फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सन 1951 में निर्मित बादशाह खान अस्पताल की बिल्डिंग को 90 के दशक में जर्जर घोषित करके खाली कर दिया गया था। कायदे से तो इस जर्जर बिल्डिंग को उसी वक्त ध्वस्त करके अस्पताल का विस्तार कर देना चाहिए था। लेकिन समय-समय पर आई सरकारों की काहिली के चलते यह बिल्डिंग अभी तक बेशकीमती ज़मीन घेरे खड़ी है। अब कहा जा रहा है कि इसे गिरा कर यहां मातृत्व शिशु स्वास्थ्य इकाई का निर्माण करना है। लेकिन सरकारी काहिली में मददगार बन गए हैं 280 पेड़ जो इस पुरानी बिल्डिंग को तोडऩे नहीं दे रहे हैं। इसके लिए वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है। लगता है वन विभाग हरियाणा सरकार का न होकर विलायत सरकार का अधीन हो।
दूसरी बात यह समझ नहीं आ रही कि बनी-बनाई बिल्डिंग में यकायक इतने सारे पेड़ कैसे उग गए? और ये पेड़ इसे तोडऩे में कैसे रुकावट दे रहे हैं? पुरानी बिल्डिंग तोडऩे के बाद नई बिल्डिंग बनाने के लिए तो कोई पेड़ कुछ रुकावट दे सकते हैं लेकिन तोडऩे में बिल्कुल नहीं। दरअसल जिस ठेकेदार को तोडऩे का ठेका दिया गया है उसे बिल्डिंग के आसपास खड़े पेड़ों के बीच से काम करने में कुछ असुविधा हो सकती है। ऐसे में यदि ये पेड़ कट जाने की अनुमति मिल जाए तो काम में सुविधा के साथ-साथ वृक्षों की कीमती लकड़ी बेचने से जो आमदनी होगी वो अलग से।
रही बात हरियाणा सरकार की नीयत की, तो उसकी भी इस प्रस्तावित इमारत के निर्माण में कोई बहुत ज्यादा रुचि नहीं है। थोड़ी-बहुत रुचि है भी तो वह केवल भवन निर्माण तक ही सीमित है जिसे बनाने की कोई जल्दी नहीं है। फिलहाल इसके लिए 161 करोड़ का बजट रखा बताया जाता है, जितना देर से शुरू करेंगे उतना ही बजट बढ़ता जाएगा। बिल्डिंग बनाने के बाद उसमें सुचारु रूप से मातृ एवं शिशु को सुविधा देने के लिए आवश्यक स्टाफ आदि उपलब्ध कराने की कोई मंशा सरकार की नहीं है। सरकार की मंशा न केवल बीके अस्पताल में बल्कि तमाम हैल्थ सेंटरों में खाली पड़े पदों से समझी जा सकती है। यदि वास्तव में ही सरकार अपने नागरिकों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना चाहती है तो सभी रिक्त पदों को भरने के साथ-साथ आवश्यक उपकरणों एवं दवाओं आदि की सप्लाई सुनिश्चित करे।