फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एक दशक तक सत्ता में बने रहने वाली भाजपा के लिए यह विधानसभा चुनाव आसान नहीं होने वाला है। सत्ता विरोधी लहर के साथ ही उसके प्रत्याशियों को पार्टी के उन दुश्मनों का भी सामना करना पड़ रहा है जो टिकट पाने के बड़े बड़े दावे कर रहे हैं। पार्टी में संकट कितना गहरा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संघ अपने खांटी कार्यकर्ताओं को सत्ता का सुख देने के लिए प्रदेश के 70 प्रतिशत विधायक मंत्रियों के टिकट काटने की रणनीति बना रहा है तो भाजपा नेता पुराने नेताओं पर ही दांव खेलने का जोर लगा रहे हैं, इन सबके बीच खुद को जन सेवक बताने वाले भाजपाई भी टिकट पाने के लिए मंत्री से लेकर भाजपा और संघ पदाधिकारियों को साधने में जुटे हैं।
फरीदाबाद में बडख़ल, फरीदाबाद और एनआईटी विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा दावेदार नजर आ रहे हैं। बडख़ल में सीमा त्रिखा का ओहदा हाल ही में उन्हें शिक्षामंत्री पद देकर बढ़ाया गया है। बावजूद इसके उनके विधानसभा क्षेत्र में उन्हें भाजपा कार्यकर्ताओं से टक्कर मिल रही है। इनमें सबसे ऊपर धनेश अदलखा का नाम चल रहा है। पूर्व सीएम खट्टर और केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर के करीबी धनेश ने यहां से चुनाव लडऩे के लिए मोटी कमाई वाली हरियाणा फार्मेसी काउंसिल की चेयरमैनशिप से तीन महीने की छुट्टी ली है। खुद का दावा साबित करने के लिए अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन भी छपवा रहे हैं। पूरे एक पेज के विज्ञापन में केवल धनेश ही छाए थे न तो भाजपा का चुनाव चिह्न और न ही मोदी-शाह, सीएम सैनी, केंद्रीय मंत्री गूजर की फोटो। यदि विज्ञापन के पीछे के संदेश को समझा जाए तो इसका अर्थ निकलता है कि यदि उसे भाजपा से टिकट नहीं मिला तो वह निर्दलीय भी खड़ा हो सकता है। कुछ जानकार ये भी बता रहे हैं कि बडख़ल विधानसभा से अगर उसे टिकट नहीं मिला तो वह सीमा त्रिखा के सामने अपनी पत्नी को उतार सकता है।
दूसरा नाम भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव जेटली का है, वह भी कई महीनों से जन संपर्क कर अपने आप को बडख़ल प्रत्याशी की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। राष्ट्रीय प्रवक्ता होने की आड़ में सप्ताह में तीन से चार दिन चंडीगढ़ सचिवालय में गुजारने वाले जेटली को बड़ा लाइजनर माना जाता है। पंजाबी होने के कारण जेटली खट्टर के तो करीबी हैं ही, क्योंकि वो फंसी फाइलें क्लियर कराने में महारत रखते हैं इसलिए उद्यमियों- बिल्डर, जमीन के कारोबारियों में भी उनकी अच्छी पकड़ है। इन कामों के लिए मिलने वाली बख्शीश सबको बांटने के कारण वह मुख्यालय के अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक सबके खास हैं। हालांकि उनका कोई जनाधार देखने को नहीं मिलता लेकिन सूत्रों के अनुसार भाजपा के आला नेताओं की शह पर वह अपनी उम्मीदवारी घोषित कर रहे हैं।
तीसरा बड़ा नाम राजन मुथरेजा का है, केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर के खास मुथरेजा उनके लिए जमीन खरीद-फरोख्त से लेकर फाइनेंस आदि का इंतजाम करते हैं। मंत्री की शह पर राजन भी बडख़ल में ताल ठोंक रहे हैं। वह भाजपा विधानसभा कोषाध्यक्ष हैं इस नाते उनका पार्टी के बड़े नेताओं से अच्छा संपर्क है। इन बड़े दावेदारों के अलावा अपनी दावेदारी पेश करते हुए बैनर पोस्टर लगा रहे हैं।
एनआईटी विधानसभा सीट पर भी भाजपा से कई दावेदारी कर रहे हैं, इनमें पहला नाम तो इनेलो के पूर्व विधायक और भाजपा नेता नागेंद्र भड़ाना का ही है। पिछले चुनाव में भाजपा के टिकट पर लड़े नगेंद्र 3442 वोटों से हारे थे। हारने के बावजूद वह लगातार जन संपर्क में जुटे रहे। हालांकि उन पर बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा से भितरघात करने का आरोप लगा था, जो उनकी दावेदारी को थोड़ा कमजोर करता है।
भाजपा का टिकट हथियाने में उन्हें कड़ी टक्कर नीरा तोमर दे रही हैं, भाजपा की प्रांतीय उपाध्यक्ष नीरा तोमर को बीते लोकसभा चुनाव में फरीदाबाद लोकसभा क्षेत्र की चुनाव समिति का संयोजक नियुक्त किया गया था, तब से उनका राजनीतिक रसूख बढ़ता जा रहा है। प्रमुख दावेदारों मेें यशवीर डागर का नाम भी है, वह भी लंबे अर्से से एनआईटी विधानसभा क्षेत्र में जन संपर्क में जुटे हुए हैं, स्कूल मालिक होने के कारण पार्टी के धनपशुओं में शुमार यशवीर पैसा बहाने में भी पीछे नहीं रहेंगे, आरएसएस से जुड़ा होना अतिरिक्त फायदा होगा, यदि टिकट बंटवारे में आरएसएस की चली तो यशवीर के प्रत्याशी होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा होंगी।
