फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सत्ता का विरोध करने वालों को कैसे पालतू बनाकर अपनी चाटुकारिता कराई जाती है यह काम संघ भाजपा बाखूबी जानती है। हाल ही में पार्षद मनोनीत किए गए जसवंत पंवार सैनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हालांकि जसवंत के मामले में बात यहीं नहीं रुकती उसे यह बिना हड्डी वाला पद कृष्णपाल गूजर के खिलाफ हथियार बनने के लिए दिया गया बताया जा रहा है। जसवंत पंवार को पार्षद मनोनीत किए जाने को राजनीतिक जानकार केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर और कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल की लंबे समय से चली आ रही राजनीति रंजिश के दांव पेंच के रूप में देख रहे हैं। बताया जाता है कि जसवंत पंवार पहले कृष्णपाल गूजर खेमे में थे और उनके लिए प्रचार से लेकर वोटों का जुगाड़ करते थे लेकिन वो सत्ता की मलाई चाटने की जिस नीयत से गूजर से जुड़े थे वह कभी उन्हें हासिल नहीं हुई। फरीदाबाद की राजनीति में भाजपा के वट वृक्ष कहे जाने वाले कृष्णपाल गूजर की छत्रछाया में जब विपुल गोयल जैसी धनबेल नहीं पनप सकी तो जसवंत पंवार जैसी घास फूस की क्या औकात थी।
कुछ पाने के लिए छटपटा रहे जसवंत ने आखिरकार पाला बदला और विपुल गोयल के खेमे में आ गए। बताया जा रहा है कि विपुल ने मियां की जूती मियां के सर वाली कहावत चरितार्थ करते हुए लोकसभा चुनाव में जसवंत को गूजर के खिलाफ प्रचार करने में लगाकर गूजर से बदला लिया। बताया जाता है कि पंवार ने गूजर के काफी वोट कटवाए भी लेकिन चुनाव आयोग की मेहरबानी से गूजर एक बार फिर जनता के चुने हुए सांसद बन गए।
विधानसभा चुनाव में पंवार ने विपुल गोयल के कार्यकर्ता के रूप में मेहनत की और उन्हें भी जीत हासिल हुई। जैसा कि संघ-भाजपा की कार्यशैली है काम होने के बाद जसवंत फिर से साधारण कार्यकर्ता की हैसियत में आ गए। इतनी मेहनत के बाद भी सत्ता की मलाई नहीं मिलने से जसवंत खुद को ठगा महसूस कर रहे थे। इस बीच प्रदेश में कांग्रेस संगठन को फिर से खड़ा किया जाने लगा। यहां मुकाम पाने के लिए जसवंत ने सरकार की जनविरोधी नीतियों की सार्वजनिक मंचों से आलोचना शुरू कर दी। राहुल गांधी और कांग्रेस की बड़ाई शुरू कर दी। कांग्रेस में तो उनकी दाल क्या गलनी थी लेकिन विपुल गोयल ने उनके गले में पट्टा डाल कर राजनीतिक विरोधी कृष्णपाल गूजर के खिलाफ गुर्राने वाला वफादार बना डाला। राजनीतिक जानकारों के अनुसार मनोनीत पार्षद को न तो कोई वित्तीय अधिकार होते हैं और न ही प्रशासनिक। वे केवल सदन की बैठक में भाग ले सकते हैं, सुझाव दे सकते हैं लेकिन कोई विकास कार्य नहीं करा सकते। जसवंत को यह पद देकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेर दिया गया है, अब वो सरकार की आलोचना नहीं कर पाएंगे, नगर निगम के घोटालों, गंदगी, पेयजल समस्या आदि की सार्वजनिक रूप से आलोचना नहीं कर पाएंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जवसंत पंवार की पहचान सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कहीं ज्यादा थी, यह पद लेकर उन्होंनें अपना कद खुद ही छोटा कर लिया है।
मनु स्मृति को अपना संविधान मानने वाली सवर्ण पोषक संघ-भाजपा के संगठन में कहने को तो ओबीसी और दलित सभी को स्थान दिया जाता है लेकिन ये बेचारे केवल दरी उठाने, नारे लगाने, भीड़ बनने से ज्यादा कुछ नहीं होते। अपना मुकाम बनाने के लिए जमकर मेहनत करने वाले पिछड़े वर्ग के कार्यकर्ताओं को या तो दोयम दर्जे के पद देकर उसकी महत्वाकांक्षा को मार दिया जाता है, यदि इस पर भी उसकी कारगुजारियां जारी रहीं तो उसे हाशिए पर पहुंचा दिया जाता है। यही काम कभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल होने वाले जसवंत पंवार सैनी के साथ हुआ। छात्र राजनीति में उन्होंने एबीवीपी का खूब डंडा-झंडा उठाया और शहर का बड़ा छात्रनेता बनने के लिए कभी बढ़ी फीस, तो कभी अन्य मुद्दों पर छोटे मोटे आंदोलन किए। नतीजा यह हुआ कि उन्हें एबीवीपी का जिला संयोजक जैसा भारी भरकम नाम लेकिन ऊपर वालों के हुक्म को बजा लाने वाला पद सौंपा गया। सत्ता में भागेदारी की महत्वाकांक्षा के चलते केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर की चाकरी भी खूब की लेकिन कार्यकर्ता से अधिक कुछ नहीं बन पाए। खुद की छवि को समाज में जिंदा रखने के लिए युवा आगाज संगठन और सांसें नामक एनजीओ बना कर कुछ न कुछ जरूर करते रहे।