कैंसर जागरूकता दिवस फरीदााबद (मज़दूर मोर्चा) बीते सप्ताह कैंसर जागरूकता दिवस के अवसर पर विभिन्न विशेषज्ञ डॉक्टरों के बयान प्रकाशित किए गए। इनमें कहा गया कि शरीर में छोटे-छोटे परिवर्तन, गांठ रसौली आदि को गम्भीरता से लेना चाहिए। इन्हें देखकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। इसके अलावा अन्य कई लक्षणों के बारे में भी बताया गया। इससे बचने के लिए खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए, प्रोसेस्ड फूड्स से बचना चाहिए, संतुलित आहार एवं नियमित व्यायाम करना चाहिए आदि-आदि।
किसी भी विशेषज्ञ डॉक्टर महोदय ने यह नहीं बताया कि तेजी से फैलने वाली इस बीमारी के पीछे असल कारण भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार की खाद्य एवं दवा नीतियां हैं। भारत में आज न तो किसी खाद्य पदार्थ की शुद्धता की गारंटी है न ही दवा की। जिन बच्चों, बूढ़ों व बीमारों को स्वास्थय लाभ के लिए दूध जैसा साधारण पेय दिया जाता है, उसकी कोई गारंटी नहीं कि वे दूध पी रहें या जहर। दुधारु पशुओं को दुहने से पहले ऑक्सीटोसिन नामक इंजेक्शन लगाने का रिवाज बहुत ही ज्यादा प्रचलित होता जा रहा है। सरकार इसकी बिक्री पर कोई नियंत्रण करने में असफल है। देश में जितने दूध का उत्पादन होता है उससे दो-तीन गुना बाजार में बिकने आता है। जाहिर है यह सारा नकली दूध हानिकारक रासायनों द्वारा ही बनाया जाता है। यही स्थिति पनीर, मख्खन व घी आदि की भी है। दूध से बनने वाले मिठाईयों का तो कहना ही क्या है जब दूध ही पर्याप्त न हो तो मिठाईयां कैसे दूध से बनी होंगी, समझना कठिन नहीं।
फल और सब्जियों का भी हाल काफी चिंताजनक है। इनकी बोवाई से लेकर फल लगने तक अनेकों बार खतरनाक रासायनिक स्प्रे करना बहुत आवश्यक हो चुका है। इसके बिना कीट-पतंगे फलों व सब्जियों को पनपने नहीं देते। आज जहां अनेक देशों में कीड़ों-मकोड़ों को मारने के लिए मुर्गियों, बत्तखों, मछलियों, व अन्य कई प्रकार के परिंदों का इस्तेमाल किया जाने लगा है, वहीं भारत में दिन-ब-दिन कीटनाशक दवाओं का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। केले व आम जैसे अनेकों फलों को पकाने के लिए जिस रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है वह भी स्वास्थ के लिए अति हानिकारक होती है। यह पहचानना भी बड़ा मुश्किल हो गया है कि कौन से फल सिलसिला चल पड़ा है। दलहनों सहित अन्य फसलों की बिजाई से पहले तथा उगने के बाद तरह-तरह के रासायनिक खादों का अत्यधिक इस्तेमाल किया जाता है। पहले जहां गोबर आदि से बनी कम्पोस्ट खाद का इस्तेमाल होता था अब पैदावार बढ़ाने के नाम पर तरह-तरह की रासायनिक खादों का इस्तेमाल तो हो ही रहा है, इसके साथ-साथ कीटनाशक स्प्रे भी पूरे जोर से किए जा रहे हैं। 60 दिन में तैयार होने वाली मूंग की फसल में कम से कम चार बार रासायनिक स्प्रे के अलावा बिजाई से पहले रसायनिक खाद खेतों में डाली जाती है। कोढ़ में खाज का काम करने के लिए आगरा व गुडग़ांव नहर का जहरीला पानी फसलों को और भी जहरीला बना देता है।
इन तमाम रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का कुछ अंश फलों, सब्जियों, दालों व अनाज में समाहित होना अनिवार्य है। इनका सेवन करने से, उक्त रासायनों का मानव शरीर में जाना भी स्वाभाविक ही होगा। इसके अलावा स्पे्र तो और भी भयानक है। इसे करने वाला व्यक्ति तो सीधे तौर पर तथा अन्य लोग परोक्ष रूप से सांस के द्वारा कीटनाशक दवाओं को अपने भीतर ग्रहण करते हैं। जिस पंजाब में 40-50 साल पहले कोई इक्का-दुक्का कैंसर मरीज होता था वहीं अब भटिंडा से एक पूरी रेलगाड़ी कैंसर मरीजों को लेकर राजस्थान के कैंसर अस्पताल जाती है। उस गाड़ी का नाम भी कैंसर गाड़ी रख दिया गया है। बढ़ती समस्या से निपटने के लिए भटिंडा में ही एक टाटा कैंसर सेंटर भी स्थापित कर दिया गया है। इसका एक मात्र कारण वहां के खेतों में किया गया अत्यधिक घातक रासायनों का प्रयोग है। इससे भी गम्भीर बात तो यह है कि जिन रासायनों का इस्तेमाल दुनिया के उन्नत देशों में बंद कर दिया गया है, उन सब का इस्तेमाल भारत देश में होता है।
हरियाणा व पंजाब के कपास वाले क्षेत्रों में तो बाकायदा छोटे हवाई जहाजों द्वारा स्प्रे कराया जाता है। जाहिर है इस तरह का स्प्रे वहां के वायुमंडल को भयंकर रूप से प्रदूषित कर देता है। यह फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण बनता है। दवा निर्माता कम्पनियों की तो अलग ही दादागिरी है। कोई पता नहीं कि मरीज ठीक होने के लिए दवा ले रहा है या उसके नाम पर जहर? किसी जमाने में दवा कम्पनियों को नियंत्रित रखने के लिए कठोर कानून हुआ करते थे, अब उनका स्थान राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे ने ले लिया है। दवा कम्पनियों का उद्देश्य मरीजों को रोग मुक्त करना नहीं बल्कि उनको धन मुक्त करके अपनी तिजोरियां भरना रह गया है। इनके दामों पर भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। जितने रोगी बढ़ेंगे उतना ही उनका तथा डॉक्टरों का मुनाफा बढ़ेगा। आज कैंसर के इलाज का मतलब 10 लाख से लेकर 20-30 या इससे भी कहीं अधिक हो सकता है। जाहिर है इतना महंगा इलाज केवल साधन सम्पन्न लोग ही करा सकते हैं।
गरीब रोगी का इलाज तो केवल मौत ही रह गया है जबकि उसे गरीब व रोगी बनाने का पूरा काम सरकार द्वारा ही किया जाता है। यदि सरकार चाहे तो बाजार में न तो कोई मिलावटी खाद्य पदार्थ और न ही कोई नकली दवा आ सकती है। कृषि क्षेत्र में बढ़ता रासायनिक प्रयोग भी निर्माता कम्पनियों की मुनाफाखोरी के लिए होने दिया जा रहा है। इसके बदले राजनेताओं को भारी-भरकम चंदे व रिश्वतें दी जाती हैं।