फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीके अस्पताल में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड पर चलाए जा रहे हार्ट सेंटर में बीपीएल, आयुष्मान, प्रदेश सरकार के कर्मचारी, अनुसूचित जाति जैसे लाभार्थियों को इलाज के नाम पर लूटा जा रहा था। लाभार्थियों से तो इलाज की कीमत वसूली ही जाती, और सरकार से भी बिल देकर भुगतान लिया जाता। एंटी करप्शन ब्यूरो ने इस तरह के करीब चालीस मामले पकडऩे के बाद केस दर्ज किया है। यह तो होना ही था, जब सरकार अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सेवाओं को मुनाफाखोरी के फार्मूले यानी पीपीपी मोड के रहमोकरम पर छोड़ेगी तो परिणाम लूट कमाई ही आने थे। एफआईआर तो ठेका कंपनी मैडिट्रिना हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड, कोल्लम (केरल) के खिलाफ हुई है लेकिन ईमानदारी से जांच की गई तो पीएमओ से लेकर सीएमओ और बिल पास करने वाली कमेटी के सदस्य भी इस लूट कमाई में संलिप्त पाए जाएंगे।
पूंजीपतियों के हिमायती मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने और संघी खट्टर के हरियाणा में सीएम बनने के साथ ही भाजपा की डबल इंजन सरकारों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, जैसी आधारभूत जन कल्याणकारी सेवाओं में कटौती शुरू कर दी थी। स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर करने का ढिंढोरा पीट कर हृदय रोग, गुर्दा रोग जैसे महत्वपूर्ण बीमारियों का इलाज पीपीपी मोड के हवाले कर दिया गया। 27 फरवरी 2018 को तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने बीके अस्पताल में पीपीपी मोड पर हार्ट सेंटर का उद्घाटन करते हुए सरकार के इस कदम के क़सीदे गढ़े थे, उनका दावा था कि सरकार के इस मॉडल के स्वास्थ्य सेवाओं में दूरगामी परिणाम आएंगे।
अभी तक जिन हृदय रोगियों को महज पांच रुपये के पर्चे पर एक महीने तक परामर्श उपलब्ध होता था अब केवल पंद्रह दिन के लिए 116 रुपये की पर्ची कटने लगी। पचास रुपये की ईसीजी के लिए दो सौ रुपये और दो सौ की ईको जांच के लिए अब 982 रुपये चुकाने पड़ते। ये लूट तो सरकार की मर्जी से हो रही थी। मेडिट्रिना के लालची डॉक्टरों ने इस्तेमाल शुदा चिकित्सकीय वस्तुओं का इस्तेमाल कर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किया। एंजियोप्लास्टी में इस्तेमाल किए गए वायर और बलून दूसरे हृदयरोगी की एंजियोप्लास्टी में भी उपयोग किए गए। एसीबी जांच में इस तरह के 39 केस की पुष्टि हुई है, सौ हृदयरोगियों की मौत होना भी बताया जा रहा है। इस्तेमाल शुदा उपकरणों के अलावा मुफ़्त इलाज के अधिकारी मरीजों से उपचार की कीमत वसूली गई और सरकार से भी भुगतान लिया गया। केवल 2018-19 में ही इस तरह के 39 मरीज़ों के इलाज के नाम पर सरकार से 34 लाख 45 हजार 672 रुपये का भुगतान लिया गया, इनका रिकॉर्ड गायब है। इसी तरह आठ मरीजों के उपचार मेें लगने वाले नए उपकरणों के लिए सरकार से 8 लाख 38 हज़ार 81 रुपये वसूले जबकि 4 लाख 17 हजार 768 रुपये के उपकरणों को अवैध रूप से दोबारा इस्तेमाल कर बिल का रुपया डकारा गया। यह करतूत केवल एक से डेढ़ साल की हैं, यदि हार्ट सेंटर की फरवरी 2018 से लेकर आज तक की कारगुजारी जांची जाए तो करोड़ों रुपयों का घोटाला पकड़ में आएगा।
हार्ट सेंटर को यह सारा भुगतान बीके अस्पताल में गठित जांच कमेटी द्वारा सभी दस्तोवजों की जांच करने के बाद उसकी संस्तुति से किया जाता है। प्रतिवर्ष लाखों की लूट कमाई का यह खेल हार्ट सेंटर प्रबंधन बिना जांच कमेटी की मिलीभगत और पीएमओ-सीएमओं की सहमति के नहीं चला सकता। एक साल में 39 मरीजों के इलाज का करीब 35 लाख रुपये भुगतान किया जाना, इस्तेमाल शुदा उपकरणों का दोबारा इस्तेमाल कर लाखों रुपये हड़पने, लाभार्थियों से भी इलाज के नाम पर करीब पौने तीन लाख रुपये जांच कमेटी और पीएमओ-सीएमओ की सहमति के बिना मुमकिन नहीं हैं। जैसे जैसे जांच आगे बढ़ेगी इसमें बड़ी मछलियां भी फंसती नजऱ आएंगी।
पीपीपी मोड पर स्वास्थ्य सेवाएं देने की सच्चाई बीके अस्पताल में सामने आ चुकी है। ईएसआइसी मुख्यालय में बैठे निकम्मे अधिकारी भी एनएच तीन ईएसआई मेडिकल कॉलेज में यही पीपीपी मोड लागू करवाना चाहते थे। भला हो पूर्व डीन डॉ. असीम दास का कि उन्होंने इन मूर्ख अधिकारियों की नहीं चलने दी और अपने दम पर कैथ लैब व रेडियोलॉजी विभाग शुरू करवा दिया। अन्यथा यहां भी मज़दूरों का शोषण शुरू हो जाता। डायलिसिस विभाग और आईसीयू तो पीपीपी मोड पर दे भी दिया था लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं करने वाले डॉ. दास के कारण निकम्मे कर्मचारी भाग खड़े हुए थे।