पूर्व पार्षद बीर सिंह नैन भी मजबूती से दावेदारी पेश कर रहे हैं, लोकसभा चुनाव में कृष्णपाल गूजर का बेशर्त समर्थन करने के कारण उन्हें गूजर का वरद्हस्त हासिल है, इसी दम पर वो ताल ठोंक रहे हैं। इनके अलावा आरएसएस के स्वयंसेवक होने के कारण आरएन सिंह, प्रणव शुक्ला आदि भी अपनी अपनी तरह दावेबाजी कर रहे हैं, इन दोनों नेताओं का जनाधार तो नहीं है लेकिन उन्हें लगता कि शाखाओं में झंडे उठाने और दरी बिछाने का ईनाम उन्हें टिकट के रूप में दिया जा सकता है। इसी उम्मीद में ये लोग भी बैनर पोस्टर, वाल पेंटिंग के जरिए खुद को भाजपा प्रत्याशी साबित करने में जुटे हैं।
फरीदाबाद विधानसभा सीट पर भी इस बार भाजपा प्रत्याशियों में घमासान मचेगा। विधायक नरेंद्र गुप्ता आश्वस्त हैं कि उनके द्वारा कराए गए कार्योंं को देखते हुए पार्टी उनको एक बार फिर टिकट देगी। हालांकि टिकट के सबसे बड़े दावेदारों में पूर्व कैबिनेट मंत्री और भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष विपुल गोयल ने तो क्षेत्र में दिहाड़ी कार्यकर्ताओं की फौज उतार दी है। मीडिया, सोशल मीडिया को भी धनबल के दम पर साधा जा रहा है, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ा अडंग़ा केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर का उन्हें समर्थन नहीं होना होगा। यदि टिकट बांटने में संघ की चली तो स्वयंसेवक होने के कारण गूजर की सलाह संघ खारिज नहीं करेगा। कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद पिछले चुनाव में विपुल गोयल का टिकट कटवाने में भी गूजर का ही नाम आया था।
पूर्व मुख्यमंत्री खट्टर के कलेक्शन एजेंट रहे अजय गौड़ ने भी भाजपा प्रत्याशी होने का अभियान छेड़ रखा है, ऑटो, रिक्शा के हुड पर प्रचार से लेकर ओल्ड फरीदाबाद में खंभों पर पोस्टर बैनर से लेकर अखबारों में पैंफ्लेट लगवा कर दावेदारी प्रस्तुत की जा रही है। भाजपा सूत्रों के अनुसार खट्टर ने डेढ़ साल पहले ही अजय को फरीदाबाद विधानसभा सीट से टिकट देने का आश्वासन दिया था।
आश्वासन मिलने के कारण ही उन्होंने पार्टी का राजनीतिक सचिव का पद त्याग कर जन संपर्क करना शुरू कर दिया था। हालांकि खट्टर को भी नहीं मालूम था कि उनके निकम्मेपन के कारण मोदी उनसे ही सीएम की कुर्सी छीन लेंगे। सैनी के सीएम बनने के साथ ही पूरे प्रदेश में भाजपा के समीकरण बदले, इसका असर अजय गौड़ पर भी पड़ा। राजनीति छोड़ कर एक बार फिर पार्टी में प्रदेश स्तर का पद तलाशने लगे, प्रदेश अध्यक्ष पद के दावेदार बने लेकिन मोहनलाल बड़ौली बाजी मार ले गए।
पार्टी सूत्रों के अनुसार अजय को अभी भी खट्टर और केंद्रीय मंत्री गूजर का समर्थन हासिल है। इनके अलावा खुद को भाजपा का संस्थापक सदस्य बताने वाले मूलचंद मित्तल भी सत्ता की मलाई चाटने को आतुर नजर आ रहे हैं। साढ़े चार दशक तक पार्टी की सेवा करने के बावजूद उन्हें कभी कोई लाभ का पद नहीं मिला, इसलिए इस बार वो भी टिकटार्थियों की लाइन में लगे हैं। उनके अलावा संघ की पृष्ठभूमि वाले मनमोहन गुप्ता भी कोई जनाधार नहीं होने के बावजूद टिकट की दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं, उनकी योग्यता संघ की शाखाओं में दरी बिछाना और झंडा उठाना ही काफी मानी जा रही है। इनके अलावा केंद्रीय मंत्री गूजर के करीबी उद्योगपति, निवर्तमान डिप्टी मेयर मनमोहन गर्ग और एडवोकेट शिवदत्त वशिष्ठ भी खुद को टिकट का मजबूत दावेदार बता रहे हैं।
खुद को अनुशासित और पार्टी विद डिफरेंस बताने वाली भाजपा के नेताओं में विधायकी का सुख हासिल करने के लिए डिफरेंस साफ नजर आने लगे हैं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार सत्ता के चरम पर जो बुराइयां कांग्रेस पार्टी में पैदा हुईं थी, जिनमें सत्ता पाने के लिए कार्यकर्ताओं के अनेक गुट बनना प्रमुख है, वहीं बुराइयां अब भाजपा में भी दिख रही हैं। कार्यकर्ताओं की महत्वाकांक्षाओं की अनदेखी करने के कारण ही जिस तरह कांग्रेस गर्त में धंसती चली गई, वैसे ही समीकरण भाजपा में भी बनते नजर आ रहे हैं।