मज़दूर मोर्चा ब्यूरो ईएसआई कॉर्पोरेशन का गठन औद्योगिक मज़दूरों को चिकित्सा सेवाएं एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए किया गया था। इसका उद्देश्य मेडिकल कॉलेज अथवा मेडिकल शिक्षा प्रदान करना नहीं था। इसके गठन के वक्त यानी सन् 1952 में कुछ डिस्पेंसरियां खोल कर इसकी शुरूआत की गई थी। जरूरत पडऩे पर कॉर्पोरेशन अपने बीमाकृत मज़दूरों को सरकारी अस्पतालों को रेफर कर दिया करता था। उस जमाने में बड़े से बड़े सरकारी अस्पताल में भी कोई मारा-मारी नहीं रहती थी, इसलिए मज़दूरों को ज्यादा समस्या दरपेश नहीं आती थी।
समय के साथ-साथ कॉर्पोरेशन का दायरा तथा मज़दूरों की चिकित्सा सम्बन्धी जरूरतों में भारी इजा$फा होता चला गया। जनता की चिकित्सा जरूरतों को पूरा करने में असफल सरकारी अस्पतालों के मुकाबले बड़े-बड़े व्यापारिक अस्पताल इस मैदान में आ उतरे। बदले हालात के मुताबिक कॉर्पोरेशन ने भी डिस्पेंसरियों के साथ-साथ अस्पतालों का निर्माण किया। कुछ अस्पताल तो सुपरस्पेशलिटी ट्रीटमेंट के लिए भी बनाए गए। लेकिन ये सब, बाजार में मौजूद चिकित्सा व्यापारियों के मुकाबले फेल होते चले गए। इसके लिए काफी हद तक कॉर्पोरेशन अधिकारी भी जिम्मेदार रहे हैं।
धीरे-धीरे सरकार में बैठे कुछ लोगों को यह समझ आने लगा कि सुपरस्पेशलिटी एवं बेहतरीन चिकित्सा सेवा केवल मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से ही देना सम्भव हो सकता है। बेशक इस समझ का दुरुपयोग करते हुए कुछ राजनेताओं ने ये मेेडिकल कॉलेज अपने उन क्षेत्रों में भी खुलवा लिए जहां बीमाकृत मज़दूर थे ही नहीं या बहुत कम थे। लेकिन कुल मिला कर ईएसआईसी के अधिकतर मेडिकल कॉलेज काफी हद तक बीमाकृत मज़दूरों को बेहतर सेवाएं देने में सफल रहे। जो असफल भी रहे उसके लिए कॉर्पोरेशन के वे नालायक अधिकारी जिम्मेवार हैं जो मेडिकल कॉलेज खोलने की नीति के ही खिलाफ रहे हैं। अपनी इसी बदनीयती के चलते इन अधिकारियों ने मेडिकल कालेजों के काम-काज में रुकावट डालने के लिए कभी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मौलिक रूप से, किसी बड़े से बड़े अस्पताल तथा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अंतर यह होता है कि एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) द्वारा नियमित रूप से मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों का निरीक्षण किया जाता है, जबकि अन्य अस्पतालों में क्या हो रहा है, उससे एनएमसी का कोई ताल्लुक एवं नियंत्रण नहीं रहता।
