कई सरकारी प्रयोगशालाओं ने पाया है कि यह पानी नहाने योग्य भी नहीं है। इसी प्रयागराज में कई गंदे नाले गंगा में मिलते हैं। अतीत में कभी आपने सुना कि सनातन धर्म के इन महामंडलेश्वरों ने भारत की पवित्र नदियों को स्वच्छ बनाये रखने के लिये राष्ट्रव्यापी आंदोलन उपवास किया हो? उल्टे दशकों तक अपने आश्रमों का मल इनमें बहाया है। मंत्रोच्चार हवन दूध बहाने की नौटंकी ढोंग से नदियां आज तक सा$फ क्यों नहीं हुई? पहले से लगातार दूषित ही हुई हैं। सब सरकारें और पार्टियां भी इसमें गुनहगार हैं, कोई पार्टी अपवाद नहीं।
चल रहे महाकुंभ में यहां दिख रहे चार महामंडलेश्वर और एक स्वयम्भू योगऋषि एक राजनीतिक सत्तासीन व्यक्ति का मंत्रोच्चार सहित अभिषेक कर रहे हैं। इसके वीडियो भी उपलब्ध हैं, उन्हें देख सुनकर इन कथित धर्म ध्वजावाहकों के प्रति किसी को भी जुगुप्सा हो सकती है। बाक़ी संतों साधुओं को पहुंचने नहीं दिया गया वरना भीड़ ज़्यादा हो जाती।
सनातन धर्म का वास्तविक पतन या पराभव क्यों हुआ उसका एक कारण यहां दिख रहा है। ये संत साधु कहलाने लायक़ ही नहीं बल्कि धर्मतंत्र के नौकरशाह हैं। जो भी राजा हो, सत्ताधारी हो उसी की दुंदुभी बजाना इस पंथिक श्रेष्ठि वर्ग का प्राचीन काल से ही कर्तव्य हो चुका है। जैसे ही सत्ता परिवर्तन होता है ये सब भाग भाग कर बिन बुलाये नये राजाओं को आशीर्वाद के बहाने अभिनंदन करने चले जाते हैं। सत्तासामंत और धर्म ध्वजाधारियों का गठजोड़ ही भारतीय समाज के मानसिक दासत्व के दोषी हैं। जनता तो है ही!
अंग्रेज़ी दासता काल में भी ब्रिटेन के सम्राट किंग जॉर्ज जब बनारस हिंदू युनिवर्सिटी की स्थापना के अवसर पर बनारस पहुंचे थे तो पुरोहितों पुजारियों के समूह ने स्तवन व मंत्रोच्चार करते हुये उसके साम्राज्य के फलने-फूलने का आशीर्वाद दिया था। उसी दिन नियत सभा में मोहनदास करमचंद गांधी नाम के साधारण व्यक्ति ने एक ऐतिहासिक भाषण कर गुलाम मानसिकता के शोषक राजाओं को नंगा कर दिया था, ललकार कर युवाओं को उठ खड़े होने का आवाहन भी किया था। तब भी कई धर्मगुरु बिलबिलाये थे। सनातन नियमों परिपाटियों और शास्त्रों के अनुसार महाकुंभ में अभिषेक ईश्वर के विग्रहों का होना चाहिये, शिव रूप लिंग का होना चाहिये और सबके द्वारा! पार्थिव शिव लिंग के अभिषेक का प्रावधान भी ऐसे ही अवसरों के लिये संभवत: किया होगा! लेकिन गंगाजी को स्त्रोत पर ही प्रदूषित करने वाले और कालेधन से आश्रमों को संचालित करने वालों के मन में ऐसा डर (भक्ति भाव) कि ख़बर लगी और दौड़े चले आये।
लाखों श्रद्धालुओं को भारी असुविधा है लेकिन कुछ वीआईपी और धनाढ्य वर्ग सनातन धर्म को हाईजैक कर चुके हैं। इस दृश्य की पराकाष्ठा भी पांच फऱवरी को दृष्टव्य होगी जब भारत के आधुनिक सम्राट संगम में पधारेंगे! सनातन धर्म में महाकुंभ का मूल विचारतत्व, संवाद-शास्त्रार्थ, निर्मल जलधारा का माहात्म्य, श्रद्धालु जन के लिये समान अवसर और सादगी से छ: हफ़्ते पवित्र नदी तट का जीवन आदि सब कुछ तिरोहित हो चुका है! चकाचौंध, भव्यता, वीआईपी अहंकार, महंगी गाडिय़ों की रेलमपेल, पुलिस व प्रशासनिक हस्तक्षेप से संगम पर अनाधिकार, पूंजी का बेशर्म प्रदर्शन, सत्ता का अट्टहास, चहुंओर राजनीतिक नेताओं के हजारों होर्डिंग, सुविधाओं व व्यवस्थाओं का मात्र झूठा प्रचार ही चल रहा है। कोई सोचने के लिये भी तैयार नहीं है कि कैसे वर्तमान व भविष्य की ओर सब बढ़ रहे हैं। -पंकज श्रीवास्तव