बाँड के नाम पर वेतन से पचास हजार मासिक की कटौती

बाँड के नाम पर वेतन से पचास हजार मासिक की कटौती
August 18 17:33 2024

ईएसआई मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टर आन्दोलन के लिये हुए मजबूर

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एनएच तीन स्थित ईएसआई कॉर्पोरेशन मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कार्यरत 170 जूनियर डॉक्टर बीते एक सप्ताह से कॉर्पोरेशन की दादागीरी के विरुद्ध आंदोलनरत हैं।

एमबीबीएस करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) करने के लिये यहां 170 छात्र हैं। पढ़ाई के साथ-साथ ये छात्र अपने प्रोफेसरों के दिशा निर्देशन में मरीज़ों का इलाज भी करते हैं। पढ़ाई और मरीजों का इलाज करने के चलते इनके काम का समय अत्यधिक लम्बा रहता है। इन्हें सारा समय ओपीडी, ऑपरेशन थियेटर तथा वार्डों में काम करने के साथ-साथ पढ़ाई भी करनी होती है। ऐसे में इन्हें 36-36 घंटों तक भी काम पर रहना पड़ जाता है। ऐसे में समझा जा सकता है कि ये लोग किसी भी अस्पताल के लिये कितने महत्वपूर्ण होते हैं।

इतने महत्वपूर्ण एवं उच्च प्रशिक्षित लोगों का भी हड़ताल एवं प्रदर्शन के लिये मजबूर होना गम्भीर चिंता का विषय है। इसके कारणों को समझने के लिये इस संवाददाता ने पीजी छात्र एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. मोहित से उनका पक्ष जानने के लिये मुलाकात की। जैसा कि ‘मज़दूर मोर्चा लम्बे समय से लिखता आ रहा है कि कॉर्पोरेशन मुख्यालय में बैठे जिन मूर्ख लोगों के हाथ में मेडिकल कॉलेज चलाने का दायित्व है, वे कतई भी इसके योग्य नहीं हैं। अपनी मूर्खता का परिचय देते हुए मुख्यालय ने पीजी में दाखिला लेने वाले छात्रों के लिये जो बॉन्ड बनाया है उसकी भाषा को पढऩे से ही उनकी फितरत सामने आ जाती है।

तीन साल तक चलने वाले पीजी कोर्स के दूसरे वर्ष में पांच लाख तथा तीसरे वर्ष में अतिरिक्त पांच लाख का बॉन्ड छात्रों से भरवाया जाता है। कुल मिलाकर यह रकम दस लाख हो जाती है। इसके अनुसार कोर्स पूरा करने के बाद इन्हें दो साल तक ईएसआई अस्पतालों में नौकरी करनी पड़ेगी। बॉन्ड की रकम पर 13 प्रतिशत ब्याज भी वसूला जायेगा। यहां तक तो बात समझ में आती है कि ईएसआईसी की नौकरी न करने वालों से यह रकम वसूली जाए। लेकिन यह समझ में नहीं आता कि दूसरे वर्ष के छात्रों को मिलने वाले वेतन में से ही बॉन्ड के नाम पर 50 हजार रुपये मासिक काटने शुरू कर दिये जाएं। ऐसा गजब का बॉन्ड तो केवल कॉर्पोरेशन मुख्यालय में बैठे मूर्ख ही बना सकते हैं।

इससे भी गजब की बात डॉ. मोहित ने यह बताई कि वह हरियाणा सरकार द्वारा संचालित ईएसआई डिस्पेंसरी गुडग़ांव में दो साल से बतौर मेडिकल ऑफिसर काम कर रहे थे। हरियाणा सरकार ने उनसे 35 लाख का बॉन्ड लेकर पीजी करने यहां भेजा है। इसका अर्थ यह है कि यदि वे पांच साल तक हरियाणा सरकार की नौकरी नहीं करेंगे तो उन्हें 35 लाख रुपये अदा करने होंगे। सुधी पाठक मुख्यालय की मूर्खता का स्तर स्वत: समझ गए होंगे कि जो व्यक्ति 35 लाख का बॉन्ड हरियाणा सरकार को देकर आया हो उसके ऊपर कॉर्पोरेशन अपना बॉन्ड लाद कर उसके वेतन से 50 हजार मासिक काट रहा हो। इतना ही नहीं हरियाणा सरकार के सिविल अस्पतालों से आने वाले पीजी छात्रों से कॉर्पोरेशन द्वारा बॉड लेने की कोई नीति नहीं है।

