2800 करोड़ की लागत से शहर की बिजली लाइनें होंगी भूमिगत

2800 करोड़ की लागत से शहर की बिजली लाइनें होंगी भूमिगत
August 03 14:53 2025

लूट कमाई की एक और योजना
$फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) खबरों के अनुसार हरियाणा सरकार इस शहर की तमाम बिजली लाइनों को भूमिगत करने जा रही है। यदि ऐसा हो जाए तो शहर में न तो बिजली के खम्भे नज़र आएंगे और न ही झूलती हुई लम्बी तारें। जाहिर है ऐसा होने पर आंधी तूफान के कारण बिजली के खम्भे उखडऩे व तारों के टूटने की समस्या से निजात मिल जाएगी। विदित है कि आंधी तूफान के दौरान बड़ी संख्या में वृक्ष टूट कर बिजली लाइनों पर गिर जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप घंटों व कई बार तो कई दिनों तक बिजली आपूर्ति बाधित रहती है जिसे बहाल करने पर बिजली विभाग को कड़ी मशक्कत व भारी खर्चा करना पड़ता है। लाइनों के भूमिगत होने से इन सभी मुसीबतों से जान छूट जाएगी। इस परियोजना के लिए हरियाणा सरकार ने फिलहाल 2800 करोड़ रुपये निर्धारित किए हैं।

देखने-सुनने में तो ये योजना बहुत ही अच्छी लगती है। लेकिन जिस ढंग से सरकार का काम चलता है उससे लगता नहीं कि यह योजना कभी सिरे चढ़ पाएगी। 2800 करोड़ तो क्या 28 हजार करोड़ में भी यह योजना सिरे चढऩे वाली नहीं है क्योंकि नेताओं ने इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए नहीं बल्कि अपनी लूट कमाई के लिए बनाया है। जिन शहरवासियों को 45 वर्ष पूर्व की मथुरा रोड वाली स्ट्रीट लाइटें याद हैं वे बखूबी जानते हैं कि इस देश में भूमिगत कार्य कैसे होता है? शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर बदरपुर बॉर्डर से लेकर बल्लबगढ़ तक जो स्ट्रीट लाइटें लगाई गई थीं उनकी तारें भूमिगत रखी गईं थीं। घटिया सामग्री एवं निम्नस्तरीय कार्यशैली के चलते आए दिन ये तारें खराब रहने लगीं। परिणामस्वरूप भूमिगत के स्थान पर ऊपर से नई केबल डाली गई। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद भी मथुरा रोड का कोई न कोई खंड सदैव ही अंधेरे में डूबा रहता था। जब तक एक खंड को ठीक करते थे तब तक कोई न कोई दूसरा खंड अंधेरे में डूब जाता था। इसका मतलब स्पष्ट था कि तत्कालीन स्थानीय प्रशासन जिसे अब एमसीए$फ कहते हैं, के कर्मचारियों ने इसे अपनी लूट कमाई का एक स्थायी साधन बना लिया था। इस तथ्य को समझते हुए तत्कालीन मुख्य प्रशासक बी. उमाशंकर ने कड़ा फैसला लेते हुए इस स्ट्रीट लाइट पर किसी भी प्रकार का कोई काम न करने का आदेश दिया। उनका मानना था कि जब इस सड़क पर कहीं न कहीं अंधेरा ही रहना है तो इसे यूं ही रहने दो और खर्च करने की जरूरत नहीं है।

यह उदाहरण तो मात्र एक सड़क भर का है। जब यह काम पूरे शहर भर के स्तर पर होगा तो क्या-क्या ड्रामे इस शहर में नहीं होंगे, समझना कठिन नहीं है। बताने की जरूरत नहीं है कि बीते 45 वर्ष के मुकाबले आज कल रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी, लूट कमाई की दरें पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी हैं। इसलिए शहरवासियों को उक्त सरकारी योजना की घोषणा से खुश होने की जरूरत नहीं है।
ख्याली पुलाव तो अंडरग्राउंड इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई के पका रहे हैं लेेकिन आज तक पूरे शहर को आवयश्यता के मुताबिक सब स्टेशन और ट्रांसफार्मर उपलब्ध नहीं करा सके हैं। नहर पार की कॉलोनियों और सोसायटियों से सरकार सैकड़ों करोड़़ रुपये वसूल कर हजम कर चुकी है इलाके के लिए जो सब स्टेशन बनाने थे वो नहीं बनाए। हां, धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाली अम्मा के हॉस्पिटल के लिए आनन फानन सब स्टेशन बना दिया गया, इलाके के लोग सब स्टेशन के लिए आज भी तरस रहे हैं। नहर पार ही नहीं बाकी शहर भी जितने सब स्टेशन होने चाहिए वो भी पूरे नहीं हैं। पर्याप्त ट्रांसफार्मर भी सरकार नहीं उपलब्ध करा पाई है, यही कारण है कि आए दिन लो वोल्टेज और ट्रांसफार्मर फुकने की घटनाएं होती रहती हैं। अंडरग्राउंड बाद में कर लेना पहले जरूरत के मुताबिक आधारभूत ढांचा तो दुरुस्त कर लो।

