पत्रकारिता का अंधा युग-4

पत्रकारिता का अंधा युग-4
February 11 16:11 2026

आनन्द स्वरूप वर्मा
पिछले अंक में हमने देखा है कि कारसेवा के दौरान सनसनी फैलाने के मकसद से किस तरह मसाले का व्यापार करने वाले एक संपादक ने पुलिस की गोली से मारे गये कारसेवकों की संख्या को दस गुना बढ़ा कर अपने अखबार में छाप दिया। चिट फंड कंपनी चलाने वालों को भी संपादक बनने का शौक हुआ और ऐसी ही एक कंपनी ‘सहारा’ ने अखबार निकाला। इसके मालिक और संपादक सुब्रत रॉय ने, जो निवेशकों के पैसे का गबन करने के आरोप में मुकदमे में फंसे और इसी बदनामी के साथ दुनिया से विद भी हुए, ने बढ़ती हुई आबादी पर जो विचार व्यक्त किये उसे देखने से आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस तरह की मानसिकता के लोगों का समाज में क्या योगदान होगा!

‘अच्छी सोच विचार वाले विवेकशील लोगों की जनसंख्या तेजी से घटती जा रही है। दूसरी ओर विवेकहीन (पशुवत ) जीवन जीने वालों की संख्या दिन व दिन बढ़ती जा रही है। इसमें कमी होने के आसार भी नहीं दिख रहे हैं। क्योंकि परिवार नियोजन कार्यक्रम ने यहाँ उलटा रोल अदा कर दिया। इसे मैं अपने व्यक्तिगत उदाहरण से समझाता हूँ। जब मेरा दूसरा बेटा पैदा हुआ तो डॉक्टर ने मुझसे पूछा कि यदि आप सीमित परिवार के पक्ष में हों तो मैं आपकी पत्नी का फैमिली प्लानिंग ऑपरेशन कर दूँ। मैंने तत्काल कहा करो। मुझे याद आता है गोरखपुर शहर में मुझे सरकार की तरफ से एक प्रमाण पत्र और कुछ तोहफे मिले थे। मैं बड़ा खुश हुआ था। उस समय मुझे यह महसूस हुआ था कि मैं बहुत देशभक्त आदमी हूँ। देश के लिए मैंने यह अच्छा काम किया है। मात्र दी संतानों को जन्म देकर मैंने देश की खुशहाली के लिए सही कदम बढ़ाया है मगर आज मैं इस बात को दूसरी तरह से महसूस करता हूँ और बहुत गहराई से सोचता हूँ कि अनजाने में, अज्ञानता में, अल्प ज्ञान में मैंने देशभक्ति का काम न करके एक देशद्रोही का काम किया। मैं उस समय इस बात को नहीं समझ पाया था, जो आज समझ रहा हूँ। अगर मैंने 20 बच्चे पैदा किये होते तो शायद देश को 20 श्रेष्ठ नागरिक दिये होते, क्योंकि ऊपर वाले ने वह क्षमता मुझे दी है। एक तरफ तो हम दो संतानों पर रुक गये, लेकिन गटर में एक व्यक्ति के 20 बच्चे पैदा हो रहे हैं।’

दरअसल 1990 के दशक में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की संचालक कंपनी बेनेट कोलमैन के नये कर्ताधर्ता समीर जैन और विनीत जैन ने पत्रकारिता को बड़े कौशल के साथ विशुद्ध व्यवसाय का रूप दे दिया और आश्चर्य नहीं कि धीरे-धीरे जैन बंधुओं की रणनीति ने समूचे मीडिया उद्योग को अपनी गिरफ्त में ले लिया। ‘दि न्यूयार्कर’ के पत्रकार केन ऑलेट्टा से बातचीत में विनीत जैन ने बगैर किसी लागलपेट के कहा कि ‘हम अखबार के धंधे में नहीं बल्कि विज्ञापन के धंधे में हैं।’ उन्होंने बताया कि ‘उनके अखबारों की कीमत काफी कम है और प्रसार से मुनाफा नहीं कमाया जा सकता इसलिए अखबार को विज्ञापन से होने वाली आय पर निर्भर रहना पड़ता है और अगर आपकी आय का 80 प्रतिशत विज्ञापन से आता है तो जाहिर है आप विज्ञापन के धंधे में है।

जैन बंधुओं ने बहुत ही परिष्कृत ढंग से अखबारों में पत्रकारों और काटेंट को हाशिये पर डालते हुए पेज थ्री की पत्रकारिता को मुख्यधारा में ला दिया और एडवटोरियल’, ‘पेड न्यूज’ जैसी शब्दावलियों का ईजाद किया। केन ने जैन बंधुओं के तौर तरीकों पर रोशनी डालते हुए बताया है कि इन लोगों ने पेप्सीको और यूनिलीवर जैसी उपभोक्ता आधारित कंपनियों के मैनेजरों को अपने यहाँ नियुक्ति दी और उन्हें संपादकीय बैठकों में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। उन दिनों भारत में क्रेडिट कार्ड हासिल करना कठिन काम होता था लेकिन जैन ने संपादकीय टीम को नहीं बल्कि सेल्स टीम के सदस्यों के लिए क्रेडिट कार्ड हासिल किये। जैन का यह नायाब तरीका था संपादकीय विभाग के लोगों को उनकी हैसियत का एहसास कराने का ताकि वे खुद को व्यवसाय विभाग से नीचे समझें। वह दिखाना चाहते थे कि अखबार के लिए व्यापार से जुड़े फैसले संपादकीय फैसलों के मुकाबले ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।”

इस बीच संपादकीय विभाग के अन्य पदों पर काम करने वालों की हालत दिनोदिन खराब होती गयी। इनकी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए जितने भी वेतन आयोग बने उनकी सिफारिशों पर मालिकों ने कभी अमल करने की जरूरत नहीं समझी। जब से अखबारों में छोटे-छोटे पदों पर भी ठेके पर नियुक्ति का प्रचलन बढ़ा, स्थितियाँ बदतर होती गयीं। पत्रकारों की ट्रेड यूनियनें जो किसी जमाने में बहुत मजबूत स्थिति में थीं अब नाममात्र के लिए रह गयी हैं। पत्रकार संगठनों के शीर्ष पर बैठे लोग केवल सत्ता के साथ संबंध बनाने में लगे रहे। देश के सबसे पुराने पत्रकार संगठन इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट’ की हालत यह है कि पिछले तीन-चार दशकों से एक ही व्यक्ति के. विक्रम राव उसके अध्यक्ष पद पर रहे। यहाँ हर तीन वर्ष पर चुनाव होते हैं लेकिन हर बार यही व्यक्ति निर्विरोध चुन लिया जाता है। पत्रकार संगठनों के सम्मेलन बस मौज-मस्ती के लिए आयोजित होते हैं। इन सम्मेलनों में न तो पत्रकारों के संघर्ष को आगे ले जाने की कोई चर्चा होती है और न किसी गंभीर सामाजिक-राजनीतिक विषय पर विचार-विमर्श किया जाता है। मेरे पास एक पत्रकार संगठन के सम्मेलन का निमंत्रण पत्र पड़ा है। उसके दो दिनों के कार्यक्रम को मैं बताऊँगा तो आप हैरान रह जाएँगे। यह निमंत्रण पत्र ‘पत्रकार समन्वय समिति’ द्वारा 12-13 दिसंबर, 1987 को फैजाबाद में आयोजित पूर्वांचल पत्रकार सम्मेलन का है। इसमें आमंत्रित अतिथियों में कुलदीप नैयर और सुरेंद्र प्रताप सिंह का भी नाम छपा है। निमंत्रण पत्र के साथ दोनों दिनों के कार्यक्रम का ब्योरा है जो इस प्रकार है:

12 दिसंबर, 1987 प्रात: 10-12 तक पंजीकरण। फिर मध्याह भोज – श्री ओम प्रकाश मदान, सोना बिस्कुट मैन्यु. कं, फैजाबाद के सौजन्य से; उद्घाटन-1 बजे दोपहर, केंद्रीय पेट्रोलियम गैस एवं राज्य मंत्री माननीय ब्रह्मदत्त द्वारा, अपराह चाय-4 बजे, जिला प्रशासन फैजाबाद के सौजन्य से द्वितीय सत्र प्रारंभ- 4.30 बजे हाई टी 7.80 से 8.30 तक: रात्रि भोज – 8.30 से 10.30 तक बंसल प्रतिष्ठान फैजाबाद के सौजन्य से ।

13 दिसंबर, 1987 बेड टी-7-8 बजे तक नाश्ता, 9-10 बजे तक, गल्ला व्यापार मंडल फैजाबाद के सौजन्य से समापन सत्र-10.30 बजे मध्याह्न भोज दोपहर 2.00 बजे श्री सीताराम निषाद राज्य मंत्री मत्स्य, सिंचाई, बाढ़, उ.प्र. शासन के सौजन्य से। कार्यक्रम के अंत में एक फुटनोट है-कृपया पंजीकरण रसीद दिखा कर गिफ्ट पैक सम्मेलन कार्यालय से ले लें। इस पत्रकार सम्मेलन के दो दिन के कार्यक्रम को देख कर आप क्या कहेंगे दोनों दिन केवल खाने-पीने का कार्यक्रम और वह भी मंत्रियों और व्यापारियों के सौजन्य से। न तो किसी राष्ट्रीय मसले पर बातचीत और न अपने पेशे से संबंधित समस्याओं पर विचार-विमर्श। यही स्थिति कमोबेश हर पत्रकार संगठनों की है। ये संगठन अपने आयोजनों के लिए सरकार से कुछ लाख रुपये ले लेते हैं और इसी तरह के कार्यक्रम करते हैं। पत्रकार संगठनों की जब ऐसी स्थिति हो तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है।

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Mazdoor Morcha
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