डॉ. रामवीर प्रधानमन्त्री मोदी जब भी अपनी उपलब्धियों पर अपने मुंह मियां मिट्ठू शैली में बोलते हैं मेरी चिन्ता बढ़ जाती है। असल में उनकी उपलब्धियां हाथी के दिखाने वाले दांत की तरह होती हैं और मैं खाने वाले दांत के बारे में सोचता हूं। प्रधानमन्त्री अमेरिका की यात्रा से लौटे हैं, वहां उनका कैसा स्वागत हुआ और उन्होंने क्या क्या किया इस के दो वर्सन हैं, एक जो सरकार नियन्त्रित मीडिया (नब्बे प्रतिशत मुख्य मीडिया) पर विस्तार से प्रसारित किया गया और दूसरा जिसे कुछ स्वतन्त्र पत्रकारों ने अपने यू ट्यूब चैनल्स पर दिखाया। स्वाभाविक है कि दर्शक/पाठक समाचारों के स्रोत भी अपनी रुचि के अनुसार ही चुनते हैं। सचाई जानने के इच्छुकों को विभिन्न चैनल्स पर भटकना पड़ता है। बाजार से कुछ खरीदने में भी ग्राहक का तीन तरह का व्यवहार देखा जा सकता है। गांव से बस में आया ग्राहक ज्यों ही बस अड्डे से बाजार की ओर कुछ कदम बढता है तो शुरु की दुकानों से ताऊ के लेगा ताऊ के लेगा की आवाजें आने लगती हैं और ताऊ भी दुकानदार के निमन्त्रण/आग्रह के प्रभाव में और लौटने की जल्दी में वस्तु की गुणवत्ता की उपेक्षा करते हुए खरीददारी कर लेता है। बस अड्डे के आसपास की दुकानों पर अच्छी चीजें नहीं मिलतीं इस धारणा, जो एक सीमा तक सही भी है, के कारण कुछ ग्राहक ताऊ के लेगा की ध्वनि को अनसुना करते हुए मेन मार्केट तक पहुंचते हैं और वहां विभिन्न दुकानों पर वस्तु और मूल्य की जांच परख कर के ही सौदा करते हैं।
कुछ लोग बड़ी दुकानों से ही बढिय़ा चीज मिलती है पर विश्वास करते हैं और ऊंची दुकान फीके पकवान कहावत का शिकार होने का खतरा उठाते हैं। तो समाचारों के बाजार में जो लोग रिपब्लिक टीवी, आज तक, इंडिया टीवी के (क्रमश:) अर्णव गोस्वामी, सुधीर चौधरी और रजत शर्मा से समाचार सुन सन्तुष्ट हो जाते हैं वे उस ग्राहक की तरह हैं जो ताऊ के लेगा सुन कर ही खरीददारी कर लेते हैं। सी एन एन या बीबीसी के समाचारों को महत्त्व देने वाले बड़ी दुकानों पर भरोसा करने वाले ग्राहकों कीस श्रेणी में आते हैं। और जो लोग समाचारों की सच्चाई के आग्रही हैं वे लोग अतुल चौरसिया की न्यूज लांड्री, संजय शर्मा के 4 क्करू , आलोक जोशी के आलोक अड्डा, आशुतोष के सत्य हिन्दी डॉट कोम और अभय दूबे के परख जैसे यू ट्यूब चैनल्स पर भी समाचार और विश्लेषण सुनते हैं।
पत्रकारों के दो ही वर्ग हैं, पहले वे जो अपने नियोक्ताओं की हर बात को शिरोधार्य मान कर ‘हां जी की नौकरी’ के अनुसार मोटे पैकेज पर नौकरी कर रहे हैं। दूसरे वर्ग में वे हैं जिन्होंने अपनी रीढ़ झुकाना स्वीकार नहीं किया और परिणामस्वरूप या तो त्यागपत्र दे दिया या नौकरी से निकाल दिए गए। स्वाभाविक है कि इस पृष्ठभूमि के पत्रकारों में शासक वर्ग के प्रति कुछ कटुता हो सकती है लेकिन यह कटुता आत्मसम्मान की कीमत पर सत्ता के सामने समर्पण करने वालों की मधुरता से बेहतर है। विपरीत परिस्थितियों में अपने रिस्क पर पत्रकारिता का धर्म निभाने वालों की कटुता आंवले के काषाय की तरह है। काषाय रस के कारण आंवला स्वादिष्ट भले न लगे किन्तु उस की लाभदायकता असन्दिग्ध है।
यदि पाठक मोदीभक्त है तो मोदीभक्ति और देशभक्ति के अन्तर को ओझल न होने दे। देश शरीर है, मोदी वस्त्र है। शरीर बचाना है, उसे ही बलिष्ठ बनाना है वस्त्र आने जाने वाली चीज है, वस्त्रों की सुन्दरता से शरीर का मूल्यांकन करना बचकानी बात लगती है। प्रधानमन्त्री जी अमेरिका से जो समझौते कर के आए हैं उन्हें जान कर मैं मुगल काल में लौट गया। 24 अगस्त 1608 में पहला ब्रिटिश जहाज माल ले कर सूरत बन्दरगाह पर पहुंचा था। 1613 में मुगल बादशाह जहांगीर ने उक्त जहाज के कैप्टन विलियम हाकिंस को सूरत में फैक्ट्री लगाने का फरमान जारी कर दिया। इस फरमान को भारत में बाद में बने अंग्रेजी राज की नींव की पहली ईंट कहा जा सकता है। 1613 में उक्त फरमान जारी करते हुए जहांगीर को अन्दाजा थोड़े ही था कि उस का यह छोटा सा काम देश को कहां धकेल देगा। 