फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) पूर्व सीएम खट्टर के कार्यकाल में नगर निगम में हुए दो सौ करोड़ के घोटाले में फंसे चार आईएएस अधिकारियों के खिलाफ पक्के सुबूत होने के बावजूद ज़ीरो टॉलरेंस वाली भाजपाई सैनी सरकार ने विजिलेंस को जांच करने की अनुमति नहीं दी। देना भी नहीं था, क्योंकि इन अधिकारियों ने सारा घोटाला सत्ता में बैठे मंत्री, विधायक, फाइनेंस कमेटी के सदस्यों के इशारे पर ही तो किया था, लूट का अधिकतर माल तो नेताओं ने बटोरा और बहती गंगा में उनके साथ हाथ धोकर फाइल पर चिडिय़ा बैठाने वाले अधिकारी धर लिए गए। शासन चलाने वाली आईएएस लॉबी पर आंच आती तो सत्ता पक्ष तक लपटें पहुंचने में देर नहीं लगती ऐसे में तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊं की तर्ज पर सरकार ने आईएएस अधिकारियों को बचा लिया।
नरेंद्र मोदी ने 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद बिना किसी ब्लू प्रिंट के स्मार्ट सिटी परियोजना की घोषणा कर डाली थी। 2016 से प्रति वर्ष इस परियोजना में सौ-सौ करोड़ रुपये प्रति चयनित शहर बांटे जाने लगे। बिना किसी विकास मॉडल के आया यह धन राजनेताओं की इच्छा के आधार पर खर्च किया जाने लगा। केंद्र में मोदी, राज्य में खट्टर और नगर निगम में केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर व बडख़ल विधायक सीमा त्रिखा की कठपुतली मेयर सुमनबाला की सत्ता में सबने जमकर लूटा। क्योंकि योजना लागू होने के दो साल तक स्मार्ट सिटी का काम नगर निगम ने देखा तो निगम के खजाने और परियोजना का खूब घालमेल किया गया।
बल्लभगढ़ विधायक मूलचंद शर्मा ने अपने ठेकेदार सतबीरा को खूब फर्जी विकास कार्य दिलवाए और उससे नकदी, लग्जरी कार, परिवार के लिए हवाई यात्राओं का खर्च करवाया। बडख़ल विधानसभा क्षेत्र में विधायक सीमा त्रिखा और सांसद कृष्णपाल गूजर के चहेते गांधी ने कई सौ करोड़ के प्रोजेक्ट हाथ में लिए और आधे अधूरे छोड़ कर पूरा भुगतान लेकर चलता बना। कठपुतली मेयर सुमन बाला को लूटबांट में महारत रखने वाले तत्कालीन पार्षद और फाइनेंस कमेटी के चेयरमैन धनेश अदलखा ने अपने चुंगल में फंसा रखा था और दो सौ करोड़ के घोटाले में उसकी अहम भूमिका थी। फाइनेंस कमेटी का चेयरमैन होने के कारण मंत्री विधायक के इशारे पर वह ही घोटाले वाले प्रोजेक्टों चेली सुमनबाला का इस्तेमाल कर मंजूरी दिलाता था।
विकास के नाम पर बेतहाशा बहाई जा रही पैसे की गंगा में बाल्टी भरने में आईएएस सोनल गोयल भी कहां पीछे रहतीं। जानकार बताते हैं कि धनेश अदलखा और सोनल गोयल ने मिलकर बड़े बड़े खेल किए। सोनल गोयल के बाद यह सिलसिला आईएएस एम शाईन और फिर अनीता यादव के कार्यकाल में भी चलता रहा। अनेक फर्जी बिल आईएएस यश गर्ग के हाथ से भी पास हुए थे और वह भी जांच में फंसे थे। शिकायत हुई तो विजिलेंस जांच में इन चार आईएएस अधिकारियों के अलावा नगर निगम के चीफ इंजीनियर डीआर भास्कर सहित करीब पंद्रह कर्मचारी और ठेकेदार सतबीरा सभी फंसे थे। 2023 में ही विजिलेंस ने आईएएस सोनल गोयल, एम शाईन आदि को जांच में शामिल करने के लिए सरकार से अनुमति मांगी थी। तब भी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटने वाले खट्टर ने अनुमति नहीं दी थी और सोनल गोयल ने अदालत से स्टे ले लिया था।
