फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शहर की डबुआ कॉलोनी स्थित जामा मस्जिद के ठीक सामने वाली गली में बीते शनिवार को संघ-भाजपा समर्थित दंगाई लक्ष्मण और उसके साथियों ने जबरन महाबीर गली नाम का बोर्ड टांगने का प्रयास किया। बोर्ड का खंभा दुकान के सामने आने से दुकानदारी खराब होने की आशंका पर गुस्साए सन्नी, जय दयाल और आजाद शर्मा नामक दुकानदारों ने लक्ष्मण और उसके दंगाई साथियों का विरोध किया। गली में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव खराब करने के इरादे से आए दिन बवाल-दंगे का प्रयास करने वाले लक्ष्मण का स्थानीय नागरिकों सहित मुसलमानों ने भी विरोध किया।
बिट्टू बजरंगी और संघी दंगाइयों के टुकड़ों पर पलने वाले गोदी सोशल मीडिया ने इसे तुरंत ही मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के आराध्य महाबीर हनुमान का अपमान बता कर माहौल खराब करने का प्रयास किया। बोर्ड लगाने के विरोध में हिंदू-मुस्लिम पक्ष के करीब डेढ़ सौ लोग डबुआ थाने पहुंच गए और दंगाइयों को रोकने की मांग करने लगे। सोशल मीडिया का साथ पाकर डबुआ पुलिस भी निष्पक्ष न होकर सनातनी भाजपाई सरकार की प्रतिनिधि के रूप में काम करने लगी। सुधी पाठकों को मालूम होगा कि किसी भी गली या सड़क का नामकरण दंगाइयों की भीड़ की इच्छा पर नहीं कर दिया जाता। इसके लिए नगर निगम सदन में बाकायदा प्रस्ताव रखा जाता है, बहुमत से पास होने के बाद सरकार उस गली का नाम रखे जाने का नोटिफिकेशन जारी करती है। आम तौर पर इस तरह के मामलों में पुलिस निष्पक्षता से काम करती है और यदि आपत्ति जायज हो तो दोनों पक्ष को यथास्थिति बनाए रखने और अदालत या प्रशासन से अनुमति लेकर आने की सलाह देती है।
इसके विपरीत पुलिस संघियों और सनातनी दंगाइयों का पक्ष लेती नजर आई। अब क्योंकि मामला हिंदुत्व एवं कट्टरपंथियों का था तो खुद को सनातनी विधायक कहने वाले सतीश फागना के प्रतिनिधि कविंद्र चौधरी भी थाने पहुंच गए। पुलिस भी कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी ताक पर रख कर माननीय सत्ताधीश की चाकरी में लग गई। मौके पर पहुंची पुलिस ने जब देखा कि बोर्ड लगाने का विरोध करने वाले सन्नी, जय दयाल और आजाद शर्मा भी हिंदू हैं, इस पर भी दंगाइयों को बोर्ड लगाने स दंगाइयों की मंशा पूरी कराने के बाद पुलिस ने खुद को निष्पक्ष साबित करने के लिए शब्बीर अहमद की तहरीर पर लक्ष्मण, उसके भतीजे सहित सात लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया।
शब्बीर अहमद की शिकायत के मुताबिक डबुआ कॉलोनी 33 फीट रोड स्थित जामा मस्जिद के सामने लक्ष्मण नाम का व्यक्ति रहता है। जो करीब एक साल से धार्मिक दंगे कराने के लिए उल्टे सीधे काम करता है। कभी दारू पीकर मस्जिद पर हमला करता आ रहा है और तेज आवाज में स्पीकर पर लोगों को भड़काने व उकसाने वाले गाने चलाता है। इसमें उसका साथ गौतम, सुभाष प्लंबर, लक्ष्मण का भतीजा, सोनू प्लंबर, राजकुमार प्लंबर, योगेश तायल समेत 20-25 लोग देते हैं।
शनिवार को लक्ष्मण अपने इन्हीं साथियों के साथ मस्जिद के सामने वाली गली में एक विशेष धार्मिक गेट लगा रहा था। इस पर आपत्तिजनक नारे लिखे हैं। समाज और पुलिस ने उसे बोर्ड लगाने से रोकने की कोशिश की लेकिन लक्ष्मण व अन्य ने गली बंद करने की नीयत से बहुत सारे लोगों को बुलाकर इकट्ठा कर लिया। ये सारे लोग इकट्ठा होकर धार्मिक नारे लगा रहे हैं और दंगा करना चाहते हैं।
