीं रजिस्ट्रेशन काउंटर साढ़े आठ बजेचालू हो जाए और आठ बजे चार खिड़कियों से दवा वितरण शुरू हो जाए। नौ बजे डॉक्टर मरीजों को देखना शुरू कर दे। उन्होंने इस बात का भी कड़ा नोटिस लिया कि ओपीडी के ताले नौ बजे खुलते हैं और मरीज, जिन्हें डीन ने अपना मालिक बताया वो छह बजे से बाहर धक्के खाते रहते रहते हैं। जाहिर है कि उनका इशारा उस लेट-लतीफी की ओर था जिसमें डॉक्टर व कर्मचारीगण झूमते-झुमाते नौ बजे के बाद अपने कार्यस्थलों पर पहुंचते हैं और तब-तक मरीजों की लम्बी लाइनें लग चुकी होती हैं। अपने कुछ अधिकारियों को वे यह भी कह रहे थे कि काम को सुचारु रूप से चलाने के लिए उन्हें आधा घंटा पहले और कुछ मामलों में एक घंटा पहले आना होगा, इसके बदले वे इतना ही समय पहले छुट्टी कर सकेंगे। इससे पहले डॉ. चव्हाण ने एक सर्कुलर के द्वारा तमाम स्टाफ को आगाह कर दिया है कि समय पर बायोमेट्रिक हाजरी न लगने पर वेतन कटौती होगी। विदित है कि स्टाफ के काफी लोग समय पर नहीं आते।
विषेशकर वे डॉक्टर साहेबान जो 65 की उम्र में कहीं से सेवानिवृत होकर बतौर प्रोफेसर यहां नियुक्त होते हैं वे अक्सर समय की पाबंदी नहीं रखते। दरअसल उन्हें उनकी विशेषज्ञता एवं संस्थान को पीजी कोर्स चलाने के लिए उन्हें समय की पाबंदी से छूट दी जाती रही है। अब देखना यह है कि ऐसे विशेषज्ञ प्रोफेसर समय की पाबंदी निभाते हैं अथवा नौकरी छोड़ जाते हैं। वास्तव में प्रोफेसरों के इस कमी के पीछे भी मुख्यालय की वह नीति है कि जिसके चलते बीते 10-12 साल में भी यहां अपने प्रोफेसर पैदा नहीं पाए जिसकी वजह से सेवानिवृत लोगों को यहां उनकी शर्तों पर रखना पड़ा है। यह तो समय ही बताएगा कि डॉ. कालिदास अपने प्रयासों में कहां तक सफल हो पाते हैं और मुख्यालय उनके काम में कहां तक सहायक हो पाता है? विदित है कि ऑनलाइन का सॉफ्टवेयर कई वर्षों से गड़बड़ घोटाले में चल रहा है। सुनने में तो यहां तक आया है कि जिस कंपनी ने उसे इंस्टॉल किया है उसकी मुकदमेबाजी अभी तक कार्पाेरेशन से चल रही है। आए दिन डाउन होने वाला सर्वर जब भी काम नहीं करता तो सारे अस्पताल की गतिविधि एकदम खड़ी हो जाती है। यह भी सुनने में आता रहा है कि ऑफलाइन चलाने पर मुख्यालय कड़ा एतराज करता है। यदि डाउन होने की स्थति मेें ऑफलाइन काम करने दिया जाए तो काफी हद तक समस्या हल हो जाती है।