फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सूरजकुंड थाना परिसर में चार कमरों का निर्माण अवैध रूप से किया जा रहा है। अवैध इसलिए कि यह परिसर ही नहीं पूरा क्षेत्र पीएलपीए संरक्षित वन क्षेत्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में आता है। पीएलपीए संरक्षित वन क्षेत्र में किसी भी तरह की गैर वानिकी गतिविधि जिसमें निर्माण भी शामिल है, पूर्णतया प्रतिबंधित है। इसी तरह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियम अनुसार ऐतिहासिक महत्व की संरक्षित इमारत के तीन सौ मीटर के दायरे में बिना एएसआई की अनुमति के कोई स्थायी निर्माण नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके चार कमरों का निर्माण जारी है।
पुलिस महानिदेशक शत्रुजीत कपूर वर्ष 2012-13 में फरीदाबाद के पुलिस आयुक्त रह चुके हैं। तब उन्होंने अवैध निर्माण पर निगरानी रखने और रोक लगाने के लिए सभी थाने, चौकी को आदेश जारी किया था कि उनके इलाके में होने वाले अवैध निर्माण की जानकारी वन विभाग, डीटीपी, नगर निगम को दी जाए और तत्काल अवैध निर्माण रोका जाए। उनके इस आदेश को बाद के पुलिस आयुक्त अरशिंदर चावला और सुभाष यादव ने भी लागू करवाया।
यानी किसी भी तरह के अवैध निर्माण को रोकना पुलिस महकमे की भी जिम्मेदारी है। इसके विपरीत थाना परिसर में हो रहे निर्माण की न तो वन विभाग से अनुमति ली गई है जो पीएलपीए संरक्षित क्षेत्र होने के कारण मिलती भी नहीं, न ही नगर निगम से और न ही डीटीपी से। ऐसा नहीं है कि इन अधिकारियों को निर्माण की जानकारी नहीं है, बावजूद इसके सब सुप्रीम कोर्ट के आदेश व पीएलपीए कानून को ताक पर रख कर आंखें बंद किए हुए हैं। जब कानून को लागू कराने वाले ही उल्लंघन करें तो संरक्षित वन कौन बचाए ?
दरअसल, अवैध निर्माण करवाने वाले और चुप्पी साधे अधिकारी जानते हैं कि सरकार भी इस कानून को खत्म करने पर आमादा है। जानकारों के अनुसार सीएम खट्टर ने तो फरवरी 2019 में बाकायदा पीएलपीए संशोधन बिल भी सदन से पास करा लिया था और जून 2019 में राज्यपाल ने इसे स्वीकृति भी दे दी थी। इसे रद्द किए जाने के लिए शिवालिक विकास मंच के अध्यक्ष विजय बंसल एडवोकेट ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी हरियाणा सरकार को बिल में संशोधन करने पर लताड़ लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है हरियाणा सरकार वन एवं वन्य जीवों को खत्म करना है और अपने निजी चहेते बिल्डर्स को फायदा पहुंचाना चाहती है। हरियाणा सरकार कानून से ऊपर नहीं है और इस बिल को पास न किया जाए। बावजूद इसके सरकार ने छिपते-छिपाते इसे पास कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका है।
बावजूद के खट्टर इस संशोधन को लागू करवाने पर अड़े रहे। वर्तमान सीएम सैनी भी उसी थाली के चट्टे बट्टे हैं यानी वह भी संरक्षित वनों को बर्बाद करने वालों के साथ खड़े हैं। जब हाकिम ही वन क्षेत्र भूमाफिया के हवाले करने की नीयत रखता हो तो प्यादों का कानून तोडऩा तय है। यही सूरजकुंड थाना परिसर में अवैध निर्माण के रूप में नजर आ रहा है। संदर्भवश सुधी पाठकों को बताते चलें कि सूरजकुंड थाने के ठीक सामने स्थित पर्यटन विभाग का सनबर्ड रेस्टोरेंट का निर्माण कार्य पीएलपीए संरक्षित वन क्षेत्र में होने के कारण कई वर्षों से रुका हुआ है। सनबर्ड का निर्माण तो रुका हुआ है लेकिन उसके ठीक पचास कदम दूर थाना परिसर में निर्माण धड़ल्ले से जारी है।
समझने वाली बात है कि जिस सनबर्ड के निर्माण से सरकार के राजस्व में इजाफा होता, उसे तो नहीं बनाया जा रहा लेकिन थाने के चार कमरे बनाए जा रहे हैं। अब जब पुलिस ही अवैध निर्माण करा रही हो तो नगर निगम, डीटीपी, वन विभाग के अधिकारियों की क्या हिम्मत कि विरोध कर दें। रही बात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण महकमे की तो उसके निकम्मे अधिकारियों ने जब तीन सौ मीटर परिधि में निजी बिल्डर द्वारा कराए जा रहे निर्माण को नहीं रुकवाया तो सैनी की पुलिस को क्यों रोकेंगे, निर्माण से चाहे ऐतिहासिक सूरजकुंड को खतरा हो या वन को नुकसान पहुंचे, उन्हें क्या?
गौरतलब है कि करीब पैंतीस साल पहले सूरजकुंड परिसर में पुलिस चौकी की स्थापना की गई थी। सुरक्षा की जरूरतों को समझते हुए चौकी को 2007 में थाने में अपग्रेड कर दिया गया लेकिन थाने की जरूरतों के हिसाब से इमारत का निर्माण अभी तक नहीं किया गया है। करीब पांच सात- साल पहले इसी परिसर के निकट थाने की इमारत निर्माण के लिए जमीन को दिल्ली बॉर्डर स्थित पुलिस नाके के निकट चिह्नित किया गया था जिसमें अभी तक निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया।
हो सकता है पीएलपीए एक्ट के मद्देनजर यह निर्माण न किया गया हो, सवाल यह पैदा होता है कि क्या यहीं पर निर्माण कार्य करना बहुत जरूरी है, विदित है कि थाना सूरजकुंड का क्षेत्र सेक्टर 21 सी व दूसरी ओर गांव लक्कड़पुर, ग्रीन फील्ड कालोनी, दयालबाग आदि तक फैला हुआ है। यदि शासन-प्रशासन चलाने वालों को अक्ल से दुश्मनी न हो तो पूरे थाना क्षेत्र में कहीं पर भी उचित स्थान देख कर थाने की आवश्यकताओं के अनुरूप भवन का निर्माण किया जा सकता है।