फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकारें उनके नक्शे कदम पर चलती हुई जुमलेबाजी और झूठे काम कर जनता को मूर्ख बनाने में जुटी हैं। इसी कड़ी में बीके अस्पताल में तथाकथित आठ बेड का इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) को भी शामिल हो गया है। यहां गंभीर रोगियों का इलाज करने के लिए सरकार की स्वास्थ्य मंत्री आरती राव ने महज दो नर्सिंग ऑफिसर दिए हैं। समझने वाली बात यह है कि कोई नर्सिंग ऑफिसर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी मरीज को इलाज और परामर्श नहीं दे सकता, ऐसे में गहन चिकित्सा रोगियों का वह क्या इलाज करेंगे समझा जा सकता है। सरकार ने ढिंढोरा बजा दिया कि बीके में आईसीयू चालू हो गया, चाटुकार-गोदी मीडिया ने भी हकीकत का आकलन करने के बजाय सरकार के सुर में सुर मिला कर बीके अस्पताल को एक और तमगा दे दिया।
काम नहीं काम का ढिंढोरा पीटने में विश्वास रखने वाली भाजपा सरकार के पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर ने 2022 में बीके अस्पताल में आईसीयू बनाए जाने की घोषणा की थी। तीन साल रोते पीटते बीत गए और सामाजिक संस्थाओं ने ट्रॉमा सेंटर की मांग शुरू कर दी तो दिखावे के लिए सीएम सैनी ने भी आईसीयू की घोषणा कर दी। यदि आईसीयू पूरी तरह तैयार होता तो इसका उद्घाटन सीएम सैनी, स्वास्थ्य मंत्री आरती यादव या कम से कम केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर द्वारा करवाया जाता लेकिन सिर्फ दिखावा करना था तो बीते 23 मई को चंडीगढ़ से कुछ काम निपटाने आए स्वास्थ्य महानिदेशक डा. कुलदीप सिंह धीरे से यह काम भी निपटाते चले गए।
उद्घाटन तो कर दिया लेकिन आईसीयू के लिए बहुत ही जरूरी वेंटिलेटर, हार्ट लंग मशीन जैसे महत्वपूर्ण उपकरण ही नहीं दिए गए। उपकरण तो छोडि़ए चौबीस घंटे सेवाएं देने के लिए सर्जन, विशेषज्ञ चिकित्सक, एनिस्थीसियोलॉजिस्ट, आईसीयू स्पेशलिस्ट, आईसीयू ओटी स्टाफ कुछ भी नहीं दिया। चिकित्सा सेवाओं के जानकारों के अनुसार आईसीयू में सामान्य बीमारी, सर्जरी वाले मरीज नहीं रखे जाते बल्कि ऐसे गंभीर मरीज भर्ती किए जाते हैं जिनकी चौबीस घंटे निगरानी की जानी है। यही कारण है कि आईसीयू में कम से कम एक विशेषज्ञ चिकित्सक मौजूद रहता है।
यहां नर्सिंग स्टाफ भी विशेष ट्रेंड होता है। स्वास्थ्य महानिदेशक इस सबकी कोई व्यवस्था करके नहीं गए। बीके के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. विकास गोयल के मुताबिक फिलहाल प्रत्येक पाली में दो नर्सिंग अधिकारियों के जरिए आईसीयू संचालित कराया जा रहा है, स्टाफ की मांग की गई है। यानी वो स्टाफ आईसीयू संभाल रहा है जिसका काम चिकित्सकों की मदद करना, प्रिस्क्राइब की गई दवा, इंजेक्शन को समय पर मरीज को देना और निगरानी करने से ज्यादा कुछ नहीं। यानी ये किसी मरीज की हालत गंभीर होने पर उसका इलाज नहीं कर सकते। बीके अस्पताल के डॉक्टर यहां राउंड लगाते हैं जो कि किसी गंभीर मरीज की गहन चिकित्सा के लिए पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।