झुके हुए जाट और टूटी खाट की कद्र नहीं होती
मोदी से भयभीत होकर धनखड़ द्वारा उप राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना इसी जुमले की हकीकत सिद्ध करता है जाट कौम वीरता और साहस का परिचायक समझी जाती है लेकिन धनखड़ ने जिस तरह से लीद करी है उससे पूरी जाट कौम को उसने शर्मसार कर दिया है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार जब धनखड़ ने इस्तीफे से दस्तखत करने से मना करना चाहा तो संबंधित मंत्री द्वारा इनके विरुद्ध महाभियोग चलाया जाने की धमकी दी गई थी। विदित है कि कुछ माह पूर्व विपक्षी सांसदों ने इनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव राज्य सभा में पेश किया था जिसे धनखड़ ने दबवा दिया था। उसी के परिप्रेक्ष्य में मंत्री ने इन्हें महाभियोग की धमकी दे डाली, यदि धनखड़ में जरा भी साहस व संघर्ष करन का माद्दा होता तो वे त्यागपत्र पर दस्तखत करने के बजाय महाभियोग का सामना करने को प्राथमिकता देते। यह भी स्पष्ट है कि राज्यसभा में सत्तारूढ़ दल का बहुमत नहीं है और इन परिस्थितियों में सहयोगी दल भी शायद सत्तारूढ़ दल का साथ नहीं देते।

विधि विशेषज्ञों को का तो यहां तक भी कहना है सभापति होने के नाते वे महाभियोग के प्रस्ताव आने मेें ही अनेकों रुकावटें खड़ी कर सकते थे, यदि फिर भी प्रस्ताव आ जाता तो जब महाभियोग की कार्रवाई चलती तो धनखड़ को भी खुलकर बोलने का मौका मिलता और वे सत्तारूढ़ दल की ऐसी धज्जियां उड़ाते जो कि याद रखते। अभी तक जिस तरह से धनखड़ अपनी शक्तियों का दुरुपयोग विपक्षी दलों को दबाने में करते थे वही दुरुपयोग वे सत्तारूढ़ दल को भी दबाने में करते। जाहिर है कि सत्ता सुख में डूबे मंत्रियों व सांसदों को खून के आंसू बहाने पड़ जाते। समझा जा सकता है कि ऐसे हालात में सत्तारूढ़ दल का एक भी बिल पास नहीं हो सकता था।

रही बात उपराष्ट्रपति होते हुए धनखड़ पर किसी प्रकार की छापेमारी करना यानी उनके घर पर ईडी सीबीआई, इनकम टैक्स आदि को भेजना किसी भी सूरत में मुमकिन नहीं हो सकता था। जिस संवैधानिक पद पर वे बैठे थे उस पर से उन्हें हटाना मोदी के बस की बात नहीं थी। दरअसल, मोदी भी कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं उनमें यही तो एक दक्षता है कि वे व्यक्ति का चुनाव करते समय खूब अच्छी तरह से झाड़ पिछोड़ कर देख लेते हैं कि इसकी आत्मा मर चुकी है या नहीं, कल को इसकी आत्मा जीवित तो नहीं हो उठेगी, इसमें संघर्ष करने के कीटाणु तो नहीं पैदा हो जाएंगे। धनखड़ के पुराने इतिहास का अध्ययन करके मोदी ने इन सब तथ्यों की पुष्टि करने के बाद ही इस झुके हुए जाट को इस पद तक पहुंचाया था। मोदी सरकार का यह कदम हमें उस तानाशाही राज व्यवस्था को दर्शाता है जिसमें सत्ता के खिलाफ मुंह खोलने वालों को कैदखानों में डाल दिया जाता है अथवा लापता कर दिया जाता है, चीन में अक्सर ऐसा ही होता है और उत्तरी कोरिया में तो सीधे गोली ही मार दी जाती है। यदि मोदी सरकार की फासीवादी प्रवृत्ति को इसी तरह बढऩे दिया गया तो भारत में भी वही सबकुछ होने लगेगा जो फासीवादी देशों में होता है।

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Mazdoor Morcha
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