आनन्द स्वरूप वर्मा
राजसत्ता, माओवाद और पत्रकारिता अब से लगभग दो वर्ष पूर्व 11 जनवरी और 13 जनवरी, 2008 को दिल्ली के प्रेस क्लब में ‘अभिव्यक्ति की आजादी और असहमति का अधिकार’ शीर्षक के तहत दो बैठकें हुईं थीं जिसमें भारी संख्या में लोग उपस्थित थे। पहले दिन की बैठक में मुख्य रूप से उत्तराखंड के पत्रकार प्रशांत राही, केरल में ‘पीपुल्स मार्च’ के संपादक गोविंदन कुट्टी और छत्तीसगढ़ में पत्रकार प्रफुल्ल झा पर केंद्रित होते हुए अन्य पत्रकारों की गिरफ्तारी के मुद्दे को उठाया गया था। यह पहला मौका था जब अभिव्यक्ति की आजादी और असहमति के अधिकार के मुद्दे को लेकर इतने सारे प्रमुख चेहरे मंच पर दिखायी पड़ रहे थे। वक्ताओं में महाश्वेता देवी, कुलदीप नैयर, विनोद मेहता, अरुंधति राय, गिरीश करनाड, प्रफुल्ल बिदवई, गौतम नवलखा, पंकज बिष्ट, हबीब तनवीर, प्रशांत भूषण, इंदिरा जयसिंह, राजेंद्र यादव, आशीष नंदी, मैनेजर पांडे, तनिका सरकार और सुमीत सरकार थे। वक्ताओं ने माओवाद और नक्सलवाद के नाम पर प्रतिरोध की हर आवाज को कुचलने की सरकार की साजिश का पर्दाफाश करते हुए अलग-अलग राज्यों में ‘पोटा’ की तर्ज पर बनाए गये कानूनों को फौरन समाप्त करने की माँग की।
उत्तराखंड में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत राही की गिरफ्तारी ने एक बार फिर इस क्रूर तथ्य को उजागर किया है कि राज्य सरकारें केंद्र से मिलने वाली अपार धनराशि प्राप्त करने की होड़ में खुद को नक्सलवाद/माओवाद से ग्रस्त राज्य बनाने में कितनी तत्पर हैं। प्रशांत राही वर्षों से देहरादून में रह रहे थे और एक लंबे अर्से तक उन्होंने अँग्रेजी दैनिक ‘स्टेट्समैन’ के संवाददाता के रूप में काम किया। उस इलाके की जन समस्याओं पर उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण रपटें दीं। मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले प्रशांत ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम. टेक किया और पिछले तीन दशकों से वह देहरादून में रह रहे थे। जिन दिनों उत्तराखंड में पृथक राज्य बनाने का आंदोलन चल रहा था प्रशांत राही काफी सक्रिय थे। 17 दिसंबर, 2007 को उन्हें उस समय गिरफ्तार किया गया जब वे शाम को अपने घर के बाहर टहल रहे थे। उन्हें न तो गिरफ्तारी का कोई कारण बताया गया और न किसी मित्र या संबंधी या वकील से संपर्क की इजाजत दी गयी। यहाँ तक कि कानूनी प्रावधान के अनुसार उन्हें 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने भी नहीं पेश किया गया।
22 दिसंबर को पुलिस ने एक प्रेस वक्तव्य के जरिये बताया कि हंसपुर खत्ता के जंगलों से माओवादियों के एक जोनल कमांडर को गिरफ्तार किया गया है। इलाके के अखबारों ने भी कोई जाँच पड़ताल किये बिना पुलिस के बयान को ही छापा और बताया कि किस प्रकार जंगल में कुछ संदिग्ध लोग घूम रहे थे जिन्हें नानकमत्ता के थानाध्यक्ष पी.के. शाह और उनकी टोली ने गिरफ्तार कर लिया। यह खबर 4-5 दिनों तक अखबारों में छायी रही। 29 दिसंबर को प्रशांत की पुत्री शिखा ने देहरादून में एक बयान देकर बताया कि उनके पिता को कब और कैसे गिरफ्तार किया गया था। शिखा ने यह भी बताया कि उसके पत्रकार पिता उत्तराखंड आंदोलन और टिहरी बाँध से विस्थापितों के आंदोलन में काफी सक्रिय रहे हैं। उसने यह भी कहा कि निश्चय ही उसके पिता माओवादी विचारधारा के नजदीक अपने को पाते हैं लेकिन क्या किसी विचारधारा से जुड़े रहना कोई अपराध है?
यही सवाल गोविंदन कुट्टी के संदर्भ में ‘आउटलुक’ के संपादक विनोद मेहता ने 11 फरवरी की बैठक में कही। उनका कहना था कि ‘पीपुल्स मार्च’ में प्रकाशित सामग्री से जरूरी नहीं कि मैं खुद को सहमत मानूँ-हो सकता है मैं उससे पूरी तरह असहमत होऊँ लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ‘पीपुल्स मार्च’ को गैर कानूनी घोषित कर दिया जाए और उसके संपादक को जेल में डाल दिया जाए। लोकतंत्र में यह गारंटी होनी चाहिए कि विभिन्न वैचारिक मुद्दों के बीच बहस चलती रहे। देहरादून के प्रेस कांफ्रेंस में शिखा ने यह भी बताया कि पुलिस उनके पिता के पास से जिन गोपनीय दस्तावेजों को बरामद करने की बात कह रही है वे सभी इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। एक बातचीत में शिखा ने गिरफ्तारी के बाद प्रकाशित तीन खबरें ऐसी दिखायीं जिनसे लगता है कि राज्य सरकार ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत प्रशांत को गिरफ्तार किया। 21 दिसंबर को दैनिक जागरण’ के नैनीताल संस्करण में एक खबर छपी कि उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी ने केंद्र सरकार से राज्य की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को उन्नत करने के लिए 208 करोड़ की माँग की है। खंडूरी का कहना था कि राज्य में माओवाद का खतरा बढ़ गया है। उसी दिन के ‘अमर उजाला’ के नैनीताल संस्करण में यह खबर छपी कि हंसपुर खत्ता, सेनापानी और चौगटिया के जंगलों में कुछ सशस्त्र लोग घूमते हुए दिखायी दिये जिनके माओवादी होने का संदेह है। फिर 24 दिसंबर को इन्हीं अखबारों ने प्रकाशित किया कि प्रशांत राही नामक जोनल कमांडर को हंसपुर खत्ता के जंगलों से उस समय गिरफ्तार किया गया जब वह एक नदी के किनारे अपने पाँच साथियों के साथ बैठ कर कोई योजना बना रहा था। उसके अन्य साथी भाग गये।
रायपुर में जिस समय प्रफुल्ल झा को गिरफ्तार किया गया वह एक ऑटो रिक्शा में बैठ कर कहीं जा रहे थे। पुलिस का कहना है कि उसने प्रफुल्ल झा के घर से ‘आपत्तिजनक माओवादी साहित्य’ के साथ कुछ हथियार भी बरामद किया है। प्रफुल्ल झा अभी कुछ साल पहले तक रायपुर में दैनिक भास्कर’ से जुड़े थे। कुछ माह पूर्व उनके द्वारा प्रकाशित और संपादित एक पुस्तिका देखने में आयी जो नेपाल की मौजूदा स्थिति पर थी और जिसमें ‘इकोनॉमिक ऐंड पोलिटिकल वीकली’ के विशेषांक में नेपाल पर प्रकाशित लेखों को संकलित किया गया था। सरकार का कहना था कि वह माओवादियों के नेतृत्व में से एक हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ की जो स्थिति है उसमें अगर आप पत्रकार या लेखक हैं और सलवा जुडुम के पक्ष में नहीं लिख रहे हैं या उसका विरोध कर रहे हैं तो आप माओवादी हैं। अरुंधति राय ने अपने वक्तव्य में यह कहा भी कि छत्तीसगढ़ की सरकार अमेरिकी राष्टपति बुश के सिद्धांत पर चल रही है कि ‘अगर तुम हमारे साथ नहीं हो तो आतंकवाद के साथ हो’।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार हो या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार दोनों ने नक्सलवाद/माओवाद को बहुत बड़े खतरे के रूप में चिह्नित किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो दिसंबर 2007 में अपने भाषण में नक्सलवाद को ‘देश के सामने मौजूद सबसे बड़ा खतरा’ बताया। उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों को कहा कि वे इस ‘वायरस’ को खत्म करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दें। लालकृष्ण आडवाणी जब गृहमंत्री थे तो उन्होंने भी नक्सलवाद को ‘भारतीय सपनों का शत्रु’ बताते हुए इसे जड़ से समाप्त करने का आह्वान किया था। 15 जून, 1998 को हैदराबाद में 4 राज्यों आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व उड़ीसा के मुख्यमंत्रियों के साथ हुई बैठक में उन्होंने कहा था कि ‘नक्सलवाद को कुछ बौद्धिक और मीडिया से संबद्ध क्षेत्रों में प्राय: रोमांटिक ढंग से चित्रित किया जाता है। हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि इसको वैधता प्रदान करने वाले हर प्रयासों को रोकें। राजनीतिक दलों, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और मीडिया को इस तरह गोलबंद किया जाना चाहिए ताकि वे हमारे सामाजिक परिवेश में इस आंदोलन को वैधता प्रदान करने वाली बची-खुची जड़ों को भी काट डालें जिन पर नक्सलवाद खड़ा है।’ आज मनमोहन सिंह और उनके गृहमंत्री पी. चिदंबरम दोनों देश की जनता को यही समझाने में लगे हैं कि जब तक आतंकवाद पर काबू नहीं पाया जाएगा तब तक देश का विकास नहीं हो सकता। उनके लिए आतंकवादी हिंसा और किसानों तथा उत्पीडि़त समुदायों द्वारा मजबूरी में की जाने वाली जवाबी हिंसा में कोई फर्क नहीं है। आतंकवादी हिंसा और क्रांतिकारी हिंसा को वह एक ही पलड़े पर रखते हैं। अक्षरधाम की आतंकवादी घटना हो या उड़ीसा में ‘पोस्को’ के खिलाफ जनता का संघर्ष-दोनों में उनके लिए कोई फर्क नहीं है। यही वजह है कि वे न तो समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में समझ पा रहे हैं और न उसका समाधान ढूँढ़ पा रहे हैं।