बताया जाता है कि आईएएस लॉबी ने सरकार पर तब ही दबाव बनाया था कि यदि आईएएस अधिकारियों पर आंच आई तो विधायक मूलचंद आदि राजनेताओं को भी जेल जाना पड़ सकता है। इसके बाद से सरकार आईएएस अधिकारियों के बचाव के रास्ते खोजने लगी थी। जानकार बताते हैं कि सरकार ने इसके लिए दो रास्ते अपनाए पहला यह कि जिन मामलों में आईएएस अधिकारी फंस सकते हैं उन्हें अलग कर दिया जाए और जिनमें उनके सुरक्षित होने की संभावनाएं हैं उनके दस्तावेज अलग से तैयार किए जाएं। मज़दूर मोर्चा ने जून 2025 के अंक में नगर निगम दो सौ करोड़ घोटाला : आईएएस अफसर को बचाने के लिए तैयार हो रही रिपोर्ट ! शीर्षक से खबर प्रकाशित कर इस खेल को उजागर किया था। सरकार ने आईएएस एम शाईन के खास जूनियर धीरेंद्र खडगटा को निगमायुक्त का पद सौंपा और फिर दो सौ करोड़ घोटाले से संबंधित दस्तावेजों की रिपोर्ट तलब कर ली गई। वित्तीय घोटाले जैसे तकनीकी विषय पर एस्टेब्लिशमेंट शाखा प्रमुख सृष्टि बब्बर से रिपोर्ट बनवाई गई तो समझा जा सकता है कि उन्होंने क्या रिपोर्ट बनाई होगी।
इसके बाद सरकार की मंशा के अनुरूप विजिलेंस ने घोटाले को छोटे छोटे भाग में तोड़ कर आईएएस अफसरों को बचाया। दो सौ करोड़ का घोटाला महज सवा दो करोड़ में समेट दिया गया और ठेकेदार सतबीरा सहित निगम के छोटे-बड़े करीब बीस कर्मचारियों के सिर ठीकरा फोड़ दिया था। सरकार और उसकी गुलाम विजिलेंस के इस खेल को मज़दूर मोर्चा ने 3-9 अगस्त 2025 के अंक में गजब : नाम एंटी करप्शन ब्यूरो, काम भ्रष्ट नौकरशाहों को बचाना, दो सौ करोड़ का घोटाला भी घट कर सवा दो करोड़ में सिमटा शीर्षक से प्रकाशित समाचार में उजागर किया था। उस खबर में भी बताया था कि यह सारी कवायद आईएएस अफसरों को बचाने की है। अब सरकार ने मज़दूर मोर्चा की आशंकाओं पर मुहर लगाते हुए इन भ्रष्टाचारी आईएएस अफसरों के खिलाफ एसीबी को जांच की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।
करीब दो साल पहले गुडग़ांवां के एक मामले मेंं पुख्ता सबूतों के आधार पर तत्कालीन डायरेक्टर विजिलेंस शत्रुजीत कपूर ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एवं महा घूसखोर डी सुरेश को अपने शिकंजे में कस तो लिया था लेकिन खट्टर की मेहरबानी से तुरंत राहत देते हुए कपूर को उसकी गिरफ्तारी से रोक दिया गया था। यही है सदाचार का ढिंढोरा पीटने वाली मोदी-खट्टर सैनी की ट्रिपल इंजन सरकारों की अतिभ्रष्ट कार्यशैली की सच्चाई।