ईएसआईसी के दस नए मेडिकल कॉलेज खुलने की कार्रवाई शुरू

ईएसआईसी के दस नए मेडिकल कॉलेज खुलने की कार्रवाई शुरू
October 28 05:59 2024

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
कोई भी मेडिकल कॉलेज शुरू करने से पहले सम्बन्धित राज्य की सरकार से अनुमति लेने के बाद मेडिकल यूनिवर्सिटी से भी स्वीकृति लेनी होती है। इन दोनों औपचारिकताओं के पश्चात एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) में आवेदन किया जाता है जिसमें कहा जाता है कि आवेदक मेडिकल कॉलेज चलाने की सभी शर्तें पूरी करता है, इसलिए उसे मेडिकल कॉलेज चलाने की स्वीकृति प्रदान की जाए।

इस पर एनएमसी घोषित किए गए स्थान पर आकर जांच करता है। सभी शर्तें पूरी पाए जाने पर एनएमसी मेडिकल कॉलेज चालू करने की स्वीकृति प्रदान करता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार कॉर्पोरेशन ने सभी सम्बन्धित राज्य सरकारों तथा मेडिकल विश्वविद्यालयों को आवेदन कर दिए हैं। शीघ्रातिशीघ्र इन दोनों से अनुमति पाने के लिये कॉर्पोरेशन के डीजी अशोक सिंह व्यक्तिगत रूप से प्रयासरत हैं। एनएमसी को आवेदन करने से पहले सबसे बड़ा काम 220 बिस्तरों का अस्पताल तथा पर्याप्त आवश्यक फैकल्टी एवं स्टाफ का होना जरूरी है। विदित है कि उक्त सभी 10 स्थानों पर 300 या इससे अधिक बिस्तरों के अस्पताल कॉर्पोरेशन पहले से ही चला रहा है। आवश्यक फैकल्टी तथा अन्य स्टाफ का खाका तैयार कर लिया गया है।

इसकी भर्ती के लिए शीघ्र ही विज्ञापन जारी होने वाले हैं। समझा जाता है कि तीन बड़े अस्पतालों में 100 सीट तथा शेष सात में 50 सीटों के लिए आवेदन किया जाएगा। समयानुसार जब बिल्डिंग आदि का निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा तो सीटों की संख्या बढ़ा दी जाएगी।

केन्द्रीय श्रममंत्री मनसुख मांडविया के नेतृत्व मेंं कॉर्पोरेशन के डीजी अशोक सिंह जिस लगन से इस काम में जुटे हैं वह वास्तव में ही सराहनीय है। अब देखना यह है कि जिस सराहनीय ढंग से इस काम की शुरूआत की गई है, इसका समापन भी ऐसा ही हो पाएगा? मुख्यालय में बैठे मौजूदा कामचोर एवं नालायक कमिश्नरों की पलटन के रहते तो इसकी सम्भावना नजर नहीं आती। जो मुख्यालय अभी तक अपने 10 मेडिकल कॉलेजों व 49 अस्पतालों को सही ढंग से नहीं चला पा रहा, वह भला और अतिरिक्त 10 मेडिकल कॉलेजों का भार अपने नाजुक कंधों पर कैसे वहन कर पाएगा?

यदि मंत्री जी और डीजी चाहते हैं कि उनका प्रोजेक्ट सही-सलामत पूरा हो सके तो सर्व-प्रथम कॉर्पोरेशन को नालायक अधिकारियों से मुक्त करा कर योग्य एवं दक्ष लोगों को नियुक्त करें। समझने वाली बात यह है कि डिस्पेंसरी स्तर के डॉक्टर न तो मेडिकल कॉलेज चला सकते हैं और न ही वे मेडिकल शिक्षा के बारे में कोई जानकारी रखते हैं। जीडीएमओ स्तर के ये डॉक्टर, दरअसल अपने आप को कॉर्पोरेशन का मालिक तथा तमाम फैकल्टी, यहां तक कि डीन्ज़ को भी अपने मातहत समझते हैं। इनकी अपनी खुद की अक्ल तो होती नहीं, कोई फैकल्टी एवं डीन इन्हें कुछ समझाना चाहे तो ये उसे अपनी तौहीन समझते हैं।

योग्य व्यक्तियों को तलाशना कोई मुश्किल काम नहीं है। अपने कॉर्पोरेशन के अलावा स्वास्थ विभाग में अनेकों ऐसे योग्य व्यक्ति मौजूद हैं। दूर क्यों जाएं, हैदराबाद स्थित कॉर्पोरेशन के मेडिकल कॉलेज की दशा सुधारने वाले डीन रह चुके डॉक्टर एम श्रीनिवास जो अब एम्स दिल्ली के डायरेक्टर हैं, उन्हें यदि कॉर्पोरेशन में ला नहीं सकते तो सलाह तो ले ही सकते हैं। उन जैसा योग्य व्यक्ति ही नए कॉलेजों के निर्माण के समय पर अनेकों अमूल्य सुझाव दे सकता है।