पीजी प्रथम वर्ष में इन छात्रों को करीब एक लाख 15 हजार मासिक वेतन महंगाई भत्ते सहित मिलता है विदित है कि केन्द्र व हरियाणा सरकार अपने तमाम कर्मचारियों को प्रत्येक जनवरी व जुलाई में महंगाई-भत्ता देने की घोषणा तो करती है जिसकी अदायगी दो-तीन महीने बाद एरियर सहित हो जाती है।

कॉर्पोरेशन के अधिकारी अपने तमाम स्टाफ को तो एरियर सहित महंगाई-भत्ते की अदायगी करते हैं लेकिन पीजी छात्रों का दो-चार महीने का एरियर डकार जाते हैंं। महंगाई-भत्ते की इस बेइमानी को रोकने के साथ-साथ इन डॉक्टरों की मांग यह भी है कि दूसरे व तीसरे वर्ष में इनके मूल वेतन में तीन व छ: प्रतिशत की वृद्धि की जाए। अत्यधिक काम के घंटे होने के चलते इनकी मांग है कि कॉलेज परिसर में ही हॉस्टल की व्यवस्था होनी चाहिये। यद्यपि हॉस्टल न होने के बदले इन्हें 18 हजार मासिक तक हाउस रेंट मिलता है, इसके बावजूद ये लोग समय की बचत तथा सुरक्षा की दृष्टि से कॉलेज परिसर में ही रहना पसंद करते हैं। विदित है कि कॉर्पोरेशन मुख्यालय की अदूरदर्शिता के चलते करीब 500 छात्रों को परिसर से बाहर रहना पड़ता है। हॉस्टल की कमी बीते चार साल से महसूस की जा रही है। संसाधनों की कोई कमी न होने के बावजूद अतिरिक्त हॉस्टल का निर्माण नहीं कराया जा रहा। इसके चलते कॉर्पोरेशन करोड़ों रुपये किराये के हॉस्टलों व बसों पर खर्च कर रहा है। इन मुख्य मांगों के अलावा मोहित के अनुसार यहां काफी प्रशासनिक खामियां हैं जिन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है। पहली बात तो यह है कि दफ्तरी बाबूओं को डॉक्टरों का हुक्मरां (बॉस) बनने से रोका जाए। डॉक्टर लोग जब भी संस्थान के दफ्तरों में किसी काम से जाते हैं तो कुर्सी पर बैठे बाबू उन्हें डॉक्टर न समझ कर उस आम आदमी की तरह समझते हैं जो उनकी दया पर निर्भर हो। परिसर में मौजूद हॉस्टलों के वार्डन वरिष्ठ डॉक्टर होने चाहिए न कि ये दफ्तरी बाबू।

पीजी छात्र क्योंकि रात-दिन काम पर रहते हैं तो इनके लिये कैन्टीन की उचित व्यवस्था होनी चाहिये जहां ये लोग वक्त-बेवक्त, बिना समय बर्बाद किये खा-पी सकें।
इस मामले को लेकर संस्थान के डीन डॉ. एके पांडे से बातचीत करने पर उन्होंने बताया कि जो मसले उनके स्तर के हैं उन्हें वे तुरन्त सुलझा देंगे। शेष के लिये वे मुख्यालय में इन डॉक्टरों की पैरवी करेंगे। फिलहाल उन्होंने बॉन्ड के नाम पर वेतन से होने वाली 50 हजार रुपये की कटौती स्थगित कर दी है तथा कट चुकी रकम के लिये मुख्यालय से वार्ता की जा रही है। संदर्भवश यह जान लेना भी जरूरी है कि नेशनल मेडिकल कमीशन एनएमसी ने बाकायदा हिदायत जारी की हुई है कि मेडिकल छात्रों से किसी भी प्रकार के बॉंड न लिए जाएं। इसके पीछे तर्क यह है कि आज एक वेकैंसी के लिए दर्जनों आवेदक आ खड़े होते हैं यानी कि सरकार यदि चाहे तो किसी भी पोस्ट के लिए डॉक्टरों की कोई कमी नहीं है! जब कमी ही नहीं है तो ये बॉंड का ड्रामा क्यों? बल्कि सरकारों के ऊपर ये उल्टा बॉंड होना चाहिए कि वेे हर पास आउट होने वाले डॉक्टर को तुरंत नौकरी पर रखेंगी।

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Mazdoor Morcha
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