एनएमसी के नियमानुसार 100 छात्रों वाले मेडिकल कॉलेज के साथ जुड़े अस्पताल में 400 बेड होने चाहिए जिनमें से कम से कम 300 बेड भरे होने चाहिए। इसके अलावा ओपीडी में 1200 मरीज़ प्रति दिन आने चाहिए। इतना ही नहीं एनएमसी निरीक्षण के दौरान प्रत्येक विभाग यानी कि मेडिसन, सर्जरी, गायनेकोलॉजी आदि-आदि को भी चेक करता है कि इनमें पर्याप्त मरीज आए या नहीं। कम आए तो क्यों? कमीशन यह भी देखता है कि आवश्यकता अनुरूप पर्याप्त फैकल्टी व अन्य स्टा$फ एवं उपकरण आदि उपलब्ध हैं या नहीं। इस तरह की कमियां पाए जाने पर कमीशन मेडिकल कॉलेज के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने की धमकी देकर उन्हें रास्ते पर लाता है। इसके विपरीत बड़े से बड़े अस्पताल को कोई पूछने वाला नहीं होता, वे जो चाहें जैसा चाहें करें।
मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा के साथ-साथ इसके पठन-पाठन में रुचि रखने वाले डॉक्टर लोग ही टिके रह पाते हैं। जबकि अन्य अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टर काम को गंभीरता से न लेकर आरामतलबी में समय गुजारते हैं, और कुछ कमाई में लगे रहते हैं। इस तरह के रुझान के पीछे उनके अस्पतालों में मौजूद अव्यवस्था भी रहती है। सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण उन्हें मरीज़ों को टेस्ट एवं जांच आदि के लिए बाहर रेफर करना पड़ता है। वहां से बिन मांगे आने वाला कमीशन उन्हें बाहर रेफर करने के लिए और अधिक प्रेरित करता है। साधारण अस्पतालों में सदैव ही डॉक्टर एवं अन्य स्टाफ की भारी कमी बनी रहती है। इसके विपरीत मेडिकल कॉलेज में प्रति वर्ष निकलने वाले 100 छात्र बतौर इंटर्न सेवा देते हैं। इसके अलावा तीसरे व चौथे वर्ष के छात्र भी काम सीखने एवं प्रेक्टिकल पढ़ाई के तौर पर डॉक्टरों का हाथ बंटाते हैं। स्नातकोत्तर (पीजी) की पढ़ाई करने वाले छात्र भी बड़ी संख्या में जूनियर रेजिडेंट (जेआर), सीनियर रेजिडेंट (एसआर) के रूप में का$फी कारगर सिद्ध होते हैं। इनकी वजह से ही मेडिकल कॉलेज अस्पताल 24 घंटे गतिमान रहता है।
साधारण अस्पताल और मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बीच के अंतर को फरीदाबाद के एनएच तीन अस्पताल के नमूने को देख कर बहुत अच्छी तरह से समझा जा सकता है। मेडिकल कॉलेज बनने से पहले यहां जो ईएसआई का अस्पताल था उसमें कुल 200 बेड थे जिनमें से करीब आधे बेड ही भरे रहते थे। ओपीडी में भी 1200-1400 मरीज़ ही प्रति दिन आते थे। डॉक्टरों की संख्या भी 30-40 से अधिक नहीं होती थी। एमरजेंसी वार्ड के 6 बेड में आधे ही भरे रह पाते थे, और अधकितर मरीजों को तुरंत सफदरजंग अस्पताल की धकेल दिया जाता था। इसके विपरीत इसी जगह पर 510 बेड के बने मेडिकल कॉलेज अस्पताल में औसतन 900 मरीज़ दाखिल रहते हैं तथा 4500 मरीज़ प्रति दिन ओपीडी में आते हैं। 30 बेड का एमरजेंसी वार्ड तथा 50 बेड का आईसीयू वार्ड फुल रहता है। हर प्रकार के डॉक्टर मिला कर 600 से ऊपर बनते हैं। अन्य स्टा$फ की संख्या देखें तो करीब दो हजार है। पुराने अस्पताल में जहां बाबा आदम के जमाने की एक्सरे मशीन से मरीजों को बहकाया जाता था वहीं अब अनेकों बेहतरीन एवं आधुनिक एक्सरे मशीनें, अल्ट्रासाउंड मशीनें, एमआरआई तथा सीटी स्कैन आदि-आदि उपकरण कार्यरत हैं।
