मज़दूर मोर्चा ब्यूरो बांग्लादेश में सम्मिलित सनातनी जागरण जोत संगठन के प्रवक्ता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के विरोध में भारत में संघ-भाजपा समर्थित कट्टरवादी हिंदू संगठनों द्वारा आए दिन विरोध प्रदर्शन किया जा रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में भारत सरकार से चिन्मय कृष्ण दास को छुड़वाने के लिए बांग्लादेश सरकार से बातचीत करने की मांग नहीं की जाती, बल्कि धार्मिक उन्माद फैलाने वाले हिंदुत्ववादी और मुसलमान विरोधी नारे लगाए जाते हैं। बांग्लादेश की घटना की आड़ में लगाए जाने वाले उन्मादी नारों का उद्देश्य दंगे भड़काना है। सर्वविदित है कि दंगों से सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा भाजपा को मिलता है और सबसे ज्यादा सामाजिक-आर्थिक नुकसान मुसलमानों को उठाना पड़ता है। इसी लक्ष्य को साधने के लिए संघी-भाजपाई देश को दंगों में झोंकने के प्रत्येक अवसर को भुनाने में लगे हैं।
बांग्लादेश की घटना तो बहाना है संघ-भाजपा तो पूरे देश में हिंदू-मुसलमान करने के एजेंडे पर एक एक कदम रोजाना बढ़ रहे हैं। बहराइच में शासन प्रशासन समर्थित कट्टरपंथियों के जुलूस ने मुस्लिम बहुल इलाके में नंगा नाच किया। यहां तक कि राम गोपाल मिश्रा नामक युवक एक मुस्लिम केे घर में घुस गया और छत पर लगा हरा झंडा उखाड़ कर वहां भगवा लहराने लगा, इस बीच चली गोली से उसकी जान चली गई। मीडिया रिपोर्ट आईं कि दूसरे दिन दंगाई प्रदर्शनकारियों ने मुस्लिम घरों, दुकानों को निशाना बनाया और पुलिस उनकी रक्षा में चलती रही। पुलिस ने राम गोपाल की हत्या के आरोपी तीन मुस्लिम युवकों की मुठभेड़ दिखा कर उनके पांव में गोली मार दी और दर्जनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, बावजूद इसके मुसलमानों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी यानी दंगा नहीं किया।
बहराइच पैटर्न फेल होते देख एक कदम आगे बढ़ते हुए संघ ने मस्जिदों को निशाना बनाना शुरू किया। इसके तहत संभल की शाही जामा मस्जिद को भविष्य में अवतरित होने वाले कल्कि का मंदिर बताते हुए सर्वे कराया गया। यहां भी दंगे में कानून व्यवस्था संभालने के नाम पर पुलिस ने तीन लोगों को गोली मार दी और घरों में घुस घुस कर गृहस्थी तहस नहस कर डाली। सैकड़ों को जेल भेज दिया गया। संभल के बाद अजमेर शरीफ की दरगाह को निशाना बनाया गया। अब जौनपुर की सल्तनत कालीन शासक इब्राहीम शाह द्वारा सन 1408 में बनवाई गई अटाला मस्जिद को अटाली देवी का मंदिर बताया जा रहा है। सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबंध के बावजूद बीते मंगलवार को फतेहपुर शहर में करीब 190 साल पुरानी नूरी जामा मस्जिद का एक हिस्सा बुलडोजर से तोड़ डाला गया, बताया गया कि हाईवे चौड़ीकरण के लिए कार्रवाई की गई है। इस सबके बावजूद मुसलमान सड़क पर नहीं उतर रहा जिससे दंगा नहीं हो पा रहा। संघ और भाजपा परेशान हैं कि दंगे क्यों नहीं हो रहे। दंगें होंगे तभी उनके सामाजिक ध्रुवीकरण के चूल्हे की रोटियां सिकेंगी।
संघ-भाजपा परेशान हैं कि दंगे नहीं हो रहे तो अब उनके अनुषांगिक संगठन बांग्लादेश की घटना की आड़ में दंगा भड़काने वाले प्रदर्शन कर रहे हैं जिनमेें भड़काऊ नारेबाजी की जाती है। रविवार को भी जिस दिन प्रशासनिक कार्यालय बंद रहते हैं शहर के हिंदूवादी संगठनों ने सेक्टर 12 स्थित लघु सचिवालय के सामने प्रदर्शन किया, समझा जा सकता है कि उनका उद्देश्य केवल वैमनस्य फैलाना था न कि सरकार से मांग करना।
प्रदर्शन में चिन्मय कृष्ण दास के समर्थन में संतों का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान जैसे नारे लगाए गए। सुधी पाठकों को मालूम होगा कि चिन्यम कृष्ण दास को बाल यौन शोषण जैसे अपराध में लिप्त होने के कारण बांग्लादेश इस्कॉन ने निकाल दिया था, उसे यहां के संघी और उनके चट्टे बट्टे संत बता रहे हैं। प्रदर्शनों में चीख चीख कर बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं का जनसंहार किए जाने की बात कह माहौल को तनावपूर्ण बनाया जा रहा है। यह जन संहार कहां हुआ, कितने हिंदुओं की मौत हुई, उनके नाम क्या हैं इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं। यह भी दावे किए जाते हैं कि बांग्लादेश में मंदिर अपवित्र किए गए लेकिन उन मंदिरों के नाम पते नहीं बता पाते। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बांग्लादेश में कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले किए लेकिन देखने वाली बात यह है कि वहां की सरकार और प्रशासन ने ऐसे दंगाइयों को तुरंत ही दबा दिया सभी नागरिकों की सुरक्षा को प्रतिबद्ध दिखी।
इसके विपरीत बहराइच में दंगाई भीड़ ने मुसलमानों को निशाना बनाया, उनकी जान माल का नुकसान हुआ और पुलिस ने केस भी उनके खिलाफ दर्ज किया, गिरफ़्तारी भी उन्हीं की हुई। संभल में सत्ता समर्थित गुंडों ने सर्वे के दौरान आपत्तिजनक नारेबाजी कर माहौल खराब किया और जब दंगा हुआ तो पुलिस-प्रशासन हालात संभालने नहीं बल्कि एक पक्ष बन कर मुसलमानों पर गोलियां चलाता, उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में जुटा नजर आया। इस मामले में भी नुकसान मुसलमानों का हुआ और हिंदुत्व के झंडाबरदार को फायदा।
बांग्लादेश मुस्लिम बहुल मुल्क है बावजूद इसके वहां हिंदू-मुस्लिम मिल कर रहते हैं, सरकार और प्रशासन अल्पसंख्यकों के हित की रक्षा करने को प्रतिबद्ध हैं। इसके विपरीत यहां संघी-भाजपाइयों की डबल इंजन सरकारें प्रशासन का इस्तेमाल प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मुसलमानों के खिलाफ कर रही हैं। बांग्लादेश में न तो जनता ने और न ही सरकार ने किसी मंदिर के नीचे मस्जिद बताई और न ही तलाशने का काम किया, इसके विपरीत यहां आए दिन किसी न किसी संघी कट्टरपंथी को मस्जिद-मजारों के नीचे मंदिर होने का स्वप्न आ रहा है और सरकार की पिछलग्गू न्यायपालिका तुरंत सर्वे कराने का आदेश दे रही है। सर्वे टीम के साथ संघी-भाजपाई-दंगाई भी उन्मादी और आपत्तिजनक नारे लगाते हुए पहुंचती है ताकि दंगे हो पुलिस-प्रशासन एकतरफा कार्रवाई करे। सच्चाई यह है कि हिंदुत्व के नाम पर हिंदुओं के दुश्मन तो ये संघी भाजपाई ही साबित हो रहे हैं। देश के करीब पांच करोड़ हिंदू मध्य पूर्व एशिया के अरब देशों में काम करते हैं, यदि बांग्लादेश की तर्ज पर इन देशों ने भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले, मस्जिदों को निशाना बनाए जाने के विरोध में प्रवासी हिंदुओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया तो क्या होगा? धर्म की चाशनी चटाने वाले प्रधानमंत्री मोदी की सरकार लगातार रोजगार खत्म करते जा रही है। पांच करोड़ भारतवासी जो प्रतिवर्ष अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा भारत को भेजते हैं अगर भेज दिए गए तो विदेशी मुद्रा के स्रोत तो खत्म होंगे तीन करोड़ बेरोजगार भी जुड़ जाएंगे।
खास बात ये भी है कि संघी तो चिन्मय कृष्ण दास के लिए बड़े बड़े प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन हाल ही में बांग्लादेश के दौरे पर गए भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने उनकी रिहाई की मांग नहीं की। बीबीसी समाचार के अनुसार बांग्लादेश में अपने समकक्ष मो. जशीम उद्दीन से मुलाकात कर उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की, जिसका जशीम उद्दीन ने माकूल जवाब दिया कि यह उनका आंतरिक मामला है, बांग्लादेश किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता और उम्मीद करता है कि कोई उसके आंतरिक मामलों में दखल न दे। सरकार देश में सभी धर्मों के लोगों के बीच आपसी सद्भाव और किसी भी कीमत पर धार्मिक सहिष्णुता बनी रहने के लिए प्रतिबद्ध है। यदि बहराइच, संभल, अजमेर शरीफ को लेकर देश में अल्पसंख्यक मुलसमानों की हालत के लिए जशीम उद्दीन विक्रम मिस्री से विरोध कर देते तो वह क्या जवाब देते।
चिन्मय कृष्ण दास को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया तो संघी भाजपाई और उनके चट्टे बट्टे उछनलने लगे, छात्र नेता कन्हैया कुमार को तो सरकार ने देश विरोधी नारे लगाने के जुर्म में कई साल जेल में रखा, और आज तक आरोप साबित नहीं कर पाई। पत्रकार सिद्दी कप्पन तो रिपोर्टिंग कर रहे थे उन्हें ढाई साल जेल में रखा गया। छात्र नेता शरजील इमाम को तो आज तक रिहा नहीं किया गया। संघियों का तर्क हो सकता है कि देशद्रोह के आरोप में केस चल रहा है इसलिए जल्दी जमानत नहीं होती, यही तर्क अगर वो चिन्मय कृष्णदास के मामले में लगाते तो धरना प्रदर्शन नहीं कर रहे होते।