निर्माणाधीन चौराहों का निरीक्षण कर अपने नाम की तख्ती लगवाने का जोर लगा रहीं फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) दस साल तक सत्ता की मलाई डकारने के अलावा जनता के कोई काम नहीं करने वाली विधायक सीमा त्रिखा पार्टी द्वारा कुर्सी छीने जाने के बावजूद सत्ता का मोह नहीं त्याग पा रही हैं। कुर्सी छीने जाने के बाद पूरे चुनाव तक अज्ञातवास में चली गईं सीमा त्रिखा भाजपा के बहुमत में आते ही सड़कों पर उतर पड़ीं। दस साल में चंद टूटे शौचालयों के अलावा अपने नाम की एक भी तख्ती नहीं लगवा पाईं त्रिखा अब निर्माणाधीन चौक चौराहों पर अपना नाम लिखवाने के लिए भटक रही हैं, इन चौराहों का निरीक्षण कर अधिकारियों पर दबाव बनाती भी दिखीं।
पिछली सरकार में कुर्सी छीने जाने के मुआवज़े के तौर पर चंद महीनों पहले उन्हें निचले दर्जे का यानी शिक्षा राज्यमंत्री का पद नवाज़ा गया था। पार्टी सूत्रों के अनुसार बडख़ल की जनता का गुस्सा देखते हुए सीमा को मंत्री पद देने के साथ ही उन्हें बता दिया गया था कि यह उनका आखिरी कार्यकाल है, पद तो उनकी इज्ज़त बचाने के लिए दिया जा रहा है। यही कारण रहा कि मंत्री पद मिलने के बावजूद वह ज्यादा सक्रिय नहीं रहीं। हां, चलते-चलते चंद डीईओ, एडीईओ, बीईओ को मनपसंद जगह ट्रांसफर पोस्टिंग कराने के एवज में दो-ढाई करोड़ रुपये इकट्ठा कर ले गईं।
यदि उन्होंने दस साल में बडख़ल विधानसभा क्षेत्र के लिए कोई भी काम किया होता तो शायद उनका टिकट नहीं कटता। दस साल में वह अपने जिस बडख़ल झील प्रोजेक्ट का ढोल हर जगह पीटती रहीं वह आज तक पूर्ण नहीं हो पाया। टिकट काटे जाने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि किसी भी विकास कार्य का उनके नाम का बोर्ड कहीं नहीं लगा है। ऐसे में जनता तो भूल जाएगी कि वो भी यहां दो बार विधायक रह चुकी हैं। हां, स्मार्ट सिटी के तहत लूट कमाई के लिए जो बीस-बीस लाख रुपये के शौचालय बनवाए गए थे उनकी स्टील की तख्तियों में केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल के साथ ज़रूर सीमा त्रिखा का भी नाम है। घोटाले की भेंट चढ़े ये शौचालय तो चंद महीनों में ही ज़ंग लग कर सड़-गल गए थे लेकिन भाजपा के भ्रष्टाचार को याद दिलाती गूजर-त्रिखा के नाम की तख्ती अभी भी मौजूद हैं। इसके अलावा शायद ही किसी अन्य विकास कार्य पर त्रिखा का नाम दिखे।
सत्ता की मलाई तो खूब चाटी अब नाम अमर करने की बेताबी में चुनाव खत्म होने के बाद वो फिर सड़कों पर उतर पड़ीं। हालांकि पूरे विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा या पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में कोई कार्यक्रम, जनसभा नहीं की। करीबी सूत्र तो बताते हैं कि धनेश को हराने के लिए उन्होंने अपनी कोर टीम भी लगा रखी थी, इसकी शिकायत भी पार्टी नेतृत्व तक हो चुकी है, लेकिन धनेश के जीतने के कारण उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव परिणाम में भाजपा को बहुमत मिलने के बाद सीमा त्रिखा एक बार फिर सक्रिय हो गईं।
जीत का जश्न तीन दिन बाद खत्म होते ही सीमा त्रिखा शहर का निरीक्षण करने निकल पड़ीं। काफी निरीक्षण और खोज के बाद भी उन्हें उनका बनवाया हुआ कोई भवन या विकास कार्य नहीं मिला जिस पर वो अपने नाम की तख्ती लगवा पातीं, उन्हें यह भी डर था कि नई सरकार बनने तक ही वह निवर्तमान मंत्री रहेंगी जिस दिन नई सरकार बनी वह पूर्व हो जाएंगी। इसी फिक्र में नई सरकार के शपथग्रहण करने वाले दिन यानी 17 अक्तूबर को वह फिर निरीक्षण करने निकलीं और निर्माणाधीन चौराहों को देखने के बाद अधिकारियों को इनमें पूर्व शिक्षामंत्री सीमा त्रिखा के नाम की तख्ती लगाने की हिदायत दी। अपने निवर्तमान मंत्री होने का हवाला देकर आदेश मानने का दबाव भी डाला। अंतिम दिन अधिकारियों ने भी उनकी हां में हां मिलाने के बाद उन्हें चलता कर दिया। एक दिन में तो तख्ती लग नहीं सकी और धनेश भी शपथ लेकर नई विधानसभा के अंग हो गए।
सरकार के शपथग्रहण करने और विधायक धनेश के तीखे तेवर देख बताया जा रहा है कि सीमा त्रिखा ने कदम पीछे खींच लिए हैं, लेकिन राजनीति में उनकी पारी समाप्त नहीं हुई है ये जताने के लिए पूरी बडख़ल विधानसभा क्षेत्र में दशहरा-दिवाली की शुभकामनाओं वाले बैनर पोस्टर लगवाए हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार सीमा यह कवायद अपना वजूद जिंदा बचाए रखने के साथ ही नई सरकार में किसी संस्थान का चेयरमैन आदि पद पाने के लिए कर रही हैं। जानकार मानते हैं कि खट्टर का खास धनेश सीमा त्रिखा के लिए सबसे बड़ा अड़ंगा साबित होने वाला है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि बडख़ल में उसे चुनौती देने के लिए सत्ता का कोई भी दूसरा केंद्र बने। अब देखना है कि सीमा की सत्ता की मलाई खाते रहने की छटपटाहट सरकार द्वारा कोई पद देने से शांत होगी या धनेश के कारण राजनीतिक कॅरियर समाप्त किए जाने से।