पुराने अस्पताल में जहां दो खस्ता हाल ओटी (ऑपरेशन थियेटर) थे वहीं अब तेरह ओटी कार्यरत हैं जो कि अब कम पडऩे लगे हैं। एनएमसी के नियमानुसार सर्जरी संबंधित प्रत्येक डॉक्टर को सप्ताह मेें दो बार ऑपरेशन थियेटर में काम करना जरूरी है। गौरतलब है कि इस दौरान में बीमाकृत मज़दूरों की संख्या में कोई बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। असली बात यह है जो बढ़ोतरी हुई है वह भी मेडिकल कॉलेज की वजह से ही हुई है। पहले जहां हर छोटे-मोटे इलाज के लिए मरीज़ों को रेफरल के नाम पर खदेड़ दिया जाता था वहीं अब अधिकांश मज़दूरों का इलाज यहीं सम्पन्न हो जाता है। इसी मेडिकल कॉलेज के बदौलत कैथलैब द्वारा अनेकों मरीज़ों के हृदय वाल्व बदले जा चुके है, एंजियोग्रा$फी व एंजियोप्लास्टि के अलावा अन्य कई तरह के इलाज किये जा चुके हैं। यहां केवल डायलिसिस ही नहीं बल्कि किडनी प्रत्यारोपण भी होता है। कैंसर के मरीज़ों का इलाज भी बड़े पैमाने पर होने लगा है, जबकि पहले उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता था। आंखों के हर तरह के इलाज के अलावा कॉर्निया प्रत्यारोपण भी यहां सफलतापूर्वक किया जा रहा है।
विदित है कि कॉर्पोरेशन के नियमानुसार जो मज़दूर अपने सारे सेवाकाल में कॉर्पोरेशन को पैसा देते रहे, रिटायर होने के बाद उन्हें केवल वही चिकित्सा सेवाएं मिलेंगी जो कॉर्पोरेशन के अस्पतालों में उपलब्ध होंगी। यानी कि उन्हें कहीं बाहर रेफर नहीं किया जाएगा। मतलब स्पष्ट है कि यदि पहले वाला अस्पताल ही रहता तो ऐसे मज़दूरों को डायलिसिस, किडनी प्रत्यारोपण, कैथलैब, कैंसर,आईसीयू, विभिन्न प्रकार की रेडियोलॉजी सुविधाएं आदि नहीं मिल पाती। ऐसे लोगों के लिए ये सभी सुविधाएं अब मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध हैं। मेडिकल कॉलेज का दूसरा बड़ा लाभ न केवल ईएसआई कॉर्पोरेशन को बल्कि पूरे देश को जो होने जा रहा है वह डॉक्टरों की उपलब्धता है। अभी तक पोस्ट ग्रेजुएट डॉक्टरों की भारी कमी है उसे ईएसआई कॉपोरेशन काफी हद तक पूरा करने जा रहा है। इतना सब होने के बावजूद भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो कॉर्पाेरेशन द्वारा मेडिकल कॉलेज खोले जाने का विरोध करते हैं। कुछ ना समझ मज़दूर नेताओं की बात तो छोडि़ए कॉर्पाेशन में बैठे उच्चाधिकारियों को भी नए मेडिकल कॉलेज खोलने की बात हज़म नहीं हो पा रही है। उनकी इसी बदहजमी के चलते कुछ मेडिकल कॉलेज भयंकर दुर्दशा के शिकार हैं जिनमें से एक कॉर्पाेरेशन मुख्यालय की नाक के नीचे स्थित दिल्ली बसई दारापुर वाला मेडिकल कॉलेज भी है।
