ऋ षभ श्रीवास्तव राग दरबारी पढ़ते हुए छुआछूत के प्रति जुगुप्सा नहीं होती, हंसी आती है। पर मुर्दहिया का उद्धरण पढ़ कर क्रोध और ग्लानि होती है. हिंदी साहित्य में