नई दिल्ली (मज़दूर मोर्चा) सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अलीखान ने दिनांक 8 मई, 2025 को एक पोस्ट डाली थी। इसमें कहा गया था कि ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बताने के लिए कर्नल सोफिया कुरैशी को आगे करके सरकार ने जहां धर्म-निरपेक्षता दिखाई वहीं मुसलमानों की लिंचिंग व बुलडोजिंग को भी रोका जाता तो अच्छा होता। मूल पोस्ट अलग से बॉक्स में दी जा रही है। इस पोस्ट का संज्ञान लेते हुए हरियाणा महिला आयोग की चेयर-पर्सन रेनू भाटिया ने पूरी तमाशेबाजी के साथ प्रोफेसर के विरुद्ध ए$फआईआर दर्ज करा कर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। अगले दिन मजिस्ट्रेट के सामने पेश करके पुलिस ने चार दिन का रिमांड ले लिया और इसके बाद प्रोफेसर को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
मामला अति संवेदनशील होने के चलते दिनांक 21 मई को सुप्रीमकोर्ट पहुंच गया। वहां माननीय सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई बड़े ही नाटकीय अंदाज में की। अदालत ने मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जज सूर्यकांत यह समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ नज़र आ रहे थे कि प्रोफेसर के लिखे का मतलब क्या है? वे बार-बार इसी बात को दोहराते रहे कि पोस्ट लिखे जाने का समय अनुचित था। उन्होंने इस के लिए ‘इल टाइम शब्द का इस्तेमाल किया। मजे की बात तो यह रही कि प्रोफेसर के वकील कपिल सिब्बल भी पूछते रहे कि समय तो गलत तो हो सकता है लेकिन आपराधिक क्या है?
पूरी ड्रामेबाज़ी के बाद माननीय कोर्ट ने प्रोफेसर को अंतरिम जमानत तो दे दी लेकिन उनका पासपोर्ट तथा लैपटॉप जब्त करने के साथ-साथ चुप रहने के भी आदेश दिए। इसके अलावा पूरे मामले की जांच के लिए तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम गठित करने के आदेश दिए। ये सभी अधिकारी आईपीएस तो होंगे लेकिन हरियाणा के मूल निवासी नहंीं होने चाहिए। समझ से बाहर की बात है कि यदि पुलिस अधिकारी हरियाणवी होंगे तो जांच को क्या खतरा हो सकता है? अदालती आदेश की पालना करते हुए हरियाणा सरकार ने एडीजीपी ममता सिंह के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम गठित कर दी। इसमें एक गंगा राम पुनिया, एसपी करनाल भी हैं। पुनिया अपनी ईमानदारी एवं सत्य-निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। समझने वाली बात यह है कि इन तीन वरिष्ठ अ$फसरों की टीम तफ्तीश क्या करेगी? तफ्तीश करने को है ही क्या?
ले-दे कर प्रोफेसर द्वारा फेसबुक पर लिखी गई एक पोस्ट ही तो है। मजे की बात यह है कि इस पोस्ट में महिला अथवा देश के विरुद्ध कौन सा शब्द लिखा गया है, यह न तो रेनू भाटिया बता पाई और न ही सुप्रीम कोर्ट जान पाई। प्रोफेसर को पुलिस रिमांड एवं न्यायिक हिरासत में भेजने वाले मजिस्ट्रेट की तो मजाल ही क्या जो ऐसे माहौल में इस पोस्ट की व्याख्या कर सकते। कायदे से तो मजिस्ट्रेट को ही पहली पेशी पर ही केस डिस्चार्ज करके प्रोफेसर को मुक्त कर देना चाहिए था। परन्तु मजिस्ट्रेट को नौकरी तो माहौल के मातहत ही तो करनी है, वह इससे बाहर निकल कर कैसे कुछ लिख सकता है? न्यायपालिका की नौटंकी का यह कोई इकलौता मामला नहीं है। इंदौर हाईकोर्ट के आदेश पर, मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह के विरुद्ध जो एफआईआर दर्ज कराई गई थी उसका भी सुप्रीम कोर्ट ने कचरा बना दिया। विदित है कि विजय शाह ने मंच से जनसभा को सम्बोधित करते हुए कर्नल सो$िफया कुरैशी को आतंकवादियों की बहन कहा था।
बाद में अपनी गलती मानते हुए माफी भी मांग ली थी फिर भी इस मामले की तफ्तीश के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष टीम गठित करने का आदेश दे दिया। अब बीते दस दिनों से भगोड़े मंत्रीजी पुलिस को मिल नहीं रहे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर हाईकोर्ट पर इस मामले में कोई कार्रवाई करने से रोक लगा दी है। इन हालात में देश की न्यायपालिका को नौटंकी कम्पनी न कहा जाए तो और क्या कहा जाए।