इसी जरूरत को महसूस करते हुए केंद्रीय श्रममंत्री ने दस नए मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय किया अभी तक कारपोरेशन द्वारा देश भर में चलाए जा रहे मेडिकल कॉलेजों की कुल संख्या दस मानी जा सकती है। इसमें अध चले कम चले बंद पड़े भी गिने जा सकते हैं। अभी तक इन मेडिकल कॉलेजों की दुर्दशा के पीछे कॉरपोरेशन में बैठे उन अधिकारियों की भूमिका रही है जो मेडिकल कॉलेज चलाने की नीति के घोर विरोधी रहे हैं। उनकी सोच केवल इतनी ही रही कि डिस्पेंसरी स्तर तक इलाज किया जाए और उसके बाद व्यापारी अस्पतालों या सरकारी अस्पतालों को रेफर करके पल्ला झाड़ लिया जाए। इसके परिणामस्वरूप कॉरपोरेशन में तो रुपयों का ढेर लग गया, जो आज बढ़ कर एक लाख 88 हजार करोड़ हो चुकी है। यह ढेर केवल इसलिए लगा कि चार करोड़ मजदूरों से वसूली तो नियमित होती रही लेकिन इन्हें इलाज से वंचित रखा गया।
इसी बात को समझते हुए कुछ राजनेताओं ने अपने अपने गृहक्षेत्रों में तो मेडिकल कॉलेज खुलवा कर कुछ बेहतर सेवा देने का प्रयास किया, परंतु मौजूदा श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने इस सोच को अपने गृहक्षेत्र तक न रख कर पूरे देश के लिए दस नए मेडिकल कॉलेज इसी वर्ष से चालू करने का बीड़ा उठा लिया। मंत्री जी ने बीड़ा तो उठा लिया अच्छी बात है लेकिन इसके कार्यान्वयन के लिए जो मौलिक आवश्यकताएं हैं वे नदारद नजर आती हैं। अब मंत्री जी तो दर दर भटक कर हर मेडिकल कॉलेज तो चलाने से रहे। इसके लिए मुख्यालय में जिन निष्ठावान, योग्य एवं कर्मठ अधिकारियों की जरूरत होती है वे नदारद हैं। यदि यहां बैठे अधिकारी किसी काम के होते तो बंबई के अंधेरी स्थित मेडिकल कॉलेज 2018 से आज खंडहर बना न रहता। उस वक्त वहां आग लगने के बाद से कॉरपोरेशन अधिकारियों ने उसकी सुधि लेने की कोई जरूरत नहीं समझी। मांडवीया जी ने जब इस बाबत इन अधिकारियों से पूछा तो उनका जवाब आयं बांय शांय ही था। मंत्री जी का दबाव पडऩे पर एक अधिकारी तो समय पूर्व रिटायरमेंट लेकर भाग गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बीते शनिवार 15 फरवरी को मंत्री जी खुद मुंबई के उस अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे और वहां आवश्यक दिशानिर्देश देकर लौटे, इंदौर के जिस अस्पताल को मेडिकल कॉलेज बनाने जा रहे हैं मंत्री जी उसकी हालत भी बहुत अच्छी नहीं है, वहां मेडिकल कॉलेज तो क्या अस्पताल चलाए रखना भी दूभर हो रहा है।
मेडिकल कॉलेज खोलने की नीति को लेकर मंत्री जी की सोच तो बहुत ही सराहनीय है लेकिन जिन खोटे सिक्कों के बल पर वे अपना यह सराहनीय कार्य करना चाहते हैं उनके बलबूते यह संपन्न होना अति कठिन प्रतीत होता है। जानकार बताते हैं कि जब मंत्री जी ने दस नए मेडिकल कॉलेज खोलने की बात कही तो इन निकम्मे अधिकारियों को करंट का झटका सा लगा और मंत्री जी को सुझाव दिया कि अभी दस की जगह पांच शुरू कर लो, वह भी सौ सीट की बजाय पचास सीट वाले शुरू करो। इन हालात को देखते हुए मंत्री जी को चाहिए कि शीघ्र अति शीघ्र मुख्यालय को निकम्मे अधिकारियों से मुक्त करके निष्ठावान अधिकारियों को तैनात करें और अपने लक्ष्य को दस कॉलेजों तक सीमित न रखके हर उस स्थान पर ऐसे कॉलेज खोलने का कार्यक्रम बनाएं जहां बीमाकृत मज़दूरों की संख्या पांच लाख हो।