मोहम्मद दीपक

मोहम्मद दीपक
February 14 07:27 2026

डॉ.पंकज श्रीवास्तव
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार से इसी राज्य का ऊधम सिंह नगर करीब पौने दो सौ किलोमीटर है, लेकिन इस शहर के जिम ट्रेनर दीपक कुमार ने जिस तरह एक बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार को बचाने के लिए अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया, उसने दोनों के बीच एक ऐतिहासिक तार जोड़ दिया। दीपक कुमार के साहस ने याद दिलाया कि ब्रिटिश जेल में फांसी का फंदा चूमने के पहले शहीद ऊधम सिंह ने अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ बताया था। ऊधम सिंह 13 अप्रैल 1921 को हुए जलियांवाला हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शी थे और उन्होंने लंदन जाकर पंजाब के गवर्नर जनरल रह चुके माइकल ओ डायर को गोली मार दी थी। यह घटना 13 मार्च 1940 की थी।भगत सिंह को अपना आदर्श मानने वाले ऊधम सिंह कोई आम क्रांतिकारी नहीं थे। पकड़े जाने के बाद उन्होंने ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ नाम बताकर भारत को परिभाषित किया था। इसका मतलब था कि वे एक हिंदू-मुस्लिम-सिख समुदाय के साझे सपनों के लिए $कुर्बान हो रहे हैं। 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फाँसी दे दी गईं।

यह कहना तो मुश्किल है कि दीपक कुमार ने जब 70 वर्षीय दुकानदार वकील अहमद को बजरंग दल के हमले से बचाने की कोशिश में अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया तो उनके दिमाग में शहीद ऊधम सिंह का ख्याल था कि नहीं, लेकिन उन्होंने वही किया जो ऊधम सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का संकल्प था।बजरंग दल की नजर में वकील अहमद का अपराध ये था कि उन्होंने दुकान का नाम ‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर’ रखा था। बजरंग दल की नजर में ‘बाबा’ हिंदू धर्म से जुड़ा हुआ शब्द है।यह विरोध बजरंग दल वालों की अपढ़ता ज़ाहिर करता है क्योंकि बाबा शब्द $फारसी का है और पीर-फकीरों के साथ भारत में लोकप्रिय हुआ, लेकिन अगर यह हिंदी का भी शब्द होता तो क्या किसी मुस्लिम का हिंदी शब्द का इस्तेमाल करना गैरकानूनी है। भाषा को धर्म के साथ जोडऩे की इस सोच में जो नफरत भरी है, शहीद ऊधम सिंह उसी के खिलाफ थे और दीपक ने उस समय अपने नाम के साथ ‘मोहम्मद’ जोड़कर बताया कि किसी ज़ुल्म के खिलाफ खड़ा होना ही सच्चा धर्म है।
दीपक कुमार को अपने धर्म के निभाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। पुलिस ने दीपक के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर लिया है जो उत्तराखंड में प्रशासन के सांप्रदायिक होने की गवाही है। यही नहीं दीपक कुमार को तरह-तरह की धमकियां भी दी जा रही हैं। उन्हें अपना जिम चलाना मुश्किल हो रहा है। लेकिन यह विवाद इस बात का भी संकेत है कि सांप्रदायिक उन्माद की राजनीति अब हिंदुओं को बेचैन करने लगी है।

हिंदुओं का एक तबका अब धर्म के नाम पर हो रहे खुले अन्याय के खिलाफ मुखर हो रहा है।
मथुरा जिले की घटना इस संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण है। एक मुस्लिम प्रिंसपल पर बिना ठोस सबूत के नमाज़ पढ़ाने का आरोप लगाया गया। यह वही पुरानी स्क्रिप्ट थी—आरोप लगाओ, भावनाएं भड़काओ और राजनीतिक लाभ उठाओ। लेकिन इस बार कहानी ने मोड़ लिया। स्थानीय हिंदू समुदाय ने न केवल इस झूठे आरोप पर सवाल उठाए, बल्कि निलंबित शिक्षक के समर्थन में खड़े हुए और उसकी वापसी की माँग की। यह प्रतिक्रिया बताती है कि हर हिंदू अब हर सांप्रदायिक नैरेटिव को आँख मूंदकर स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यहां सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। क्या हिंदू समाज को यह एहसास हो रहा है कि नफरत उसके धर्म की मूल आत्मा नहीं है? हिंदू दर्शन की केंद्रीय धुरी करुणा, सहअस्तित्व और विविधता में एकता रही है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टि है। जब राजनीति इस दृष्टि को संकीर्ण पहचान और स्थायी शत्रु की अवधारणा से बदलने की कोशिश करती है, तो एक समय के बाद थकान और अस्वीकार पैदा होना स्वाभाविक है।

स्वामी विवेकानंद ने भारत के भविष्य के बारे में कहा था कि उसे ‘इस्लामी शरीर और वेदांती मस्तिष्क’ की जरूरत है—अर्थात कर्मठता, अनुशासन और आध्यात्मिक उदारता का संगम। इस कथन का सार यही है कि भारत किसी एक धार्मिक शुद्धता से नहीं, बल्कि विविध परंपराओं के मेल से आगे बढ़ेगा। ऐसे में नफरत फैलाने वाली ताकतें न केवल मुस्लिम समाज के लिए, बल्कि स्वयं हिंदू धर्म के लिए भी एक बड़ा खतरा हैं। वे हिंदू धर्म को उसकी दार्शनिक गहराई से काटकर उसे महज़ एक आक्रामक पहचान में बदल देना चाहती हैं।चुनावी गणित में ध्रुवीकरण सबसे सस्ता और असरदार हथियार माना जाता है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसे जटिल सवालों से ध्यान हटाकर धार्मिक भावनाओं को उकसाना सत्ता के लिए सुविधाजनक होता है। लेकिन इस खेल की कीमत समाज चुकाता है—टूटी हुई सामाजिक एकता, आपसी अविश्वास और स्थायी तनाव के रूप में।फिर भी, हालिया घटनाएँ उम्मीद की एक पतली-सी रेखा खींचती हैं। जब आम हिंदू यह सवाल पूछने लगता है कि ‘क्या यह वाकई मेरे धर्म की रक्षा है, या मेरे नाम पर किसी और का एजेंडा? ‘, तब सांप्रदायिक राजनीति की जमीन खिसकने लगती है। मथुरा जिले में शिक्षक की वापसी की माँग, झूठे आरोपों के ख़िला$फ खड़ा होना, और पहचान की दीवारों को तोडऩे वाले प्रतीकात्मक कदम—ये सब संकेत हैं कि समाज के भीतर एक नैतिक प्रतिरोध जन्म ले रहा है।

यह प्रतिरोध कोई संगठित आंदोलन नहीं, बल्कि विवेक की धीमी लेकिन गहरी आवाज है। यह आवाज कहती है कि धर्म का काम डर पैदा करना नहीं, बल्कि भय से मुक्ति दिलाना है; धर्म का उद्देश्य किसी और को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाना है। अगर हिंदू समाज इस आवाज को सुनता है और उसे राजनीतिक शोर से ऊपर रखता है, तो शायद भारत एक बार फिर उस रास्ते पर लौट सके, जहाँ विविधता संघर्ष का नहीं, बल्कि शक्ति का स्रोत थी।

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Mazdoor Morcha
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