तौसीफ कुरैशी आरएसएस के द्वारा मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचकर उस सरकार को जनता की नजर में इतना बड़ा भ्रष्टाचारी घोषित किया गया जितना कि वह भी नहीं जबकि सच्चाई ये नहीं थी मनमोहन सिंह सरकार देश के लिए हर एतबार से बेहतर साबित रही ये बात बाद में साफ हो गई थी उन पर लगे आरोप कोर्ट में सिद्ध नहीं हुए लेकिन सत्ता हथियाने का उनका षड्यंत्र तो कामयाब हो गया था जो अभी तक जारी है जनता को ऐसे ही सब्जबाग दिखा दिए गए थे जैसे पूरे देश की जनता मोदी के सत्ता में आते ही मालामाल हो जाएगी और देश की सभी सम्स्याओं का समाधान भी हो जाएगा। ऐसा माहौल बना दिया गया था जबकि सच्चाई कुछ और थी सब्जबाग दिखा कर सत्ता हथियानी थी उसमें वह सफल रहे जनता को क्या मिला बाबाजी का ठुल्लू। 2014 में जब नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आए तो पूरे देश में उम्मीदों की लहर थी। “अच्छे दिन” का नारा हर घर तक पहुंच गया था। जनता को विश्वास था कि भ्रष्टाचार खत्म होगा, रोजगार बढ़ेगा, किसानों की आय दोगुनी होगी और देश में पारदर्शिता आएगी। लेकिन 2025 तक का सफर तय करते हुए आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो तस्वीर का एक बड़ा हिस्सा उम्मीदों के उलट दिखाई देता है। अदानी और अंबानी के अलावा हम दो हमारे दो ही नजर आए बाकी सब वादों की चमक में सच्चाई के अंधेरे में खोए-खोए नजर आते हैं उसी सच्चाई के अंधेरे से कुछ लिखने की कोशिश की गई है।
नोटबंदी का झटका, न कि सुधार 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री ने अचानक रात 8 बजे घोषणा की कि 500 और 1000 रुपये के नोट बंद किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य बताया गया काला धन खत्म करना, आतंकवाद की फंडिंग रोकना और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना। लेकिन क्या ये उद्देश्य पूरे हुए ? रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट खुद गवाही देती है कि बंद की गई लगभग सारी मुद्रा 99.3 प्रतिशत बैंकिंग सिस्टम में लौट आई। यानी काला धन न तो खत्म हुआ, न ही नकली नोटों पर लगाम लगी। आतंकवाद की घटनाएं भी बंद नहीं हुईं; उलटे जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में आतंकी वारदातें अभी भी हो रहीं है आंकड़े यही बताते हैं। नोटबंदी की असली मार गरीब जनता और मध्यम वर्ग पर पड़ी। बैंक और एटीएम की लाइनों में लगकर सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई। शादी-ब्याह से लेकर दिहाड़ी मजदूर तक सबकी जिंदगी ठप हो गई। बड़े पूंजीपतियों ने अपने पुराने नोट “मैनेज” कर लिए, लेकिन आम जनता की गाढ़ी कमाई रद्दी बन गई।
किसान आंदोलन और सरकार की हठधर्मिता किसानों के नाम पर लाए गए तीन कृषि कानूनों का असली मकसद खेतों को कॉरपोरेट घरानों अदानी और अंबानी के हवाले करना था। इन कानूनों ने मंडी व्यवस्था, एमएसपी और किसानों की स्वतंत्रता पर चोट की। देशभर के लाखों किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर एक साल से ज्यादा समय तक आंदोलन किया। सात सौ से अधिक किसानों ने ठंड, भूख और पुलिसिया अत्याचार में अपनी जान गंवाई। जब आंदोलन ने राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया और सरकार की साख डगमगाने लगी, तब जाकर ये कानून वापस लिए गए। पर सरकार ने न तो माफी मांगी और न ही उन परिवारों के लिए कोई संवेदना दिखाई जिन्होंने इस लड़ाई में अपने और अपनों को खो दिया लेकिन बेशर्म सरकार जब फंसती दिखाई देती है तो वह हिन्दू मुसलमान कर जनता के गुस्से को शान्त कर अपने उद्देश्यों को साधने लगी रहती है। जीएसटी और छोटे व्यापारियों की मुश्किलें 2017 में लागू किए गए जीएसटी को “गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स” कहा गया, पर यह छोटे व्यापारियों के लिए “गुड्स सस्पेंस टैक्स” साबित हुआ। जटिल नियमों, कई स्लैब और ऑनलाइन रिटर्न फाइलिंग की कठिन प्रक्रिया ने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी। जो व्यापार पहले स्थानीय स्तर पर चल रहे थे, वे बड़े कॉरपोरेट के कब्ज़े में चले गए। बाजार में प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ी है छोटा व्यापारी तबाह हो गया है आम आदमी भारी कठिनाइयों से गुजर रहा है लेकिन वह खामोशी अख्तियार किए हुए हैं जिस दिन ये खामोशी टूटेगी उसी दिन मोदी सरकार के मुश्किले बढ़ जाएगी अभी तो गोदी मीडिया के माध्यम से उस भ्रम को बनाए हुए हैं।
लॉकडाउन का अव्यवस्थित प्रहार मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान प्रधानमंत्री ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा की। बिना किसी पूर्व तैयारी के किए गए इस कदम से लाखों मजदूरों को पलायन करना पड़ा। पैदल, भूखे, प्यासे, हजारों किलोमीटर दूर तक अपने गांवों की ओर जाते हुए कई मजदूर रास्ते में जान गंवा बैठे। सरकार ने राहत पैकेज की सिफऱ् बातें ही की, लेकिन जमीनी हकीकत में उन्हें बहुत कम लोगों तक पहुंचाया गया। “घर में रहो, सुरक्षित रहो” का संदेश उन लोगों के लिए मज़ाक बन गया जिनके पास न घर था, न रोजग़ार और मोदी सरकार गोदी मीडिया की पीठ पर बैठकर अपनी पीठ थपथपाती रही जो अभी तक जारी है।
आर्थिक असमानता और बढ़ता पूंजी नियंत्रण 2014 से 2025 के बीच भारत में आर्थिक असमानता चरम पर पहुंच गई। जहां एक ओर कुछ चुनिंदा उद्योगपति रातोंरात हम दो हमारे दो की नीति से अरबपति बने,गौतम अदानी ने इस कार्यकाल में बहुत तरक्की करी वहीं करोड़ों लोग बेरोजग़ारी, महंगाई और गरीबी की जकड़ में फंसते चले गए। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी निजीकरण की भेंट चढ़ गईं।
निष्कर्ष मोदी सरकार का एक दशक भारतीय लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहतर अनुभव नहीं कहा जा सकता है जिस तरह के आरोप लग रहे हैं कि वोट चोरी कर सत्ता हथियाई गई है चुनाव आयोग से मिल कर इसमें कितनी सच्चाई है ये जांच का विषय है लेकिन सरकार के तरीकों पर गौर करने से पता चलता है कि कुछ तो है दाल में काला या पूरा ही काला है इस आरोप की जिसे जांच करनी है वह खुद संदिग्ध बना हुआ है फिर जांच कौन करे जनता ही सर्वोपरि है इसका पता लगाने के लिए कौन वोट चोर है और करा कौन रहा है।विदेश नीति की तो बात ही नहीं की जा सकती है ऐसा लगता है कि विदेश नीति के लिए मोदी सरकार के पास कोई तैयारी ही नहीं है जो हमारे आसपास के देश है उनसे हमारे पहले कैसे संबंध थे और आज कैसे कर दिए हैं यह किसी से छिपे हुए नहीं है अगर इसकी इमानदाराना समीक्षा की जाए तो पूरा सच सामने आ जाएगा।
नोटबंदी, जीएसटी, कृषि कानून और लॉकडाउन जैसे कदमों ने जनता के भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई। लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है, और 2025 तक आते-आते यह पूंजी बुरी तरह क्षीण हो चुकी है इसको पटरी पर लाने के लिए बहुत प्रयास करने होगे इस सरकार से ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती है क्योंकि इनके पास नफरत फैलाने के अलावा कुछ नहीं आता है अगर कुछ आता तो फिर मुझे ये सब लिखना ही नहीं पड़ता पूरा कार्यकाल नफरतों फैलाने में ही लगा दिया सकारात्मक और देशहित में कार्य करना इनके एजेंडे में ही नहीं है। लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक बड़ी बेबाकी निडरता के साथ इमानदारी से करते है। गोदी मीडिया की तरह नहीं कड़वा-कड़वा थू-थू मीठा-मीठा गप-गप पत्रकारिता का अर्थ ही बदल दिया गया है।