न्यायाधीश सरकार का पक्ष लेते हुए भ्रष्टाचार में तभी लिप्त होते हैं जब केस महत्वपूर्ण होता है

न्यायाधीश सरकार का पक्ष लेते हुए भ्रष्टाचार में तभी लिप्त होते हैं जब केस महत्वपूर्ण होता है
October 26 07:12 2025

मजदूर मोचा्र ब्यूरो
21वें सीजेआई रंगनाथ मिश्रा और 22वें सीजेआई के. एन. सिंह को छोड़कर देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर आसीन होने वाले किसी भी न्यायाधीश को, 1993 में कॉलेजियम प्रणाली प्रारंभ होने से पहले तक, भ्रष्टाचार या घोटाले के आरोपों का सामना नहीं करना पड़ा. 25वें सीजेआई वेंकटचलैया के अक्टूबर 1994 में अवकाश प्राप्त करने के बाद से ऐसे घोटाले सामान्य बात बन गए. 26वें सीजेआई ए. एम. अहमदी ने भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े एक मुकदमे में यूनियन कार्बाइड के खिलाफ कल्पबल होमोसाइड (आपराधिक मानव वध) के आरोप को खारिज कर दिया था. मेलमिलाप का भाव प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने संस्था को शहर में एक अस्पताल कायम करने का आदेश दिया. सेवानिवृत्ति के बाद अस्पताल का प्रबंध देखने वाले ट्रस्ट के वह आजीवन चेयरमैन नियुक्त कर दिए गए. 2010 में सुप्रीम कोर्ट में अहमदी के खिलाफ अस्पताल के कथित कुप्रबंधन की जांच और ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड जारी करने के लिए बाध्य करने का आदेश देने की याचिका दाखिल की गई. उस याचिका पर आदेश कभी नहीं आया लेकिन न्यायालय ने अहमदी के पद से त्यागपत्र को स्वीकार कर लिया. न्यायालय अस्पताल को दी गई उनकी अच्छी सेवाओं की प्रशंसा भी की.

28वें सीजेआई एम.एम. पुंछी को कार्यभार ग्रहण करने से पहले ही बर्खास्तगी के खतरे का सामना करना पड़ा था. कदाचार की बहुलता के आरोपों पर उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए राज्य सभा में प्रस्ताव पेश किया गया था. विश्वास भंग के दोषी व्यापारी को कानून के प्रावधानों से परे जाते हुए उन्होंने दोषमुक्त करार दिया था. हरियाणा के कांग्रेसी नेता और मुख्यमंत्री भजन लाल के खिलाफ दुराचार के आरोप के एक मुकदमे को पुंछी ने जिस दिन खारिज किया था उसी दिन उनकी पुत्रियों को मुख्यमंत्री के विवेकाधिकार पर जमीन के प्लाट प्राप्त हुए थे. पुंछी ने केस गलत तरीके से जिताया था और उस मामले की सुनवाई करने का प्रयास किया था जिसमें वह स्वयं एक पक्ष थे.

29वें सीजेआई ए.एस. आनंद पर भाई-भतीजावाद और रियल एस्टेट के भ्रष्ट सौदों में संलिप्त होने का आरोप लगा था. पदोन्नति के बाद आरोप पत्र सामने आया और उन्होंने महाभियोग की कार्यवाही का सामना नहीं किया. 36वें सीजेआई वाई. के. सभरवाल ने अवैध रूप से निर्मित व्यवसायिक भवन-समूहों को ध्वस्त करने के कई आदेश पारित किए. इसके कारण शॉपिंग मॉल जैसी वैध व्यसायिक सम्पत्तियों की कीमतें तेजी से बढ़ गईं. सभरवाल की सेवानिवृत्ति के बाद बताया गया कि ध्वस्तीकरण अभियान के चरम पर उनके बेटे के व्यापार को राजधानी और आसपास के मॉल मालिकों से लाखों रुपए के फंड प्राप्त हुए.

37वें सीजेआई के. जी. बालाकृष्णन के कार्यकाल में उनके परिवार के नसीब में नाटकीय ढंग से उछाल आया. उनके एक दामाद ने दस करोड़ रुपए से अधिक की सम्पत्ति जमा कर ली. केरल उच्च न्यायालय में अधिकारी और बालाकृष्णन के भाई ने तमिलनाडु में एक फार्महाउस का स्वामित्व प्राप्त कर लिया, उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद त्यागपत्र दे दिया. न्यायाधीश के भतीजे ने बड़े व्यापारिक उपक्रम आरंभ किए. एक पूर्व संसद सदस्य ने आरोप लगाया कि बालाकृष्णन के दामाद और भाई ने अनुकूल फैसलों और न्यायिक नियुक्तियों के लिए सौदेबाजियां की थीं. न्यायिक सत्यनिष्ठा के मजबूत योद्धा अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने 2009 में तहलका पत्रिका को बताया कि उनके विचार से भारत के विगत सोलह या सत्रह मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट रहे हैं. उन्हें तुरंत ही न्यायालय की अवमानना के आरोपों का सामना करना पड़ा.

“जॉब्स फॉर जस्टिस: करप्शन इन द सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया” (इंसाफ के लिए नौकरियां: भारत के उच्चतम न्यायालय में भ्रष्टाचार) शीर्षक से एक शोधपत्र में शोधकर्ता ने “सुप्रीम कोर्ट के बाद नौकरी पाने की संभावना को बढ़ाने के लिए प्रमुख मामलों में सरकार के पक्ष में फैसलों में हेरफेर करने वाले न्यायाधीशों” पर ध्यान केंद्रित किया है. वे मानते हैं कि न्यायाधीशों के “दलाली करने का प्रोत्साहन” दो कारकों द्वारा निर्धारित होते हैं. पहला है- केस की प्रमुखता जिसका संकेत इससे मिलता है कि उसमें सरकार का प्रतिनिधित्व कौन करता है. दूसरा यह- कि क्या न्यायाधीश अगले आम चुनाव से कम से कम 16 महीने पहले अवकाश प्राप्त करने वाले हैं. मान्यता यह है कि अगर निर्णय नहीं लिया जाता है तो सम्भवत: सरकार के चुनाव हार जाने से पहले उन्हें पसंद के पद पर बैठाने का पर्याप्त समय इसके पास नहीं हो सकता है. शोध से पता चलता है कि “न्यायाधीश सरकार का पक्ष लेते हुए भ्रष्टाचार में तभी लिप्त होते हैं जब केस महत्वपूर्ण होता है और न्यायाधीश चुनाव से काफी पहले रिटायर होते हैं” और यह कि जो न्यायाधीश महत्वपूर्ण मामलों में सरकार के पक्ष में फैसले लिखते हैं उनकी प्रतिष्ठित सरकारी नौकरियां पाने की संभावना अधिक होती है.

  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles