क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा यह सवाल, 1920 में हुई, कोमिन्टर्न की दूसरी कांग्रेस में, जर्मनी के कम्युनिस्टों ने पूछा था, इसलिए, लेनिन का जवाब भी, जर्मनी के वामपंथियों के संदर्भ में ही है, लेकिन वह, हर देश के लिए लागू है. ”संसद ऐतिहासिक रूप से कालबाह्य हो चुकी है, प्रचार के लिए ऐसा कहना ठीक है. लेकिन हर कोई जानता है कि असलियत में ऐसा होना, बहुत दूर की बात है. ऐसे तो, पूंजीवाद भी कई दशक पहले कालबाह्य हो चुका है, ऐसा कथन बिलकुल उचित है…..
जब वहां करोड़ों-करोड़ सर्वहारा, ना सिफऱ् संसद पर भरोसा करते हैं, बल्कि (संसद पर भरोसा कर), क्रांतिविरोधी हो गए हैं. ज़ाहिर है, जर्मनी में संसद कालबाह्य नहीं हुई है. यह भी स्पष्ट है कि जर्मनी के वामपंथियों ने अपनी अभिलाषा, उनके ख़ुद के राजनीतिक-सैद्धांतिक दृष्टिकोण को वस्तुगत सच्चाई समझ लिया है. यह बहुत ही ख़तरनाक ग़लती है, जो क्रांतिकारी अक्सर करते हैं. ….रूस में, हमने, क्रांतिकारियों को यह ग़लती करते हुए, बहुत नज़दीक से देखा है, इसका बहुत सावधानी से अध्ययन किया है. इसीलिए हमें इसका बहुत अच्छा तजुर्बा है. यही वज़ह है कि हम दूसरे लोगों में व्याप्त इस कमज़ोरी को हम बहुत आसानी से भांप लेते हैं. जर्मनी के कम्युनिस्टों के लिए, संसद, वाक़ई कालबाह्य हो चुकी है; लेकिन यही तो असली पेच है, जिसे अच्छी तरह समझा जाना ज़रूरी है. यह सोचना, कि जो बात हम कम्युनिस्टों के लिए कालबाह्य है, वह जन-मानस के लिए भी कालबाह्य है, बहुत बड़ी ग़लती है. हम महसूस करते हैं कि ‘वामपंथी’, अक्सर, यह ग़लती करते हैं. उन्हें इस बात को तकऱ्पूर्ण ढंग से, रखना आता ही नहीं. वे नहीं समझते कि ‘वर्ग की पार्टी’ को, ‘जन-मानस की पार्टी’ के रूप में किस तरह काम करना होता है. आपको, ख़ुद को,जन-मानस या वर्ग के वैचारिक रूप से पीछे रह गए सदस्यों के स्तर तक नहीं गिराना. इसमें दो मत नहीं हो सकते. उन्हें यह कड़वी सच्चाई बताना, कि उनके बुर्जुआ जनवादी और संसदीय पूर्वाग्रह, सच्चाई नहीं पूर्वाग्रह हैं, आपकी जि़म्मेदारी है. लेकिन इसके साथ ही, जन-मानस की वर्गीय चेतना का जो वास्तविक स्तर है, और समूचे मज़दूर वर्ग की (सिफऱ् वर्ग के अगुवा दस्ते की नहीं), तथा समूचे मेहनतक़श अवाम की (उसके राजनीतिक रूप से सचेत तबक़े की नहीं) तैयारी की जो हक़ीक़त है, उसे, आपको पूरी विनम्रता से, स्वीकार करना है.
राहुल गाँधी के नेतृत्व में, कांग्रेस ने, चुनावी फर्जीवाड़े के जो सबूत खोद निकाले हैं, उनसे जो सच्चाई सामने आई है, उससे करोड़ों जन-मानस की आंखें खुलेंगी, उनके संसदीय पूर्वाग्रह मिटेंगे, उन्हें समझ आएगा संसदीय चुनावों की सार्थकता ख़त्म हुई, बुर्जुआ संसद कालबाह्य हो चुकी है. इतना क्रेडिट तो उन्हें देना ही चाहिए.