देश के सभी विश्वविद्यालयों पर अपने कब्ज़े जमाने के नागपुरी षड्यन्त्र को सफल बनाने के लिए अक्टूबर 2025 के अंत में, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी की, जिसमें पंजाब विश्वविद्यालय के सीनेट और सिंडिकेट की संरचना में परिवर्तन करने का प्रस्ताव था। प्रस्तावित परिवर्तनों से सदस्यों की संख्या कम हो जाती और निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह मनोनीत सदस्य आ जाते, जिससे नियंत्रण प्रभावी रूप से केंद्रीकृत हो जाता और संस्थान का लोकतांत्रिक चरित्र लगभग समाप्त हो जाता। इसका उद्देश्य सीनेट की संख्या 90 सदस्यों से घटाकर 31 करना था। साथ ही स्नातक निर्वाचन क्षेत्र को समाप्त करना था, जो पहले सीनेट के लिए 15 सदस्यों का चुनाव करता था। इसमें सिंडिकेट को निर्वाचित के बजाय एक बड़े पैमाने पर नामित संरचना बनाने का प्रस्ताव था, जिसमें निर्वाचित सदस्यों को हटाकर शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) के उच्च शिक्षा सचिव जैसे पदेन सदस्यों को शामिल किया जाना था। ऐसा होने से सभी शक्तियां केंद्र के पास चली जाती और केंद्र सरकार आर एस एस का सांप्रदायिक कार्यक्रम बेरोकटोक चलाती। इस अधिसूचना का पंजाब भर के छात्रों, शिक्षकों और राजनीतिक दलों ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे विश्वविद्यालय की विरासत पर एक ‘असंवैधानिक’ हमला और इसे सीधे सरकारी नियंत्रण में बदलने का कदम माना। अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल सहित विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गए।
सिंडीकेट विश्वविद्यालय का कार्यकारी निकाय है, जो प्रशासन का संचालन करता है। इन परिवर्तनों का उद्देश्य निर्वाचित सीनेट के प्रति इसकी जवाबदेही को समाप्त करना था। ऐसा होने से सिनेट भाजपा का पिट्ठू बन जाता। पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्रों ने नागपुरी षड्यन्त्र को न केवल नाकाम किया बल्कि एक साल के अधिक समय से लंबित पड़े चुनावों को कराने का भी मामला अब जोर से उठाया हुआ है।
पंजाब विश्वविद्यालय में वर्तमान में सिंडिकेट का चुनाव कैसे होता है वर्तमान में, पंजाब विश्वविद्यालय सिंडिकेट के सदस्यों का चुनाव मुख्य रूप से सीनेट द्वारा अपने सदस्यों में से किया जाता है। मौजूदा ढांचे के तहत सीनेट, जो विश्वविद्यालय का सर्वोच्च शासी निकाय है, सिंडिकेट के चुनाव के लिए जिम्मेदार है। सिंडिकेट एक मिश्रित निकाय है। इसमें पदेन सदस्य (जैसे कुलपति, और पंजाब एवं चंडीगढ़ के वरिष्ठ शिक्षा अधिकारी) और अधिकतम 15 सदस्य शामिल होते हैं, जिनका चुनाव संकाय और सीनेट के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। सीनेट के सदस्य “साधारण फ़ेलो” (पंजीकृत स्नातकों, प्राध्यापकों, प्राचार्यो और शिक्षकों जैसे निर्वाचन क्षेत्रों द्वारा चुने गए) एक वर्ष के कार्यकाल के लिए सिंडिकेट के सदस्यों का चुनाव करते हैं। सिंडिकेट एक कार्यकारी निकाय के रूप में कार्य करता है, जो दैनिक प्रशासन और वृहद सीनेट द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णयों के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार होता है।
पंजाब यूनिवर्सिटी की उक्त कहानी पढऩे के बाद यह समझना भी जरूरी है कि आखिर भाजपा सरकार को बैठे-बिठाए यह पंगा लेने की क्यों सूझी? सर्वविदित है कि जब से मोदी सरकार ने सत्ता सम्भाली है तभी से शिक्षा विभाग का कार्य आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवकसंघ) को सौंप दिया गया है। इससे संघ को दो फायदे हो रहे हैं। पहला तो यह कि तमाम यूनिवर्सिटियों तथा राष्ट्रीय स्तर के तमाम शिक्षण संस्थानों में नियुक्तियां आरएसएस द्वारा की जा रही हैं। प्रत्येक नियुक्ति के बदले संघ मोटी वसूली करता है। उसे नियुक्त होने वाले व्यक्ति की योग्यता एवं गुणवत्ता से कुछ लेना-देना नहीं है। इसके परिणामस्वरुप इन शिक्षण संस्थानों में घटिया से घटिया, एवं टुच्च किस्म के भ्रष्ट अधिकारी व शिक्षक नियुक्त होते जा रहे हैं। दूसरा यह कि पाठ्यक्रम में भयंकर संशोधन करके गलत इतिहास, अंधविश्वास तथा अवैज्ञानिक पाठ्य सामग्री परोस कर विद्यार्थियों का सत्यानाश किया जा ररहा है। यही काम आरएसएस पंजाब यूनिवर्सिटी को अपने शिकंजे में लेकर करना चाहता है।