1613 से 1947 तक जो कुछ झेला उस से जो सबक सीखे जानें चाहियें वे शायद नहीं सीखे गए और इस लिए इतिहास दोहराने के अभिशाप की सम्भावना से भय लगता है। मोदी जी ने अमेरिका की मल्टिनेशनल कम्पनी जी ई को जो फरमान दिया है और जहांगीर ने कैप्टन विलियम हाकिंस को जो फरमान दिया था दोनों के निहितार्थ पर ध्यान जाता है तो धुरधुरी सी फील होती है।दोनों घटनाओं में सूरत कॉमन है। मोदी के उदय में सूरत के योगदान को सब जानते हैं। सूरत में एक अंग्रेजी फैक्ट्री ने बाद में कैसे देश को बदसूरत बना दिया ! जहांगीर से जो भूल हुई थी वह विदेशी व्यापारियों को Ease of doing bussiness मुहैय्या करवाना ही तो था। आज सरकार जिस Ease को अपनी प्रमुख उपलब्धि बताती है उसके पाश्र्व प्रभावों पर नजर रखना भी जरूरी है। जो गलतियां पहले हो चुकी हैं उनसे सीख न लेना अदूरदर्शिता है।
आज के रेल मन्त्री अश्विनी वैष्णव आई ए एस से त्यागपत्र दे कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़े और फिर कैसे और क्यों वे रेल मन्त्री बनाए गए – इन बातों को जानने के बाद भी जो लोग ‘देश सुरक्षित हाथों में है’ पर विश्वास करते हैं उन पर आश्चर्य होता है। उड़ीसा में रेल दुर्घटना स्थल पर रेल मन्त्री को वन्दे मातरम् नारा लगाते हुए देखा तो बुद्धि ही नहीं सामान्य बुद्धि पर भी शक हुआ।लड़की ने सुना हुआ था कि उस का मंगेतर अच्छा गायक है। शादी हुई, सुहागरात में ही नववधू ने पति से गाना सुनने की फरमाइश कर दी तो पति ने गाना गाया ‘ए मां तेरी सूरत से अलग भगवान् की सूरत क्या होगी…’ । इसे अवसर के प्रतिकूल काम का उदाहरण समझता था, इस से भी बड़ा उदाहरण है जहां सैकड़ों शव बिखरे हों – रोने की चीत्कार ध्वनियां आ रही हैं वहां रेल मन्त्री वन्दे मातरम् का घोष कर रहा हो यह कैसी मूढता है !
प्राइवेट कंपनियों के उच्च पदों पर रहे व्यक्ति को देश के नहीं कम्पनियों के हित में मन्त्री बनाने की बात से चालीस साल पहले की घटना याद आ गई। संस्कृत की एक दुर्लभ पुस्तक कहीं नहीं मिल रही थी तो दिल्ली में मोतीलाल बनारसी दास की दुकान पर पहुंचा। काउंटर पर दो एक कर्मचारियों के अतिरिक्त पीछे एक कमरे में एक सज्जन शान से सजे बैठे थे। मैंने समझा यह मालिक होगा। पता चला कि वह मालिक नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय का सेवानिवृत्त रजिस्ट्रार है। ऐसे उच्च पद से रिटायर्ड व्यक्ति दुकान पर नौकरी कर रहा है कुछ बेतुका सा लगा। बाद में कुछ समय बाद प्रकाशक की व्यवसायबुद्धि समझ में आई कि क्यों उस ने रिटायर्ड रजिस्ट्रार को हायर किया है। शुरु में और बात थी लेकिन बाद में मोतीलाल बनारसी दास ने ऐसी पुस्तकों का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया जिन्हें आम छात्र या अध्यापक नहीं खरीद सकता। इन में अधिकतर संस्कृत ग्रन्थों के इंगलिश अनुवाद, मूल्य हजारों में।
न किसी को रायल्टी देनी, न कोपी राइट का झंझट। इंडिक स्टडीज के नाम पर इन मंहगी किताबों को विदेशी विश्वविद्यालयों/पुस्तकालयों में खपाना बड़े फायदे का सौदा है और इस में दिल्ली विश्वविद्यालय का सेवानिवृत्त रजिस्ट्रार अच्छा नो हाऊ प्रोवाइड कर सकता है। एक प्रकाशक द्वारा रिटायर्ड रजिस्ट्रार का उपयोग, एक प्रधानमन्त्री द्वारा एम एन सी में सी ई ओ रहे व्यक्ति को मन्त्री बनाना एक ही तरह के काम हैं। राजनीति पर विचार करें तो दो तरह के लोग मिलेंगे। एक जिन के लिए राजनीति में सब कुछ जायज है दूसरे वे जो थोडी बहुत मर्यादा रखना अपेक्षित मानते हैं । मोदी जी पहली कटेगरी में हैं, वे राजनीति में धर्म की मिलावट से सत्ता पाते हैं और बाद में सत्ता में क्रोनी कैपलिस्टों को भागीदार बना कर ऐसे खेल करते हैं जिनके दूरवर्ती परिणामों का उन्हें अनुमान तक नहीं है, भान तो दूर की बात है। मेरी चिन्ता यही है कि मोदी जी के व्यापारिक समझौते कहीं जहांगीर के फरमान का नया संस्करण न हो, कामना है ऐसा न हो। समझौतों में सावधानी देश के भविष्य की सुरक्षा के लिए परम आवश्यक है।