समझने वाली बात यह भी है कि बीके में आईसीयू चालू होने का मतलब यह होना चाहिए कि अब यहां से मरीजों को दिल्ली रेफर नहीं किया जाएगा। सच्चाई यह है कि गंभीर मरीज बीके से उसी रफ़्तार में दिल्ली रेफर किए जा रहे हैं जितने आईसीयू बनने से पहले किए जाते थे। बीके के भीतरी सूत्र बताते हैं कि पथरी, पेट दर्द जैसे सामान्य रोग वाले मरीजों को जिन्हें आईसीयू की जरूरत नहीं है उन्हें यहां भर्ती कर आईसीयू के बेड भरे हुए दिखाए जा रहे हैं।
चिकित्सा सेवाओं के जानकारों के अनुसार आठ बेड के आईसीयू के लिए चार रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर, एक आईसीयू स्पेशलिस्ट, दो ऑपरेशन थियेटर टेक्नीनिशन और 24 नर्सिंग ऑफिसर स्टाफ का मानक है। इतना स्टाफ होने पर ही कोई आईसीयू 24 घंटे चलाया जा सकता है। विशेषज्ञ स्टाफ तो छोडि़ए बीके के आईसीयू में केवल 6 नर्सिंग ऑफिसर हैं। इसे जुमलेबाज भाजपा सरकार, उसकी स्वास्थ्य मंत्री आरती यादव, सीएमओ डॉ. जयंत आहूजा आईसीयू कहने में भले ही गर्व महसूस करें लेकिन सच्चाई यह है कि यह आम जनता की नजरों में धूल झोंकने और उसे मूर्ख बनाने से ज्यादा यह कुछ नहीं।
सार्थक के नाम पर निरर्थक अभियान आईसीयू के उद्घाटन के मौके पर स्वास्थ्य विभाग (नेशनल हेल्थ मिशन) के प्रबंध निदेशक रिपुदमन सिंह ने बताया था कि प्रदेश सरकार सभी जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने के लिए सार्थक अभियान चला रही है। इसके तहत विभिन्न विभागों के उप निदेशक जिलों का निरीक्षण कर स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति का मूल्यांकन करेंगे। उप निदेशकों को मूल्यांकन करने के लिए आने की क्या जरूरत जब इसके लिए जिला अस्पताल से लेकर पीएचसी, सीएचसी, यूएचसी में सीएमओ, पीएमओ, एसएमओ तक तैनात हैं। दरअसल, जुमलेबाजों की सरकार का उद्देश्य काम करना नहीं काम का ढोल पीटना है, इसी सिलसिले में निदेशकों, उप निदेशकों और प्रबंध निदेशको के दौरे पर दौरे लगवाए जाते हैं ताकि जनता को लगे कि सरकार चल रही है। यदि सरकार जानना चाहे तो चंडीगढ़ में बैठे बैठे जान लेगी कि पलवल में क्या हो रहा है, सिरसा में या कहीं और क्या हो रहा है, इसके लिए दौरों की जरूरत नहीं होती। दरअसल, सबको सब कुछ पता है लेकिन किसी की जन हित में काम करने की इच्छा नहीं है। काम तो कुछ करना नहीं है इसलिए सार्थक आदि अभियान नाम रख कर मूर्ख बना रहे हैं।
सरकार जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के प्रति कितनी गंभीर है इसी बात से समझा जा सकता है कि रिपुदमन सिंह के मुताबिक गर्भवती महिलाओं को रियायती दरों पर अल्ट्रासाउंड सुविधा उपलब्ध कराने के लिए निजी अस्पतालों को इंपैनल किया जाएगा। दूसरे शब्दों में सरकार गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल में मुफ्त या नाम मात्र शुल्क पर मिलने वाली अल्ट्रासाउंड जांच सेवा से हाथ खींच रही है। हार्ट सेंटर, एमआरआई सुविधा तो पहले ही पीपीपी मोड यानी ठेके पर दी जा चुकी हैं। जब चिकित्सा सेवाएं धीरे धीरे निजी हाथों को सौंपी जा रही हैं तो फिर सरकारी अस्पतालों में सेवाएं बेहतर करने के लिए सार्थक अभियान का निरर्थक ढोल क्यों बजाया जा रहा है।