यही वह समय होता है कि जब प्लॉट से लेकर कॉलेज बिल्डिंग के साइज़ का निर्धारण किया जा सकता है। एक समझदार एवं दूरदर्शी व्यक्ति ही भविष्य की जरूरतों का आकलन करके उचित निर्णय ले सकता है। $फरीदाबाद को ही देख लीजिए, 100 सीट के लिए बने इस मेडिकल कॉलेज में मोदी के आदेश पर यकायक 125 सीट का बना दिया, जबकि आदेश तो इसे 150 का बनाने का था। अब स्थिति यह है कि बढ़े हुए 25 छात्रों के लिए हॉस्टल की समस्या बनी हुई है। भवन निर्माण के समय किसी ने यह नहीं सोचा था कि एमबीबीएस करने के बाद 200-250 डॉक्टर पीजी भी करेंगे। पीजी छात्र किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल की रीढ़ होते हैं। उनके लिए परिसर में ही हॉस्टल का होना अति आवश्यक होता है। उनके लिए ही क्यों तमाम डॉक्टरों व पैरा मेडिकल स्टाफ के लिए भी परिसर में रहना अत्यंत लाभकारी होता है, जो यहां सम्भव नहीं है।

भवन निर्माण के समय पर ही इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि 50 सीटो से शुरू होने वाला संस्थान जरूरत पडऩे पर 250 सीटों तक विस्तृत हो सके। इसके लिए आवश्यक है कि भूखंड का चयन करते वक्त भविष्य में होने वाले विस्तार की सम्भावनाओं को अवश्य ध्यान में रखा जाए।

29 अक्तूबर को भूमि पूजन की नौटंकी
फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) विदित है कि ईएसआई कॉरपोरेशन के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में स्थानाभाव के चलते इसी परिसर में दो बेसमेंट के साथ एक दस मंजिला नई इमारत ढाई साल पहले प्रस्तावित हो चुकी है। इसका काम अभी तक इसलिए शुरू नहीं हो सका कि मोदी को इसके भूमिपूजन की फुर्सत नहीं मिल पाई। फुर्सत मिले भी कैसे, तमाम नई रेलगाडिय़ां तभी चलती हैं जब मोदी जी हरी झंडी दिखाएं, चार-चार बार बंबई के मेट्रो का उद्घाटन कर चुके हैं, कभी पाखाने का उद्घाटन करते हैं तो कभी पटरियों का करते हैं तो कभी इसका तो कभी उसका। खैर जो भी हो, फरीदाबाद के इस अस्पताल के लिए उन्हें फुर्सत मिल ही गई, उपलब्ध जानकारी के अनुसार 29 अक्तूबर को वे एक साथ आठ स्थानों के लिए इसी तरह का पाखंड करेंगे। शुक्र यह है कि यह सारा काम वे दिल्ली में बैठकर बटन दबा कर ही कर लेंगे, यानी कि उन्हें फरीदाबाद नहीं आना पड़ेगा, न कहीं और जाना पड़ेगा। इससे जनता की वह फज़ीहत बच गई ही गई जो उनके यहां आने पर हो सकती थी।

सर्वविदित है कि इस बिल्डिंग पर खर्च होने वाला सारा पैसा ईएसआई कॉरपोरेशन का होगा, जो मज़दूरों के वेतन से हर माह वसूला जाता है। किसी को यह गलतफहमी नहीं रहनी चाहिए कि मोदी सरकार या हरियाणा सरकार कोई चवन्नी इस पर खर्च करने जा रही है। इसके बावजूद इस नौटंकी के द्वारा मोदी जनता को यह संदेश देना चाहेंगे कि वे जनता के लिए कितना बड़ा काम करने जा रहे हैं। उनके इस प्रायोजन के समय शहर भर के तमाम छोटे-बड़े मंत्री संत्री लगुए भगुए अस्पताल परिसर में आकर मोदी के यशोगान के कसीदे गाएंगे। इसके लिए स्थानीय प्रोपेगंडा मशीनरी के अलावा दिल्ली से भी तमाम प्रकार के सरकारी व गैर सरकारी भांड भी आमंत्रित किए जाएंगे। ज़ाहिर है इस सब पर खर्च होने वाला पैसा भी उसी मज़दूर का होगा जो उससे बेहतर चिकित्सा देने के नाम पर वसूला गया है।

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