अलवर ब्यूरो झूठ बोलकर जनता को बहकाने व लूटने में कांग्रेस वाले भी पीछे रहने को तैयार नहीं दिखते। गहलोत सरकार ने अलवर मेंं 2023 में मेडिकल कॉलेज खोला था। इस कॉलेज की विशेषता यह है कि यहां छात्रों को पढ़ाने के लिए फैकल्टी नहीं है। फैकल्टी क्या अभी मेडिकल कॉलेज की बिल्डिंग और कक्षाएं भी नहीं बने हैं। बेशक कांग्रेस के बाद भाजपा सरकार आ गई लेकिन स्थिति ज्यों की त्यों है। अब भी पढ़ाने का काम यूट्यूब के माध्यम से ऑनलाइन कराया जाता है। फीस वसूली में यह कॉलेज हरियाणा से भी एक कदम आगे है। हरियाणा में जहां आठ लाख रुपये वार्षिक फीस वसूली जाती है वहीं इस कॉलेज में मैनेजमेंट कोटे के छात्रों से नौ लाख रुपये वसूले जाते हैं।
सुधी पाठक भली-भांति जानते हैं कि लफ्फाजी करने में माहिर मोदी एवं उनके लगुए-भगुए लगातार मेडिकल कॉलेजों की संख्या एवं सीटें बढ़ाने की घोषणा करते आ रहे हैं। किसी भी कामकाजी मेडिकल कॉलेज को खोलने के लिए जो आवश्यकताएं होती हैं, उन पर होने वाले खर्च को बचाने के लिए भाजपाई सरकारें जो मेडिकल कॉलेज बना रही हैं उन्हें यदि नकली कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इस मेडिकल कॉलेज के लिए सरकार ने 2023 में सौ एकड़ जमीन अलॉट की थी। नींव रखने के साथ ही एडमिशन लेकर पढ़ाई का पाखंड किया जाने लगा। जमीन तो मिल गई लेकिन मेडिकल कॉलेज बनाने के लिए पर्याप्त बजट जारी नहीं किया गया। दो साल बीतने के बावजूद मेडिकल कॉलेज की इमारत अधूरी पड़ी है। क्लासरूम नहीं होने के कारण छात्रों को दूसरे मेडिकल कॉलेजों की कक्षाओं की रिकॉर्डिंग दिखा कर पढऩे को मजबूर किया जा रहा है। दूसरे साल के छात्रों की पढ़ाई के लिए मेडिकल कॉलेज में अस्पताल होना एक अनिवार्यता है। अस्पताल भी ऐसा कि जिसकी ओपीडी व आईपीडी मेें क्लासरूम भी हों। जब मेडिकल कॉलेज ही नहीं बना तो अस्पताल का क्या सोचना। फिलहाल दो किलोमीटर दूर स्थित 35 साल पुराने राजीव गांधी जिला अस्पताल को ही मेडिकल कॉलेज से संबद्ध किया गया है।
इसमें करीब 700 बिस्तर फुल रहते हैं, जाहिर है ऐसे में ओपीडी भी कई हजारों में होती ही होगी। इसके बावजूद यहां एमबीबीएस कोर्स में दाखिला लेने वाले छात्रों के लिए फैक्ल्टी उपलब्ध नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अस्पताल में पहले से कार्यरत डॉक्टर साहेबान अपने ऊपर फैकल्टी के नाम पर प्रोफेसरों को नियुक्त नहीं होने देना चाहते। इन डॉक्टरों की सरकार में मजबूत पकड़ के चलते मेडिकल कॉलेज को बीते दो साल से बिना फैकल्टी के ही चलाया जा रहा है और सरकार तमाशबीन बनी हुई है। सरकार तो सरकार नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) भी इस मुद्दे पर खामोश है। बीते दो साल में एनएमसी की टीमें तीन बार जांच कर चुकी हैं, हर बार कमियां पाए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई जाती है लेकिन जल्द ही काम पूरा होने का शपथपत्र देकर मामला टरका दिया जाता है।
कॉलेज की यह हालत देख कर एक छात्रा ने अपना दाखिला रद्द करा कर फीस वापस मांगी तो कॉलेज प्रबंधन ने मना कर दिया। इस मामले को लेकर छात्रा ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है। अच्छी क्वालिटी के डॉक्टर तैयार करने में जो खर्चे आते हैं उन्हें बचाने के लिए मोदी सरकार के दबाव में एनएमसी ने अपने नियमों को भी काफी ढीला कर दिया है। उसी के परिणामस्वरूप बिना फैकल्टी के ही यह मेडिकल कॉलेज चल रहा है। इतना ही नहीं फैकल्टी के नाम पर जहां उच्चतम डिग्रियों वाले प्रोफेसर तैनात किए जाने की शर्त होती थी उसको हटा कर अब डिप्लोमाधारक भी फैकल्टी बन कर छात्रों को पढ़ाने का नाटक कर सकेंगे। समझा जा सकता है कि इस तरह से पढ़ाए गए छात्र किस क्वालिटी के डॉक्टर बन पाएंगे? फरीदाबाद के छांयसा स्थित अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज का तो कहना ही क्या। यहां तीन बैच पूरे हो चुके हैं और चौथा बैच अगस्त में आ जाएगा, लेकिन अभी तक यहां अस्पताल के नाम पर 80-90 की ओपीडी तथा आईपीडी निल बटा सन्नाटा ही है यानी कि अस्पताल में कोई मरीज़ भर्ती नहीं है।
समझा जा सकता है कि बिना मरीजों को देखे यहां से जो डॉक्टर बन कर निकलेंगे वे कैसे डॉक्टर होंगे? पढ़ाने वाली फैकल्टी के नाम पर यहां मात्र एक चौथाई प्रोफेसर भी नहीं हैं। बायो केमेस्ट्री वाली फैकल्टी से मेडिसिन तथा पैथोलॉजी वाले से गायनी पढ़वाने का प्रयास किया जाता है। चिकित्सा उपकरणों के नाम पर केवल एक पुरानी एक्सरे मशीन और एक अल्ट्रा साउंड मशीन आदि के अलावा कुछ नहीं है।