एसबीआई लॉकर से करोड़ों के जेवर गायब, बैंक जिम्मेवारी से भाग रहा, पुलिस निष्क्रिय

एसबीआई लॉकर से करोड़ों के जेवर गायब, बैंक जिम्मेवारी से भाग रहा, पुलिस निष्क्रिय
February 14 06:15 2026

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) स्टेट बैंक ऑफ इन्डिया (एसबीआई) की सेक्टर 15 स्थित ब्रांच में डीसी गर्ग का खाता व एक लॉकर वर्ष 2014 से है। दिनांक 30 जनवरी को उनकी पत्नी मोनिका गर्ग जब अपने लॉकर से कुछ जेवरात निकालने गईं तो उन्हें बताया गया कि उनका तो यहां लॉकर ही नहीं है। जब उन्होंने लॉकर की चाबी दिखाई तो बैंक कर्मी कुछ हैरान होते हुए उन्हें उनके लॉकर तक ले गए। मोनिका गर्ग के पास जो चाबी थी वह उसमें नहीं लग पाई। बैंक वालों ने यह भी बताया कि उनका लॉकर 29 अगस्त 2025 से विशाल चौहान के नाम पर है जो कि एसबीआई सेक्टर 14 ब्रांच का कर्मचारी है। चौहान को बुलाया तो उनकी चाबी से लॉकर खुल गया।

यह सब देख कर मोनिका गर्ग के तो होश उड़ गए, उनके मुताबिक लॉकर में उन्होंने करीब सवा किलो सोने व तीन किलो चांदी के जेवरात के अलावा अन्य कई महत्वपूर्ण चीजें रखी हुई थीं। बैंक वालों का कहना है कि उन्होंने इस लॉकर को अनऑपरेटेड मान कर दिनांक 20 मार्च 2025 को इसे अन्य 19 लॉकरों के साथ तोड़ा था। उनका यह भी कहना है डीसी गर्ग का लॉकर अंतिम बार अक्तूबर 2022 में ऑपरेट हुआ था, जबकि गर्ग का कहना है कि उन्होंने मई 2024 को अपना लॉकर ऑपरेट किया था। इस मामले में बैंक वाले बताते हंै कि जब भी कोई लॉकर ऑपरेट होता है तो कम्प्यूटराइज मैसेज खाताधारक को स्वत: चला जाता है जिसमें उन्हें बताया जाता है कि उनका लॉकर किस तारीख को, कितने बजे ऑपरेट हुआ है, यदि आपने नहीं किया तो तुरंत बैंक से सम्पर्क करें। इस प्रक्रिया के लिए लैम्प नामक ऐप का इस्तेमाल किया जाता है। बैंक ने अपनी उक्त कार्रवाई खाताधारक की ओर से कोई जवाब न मिलने पर की थी।

डीसी गर्ग बैंक नियमों का हवाला देते हुए कहते हैं कि कोई भी लॉकर तोडऩे से पहले बैंक द्वारा खाताधारक को बाकायदा लिखित नोटिस जारी करने होते हैं। इतना ही नहीं, अच्छे बैंकर व्यक्तिगत रूप से भी अपने ग्राहक को इसकी सूचना देने के बाद ही इस प्रक्रिया की ओर बढ़ते हैं। गर्ग के अनुसार उनकी पासबुक से लॉकर का किराया 31 मार्च 2024 तक कटा है। उसके बाद किराया न कटने का कारण बैंक वाले यह बताते हैं कि उनके सिस्टम से ही गर्ग का लॉकर गायब हो गया। गायब कर दिया गया अथवा किसी तकनीकी खराबी से गायब हुआ यह नहीं कहा जा सकता। इस पर बैंक वाले यह भी कहते हैं कि जब 2025 व 2026 का किराया उनके खाते से नहीं कटा तो उनको भी सचेत हो जाना चाहिए था। इस किराए की रकम 2318 रुपए वार्षिक बताई गई है।

लॉकर तोडऩे की प्रक्रिया के दौरान बैंक के किसी जिम्मेदार अधिकारी का मौके पर रहना व कोई माल बरामद होने पर उसका पंचनामा करना अनिवार्य होता है, जो बैंक ने नहीं किया। लॉकर तोडऩे की व्यवस्था के अनुसार उसी कम्पनी के अधिकृत एजेंट को बुलाया जाता है जिसके लॉकर वहां लगे हैं। देश भर में गोदरेज व स्टीलेज कम्पनी के लॉकर ही लगे हुए हैं। स्टीलेज कम्पनी का नाम बदल कर अब गुनीबो हो गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बैंक वालों ने गोदरेज कम्पनी के एक लॉकर को तोडऩे के लिए उसके अधिकृत एजेंट नीरज, जिसकी फर्म का नाम विश्वाम इंटरप्राइजेज है को बुलाया था।

तत्कालीन बैंक मैनेजर प्रीति कटारिया ने एक लॉकर तोडऩे के साथ-साथ नीरज को 19 अन्य तोडऩे का भी आदेश दे दिया। इन्हीं में से एक लॉकर डीसी गर्ग का भी था जो गुनीबो कम्पनी का था। बताया जाता है कि एक लॉकर तोडऩे में 20-30 मिनट तक का समय लग सकता है। जाहिर है ऐसे में लॉकर तोडऩे वाला नीरज बैंक खुलने के समय प्रात: 10 बजे से शाम के पांच बजे तक इस काम पर लगा रहा होगा। मैनेजर प्रीति के अनुसार इस प्रक्रिया के दौरान न तो वह खुद लॉकर रूम में रही और न ही किसी कर्मचारी को वहां तैनात किया। इसके अलावा पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी करने का भी कोई इंतजाम नहीं किया गया था। और तो और काम पूरा करके जाते वक्त नीरज के झोले की भी तलाशी लेने की किसी ने जरूरत नहीं समझी।

पूरे मामले की सूचना 30 तारीख को ही बैंक के सामने मौजूद पुलिस चौकी को दे दी गई थी। इस पर एसएचओ सेंट्रल व अन्य उच्च पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे। प्रारंभिक पूछताछ के बाद मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया और दो फरवरी को बाकायदा बीएनएस की धारा 316 (5) यानी अमानत में $खयानत और 61 यानी षणयंत्र रचने के तहत मुकदमा नम्बर 18 थाना सेन्ट्रल में दर्ज कर दिया गया। क्राइम ब्रांच से मिली जानकारी के अनुसार उनकी जांच पड़ताल अभी जारी है लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके, डीसीपी क्राइम मुकेश मल्होत्रा स्वयं केस की जांच कर रहे हैं। गौरतलब है कि पीडि़त गर्ग ने अपना कीमती सामान इसी मैनेजर अथवा कर्मचारी के भरोसे पर न रख कर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के भरोसे पर रखा था। उनके इस भरोसे को तोडऩे का पूरा दायित्व भारत के इस सबसे बड़े सरकारी बैंक पर जाता है। कायदे से तो बैंक को अपनी गलती अथवा मूर्खता या लापरवाही स्वीकार करते हुए गर्ग का पूरा नुकसान का पूरा हर्जाना देना चाहिए और चाहे तो अंदरूनी स्तर पर जांच करके जिम्मेवार अधिकारियों पर जैसी भी कार्रवाई करना चाहे करे।

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Mazdoor Morcha
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