लक्ष्मण पहले भी मुस्लिम समाज को कठमुल्ला, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी कह कर भावनाएं आहत करता आ रहा है। पुलिस ने लक्ष्मण व अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 (धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 299 (जानबूझ कर दूसरे धर्म व उससे जुड़ी चीजों का अपमान करना, ठेस पहुंचाना) 3 (सामूहिक रूप से किए गए अपराध के लिए उत्तरदायी ठहराना) और 302 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझ कर शब्दों आदि का उच्चारण करना) के तहत केस दर्ज करने का दिखावा किया है।
दंगाई बिट्टू बजरंगी के खिलाफ इसी तरह के लगभग चार केस दर्ज हैं लेकिन आज तक किसी में भी उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। हां, नूंह दंगों में उसकी गिरफ्तारी इसलिए की गई थी कि मुस्लिम पक्ष इकतरफा कार्रवाई का आरोप न लगा सके। इसके बाद उसे चंद सप्ताह में ही जमानत मिल गई जबकि पीडि़त मुस्लिम पक्ष आज तक बेल के लिए तरस रहा है।
लक्ष्मण के मामले में भी पुलिस उसकी गिरफ्तारी करने से तो रही क्योंकि केस मे लगाई गई धाराओं में अधिकतम सजा ही तीन साल है, ऐसे में उसे थाने से नहीं तो कोर्ट से जमानत मिल जाएगी। जिस तरह बिटुआ के केसों की जांच चल रही है लक्ष्मण की भी उसी तरह चलेगी। यानी सत्ता और पुलिस की शह पर उसे दंगे भड़काने की खुली छूट मिल गई है।े नहीं रोका बल्कि सन्नी पक्ष पर समझौता करने का दबाव बनाया गया, अंत में तय हुआ कि बोर्ड एक खंभे पर ही खड़ा किया जाएगा सन्नी आदि की दुकान के सामने कोई खंभा नहीं लगाया जाएगा। इसके बाद मुस्लिम पक्ष के विरोध को अनदेखा कर पुलिस ने खुद खड़े होकर दंगाइयों का बोर्ड लगवाया।
दंगाइयों को है लाउडस्पीकर की खुली छूट कानून के अनुसार कोई भी व्यकित लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बिना प्रशासन की अनुमति के नहीं कर सकता। इसके लिए 11 रुपये की टिकट लगा कर एसडीएम को आवेदन करना पड़ता है। एसडीएम इस आवेदन को पुलिस को मार्क करता है। पुलिस की अनापत्ति के लेने के बाद एसडीएम निर्धारित करता है कि कितने घंटे, किस एरिया में और कितनी वाल्यूम पर लाउडस्पीकर बजाया जाना है। मतलब स्पष्ट है प्रशासन और पुलिस की अनुमति के बगैर कोई भी लाउडस्पीकर नहीं बजा सकता। डबुआ कॉलोनी में हिंदू मुस्लिम की मिलीजुली आबादी बरसों से शांतिपूर्ण ढंग से रहती आ रही है लेकिन सांप्रदायिक दंगाइयों को यह शांति रास नहीं आ रही। इसलिए सरकारी संरक्षण में संघी उत्पाती अपनी ओर से दंगा भड़काने की कोई कसर छोडऩा नहीं चाहते। एक ने तो जामा मस्जिद के ठीक सामने अपने घर पर स्थायी लाइडस्पीकर लगा रखे हैं। इन लाइडस्पीकरों पर हिंदू धर्म की गाथाएं गाने वाले भजन नहीं बजाए जाते बल्कि मोदी-भाजपा को प्रमोट करने वाले कथित उन्मादी और कट्टर शब्दावली वाले गाने तेज आवाज में बजाए जाते हैं। लेकिन मुस्लिम बहुत सियाने हो चुके हैं अब वो भड़कावों से भड़कने के बजाय सब्र का घूंट पीकर चुप रहने में ही भलाई समझते है क्योंकि वे समझते हैं कि ये दंगाई गुंडे सरकार की शह पर ही गुंडागर्दी कर रहे हैं। जिस दिन इन उन्मादियों को पता लग जाए कि अब सरकार एवं पुलिस उनको पिटने से बचाने वाली नहीं है तो ये ऐसे बिलों में घुस जाएंगे कि ढूंढे से भी न मिलें। ये लोग केवल पुलिस की सरपरस्ती में ही गुंडागर्दी करने की सामथ्र्य रखते हैं।