महिलाओं की सामाजिक दशा से हम सामाजिक विकास को नाप सकते हैं – कार्ल माक्र्स मलयालम फिल्म उद्योग में महिला कलाकारों/मज़दूरों के शारीरिक शोषण, बलात्कार की ख़बरें हर रोज़ आने लगी थी। हक़ीक़त जानने के लिए केरल सरकार ने 2017 में 3 सदस्यीय आयोग गठित किया; जस्टिस के हेमा (अध्यक्ष), सेवानिवृत्त मलयालम महिला कलाकार शारदा तथा सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी के बी वसला कुमारी। ‘हेमा आयोगÓ नाम से बोले जाने वाले, इस आयोग ने मलयालम फिल्म उद्योग में काम कर रहीं 51 महिला कलाकारों/मज़दूरों से बात करने के बाद अपनी 296 पृष्ठ की रिपोर्ट अभी 19 अगस्त को प्रकाशित की।
महिलाओं को तो इस महत्वपूर्ण दस्तावेज़ की एक-एक लाइन पढऩी ही चाहिए। साथ ही समाज के हर जागरुक, विवेकशील इंसान को हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति के इस महत्वपूर्ण दस्तावेज़ को गंभीरता से पढऩा चाहिए। महिलाओं के लिए सम्मानपूर्ण, मर्यादापूर्ण जीवन जीना कितना दुश्वार हो गया है? सामाजिक-सांस्कृतिक सड़ांध किस स्तर तक पहुंच चुकी है? हमारी बहन-बेटियों-पोतियों-बहुओं के लिए आने वाला वक़्त कैसा होने जा रहा है? पतन किस स्तर तक पहुंच चुका है? आने वाली नस्लों को हम कैसा समाज छोड़कर जाने वाले हैं? यह जानना, हर जिंदा इंसान के लिए ज़रूरी है। मलयालम फि़ल्म उद्योग तो एक बानगी है, हर तरफ़ यही हालात हैं या इससे भी ज्यादा भयावह।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम एक हैं! आयोग की प्रमुख टिप्पणियां, इस तरहहैं: 1) आयोग के लाख मनाने पर भी अधिकतर महिलाओं ने, खासतौर पर जूनियर कलाकारों / मज़दूरों ने यह तो स्वीकार किया कि हमें हमारे कार्य-स्थल पर हर रोज़ भयंकर लंपटता, वासना की भूखी नजऱों, जीभ लपलपाती भाव-भंगिमाओं और मना करने पर झिड़कियों, मार-पीट को झेलना पड़ता है, भयानक मानसिक संताप झेलना पड़ता है लेकिन, हम कोई ब्यौरा नहीं देंगीं क्योंकि हमें जॉब चाहिए। हमें अपना घर चलाना है। आपको बताकर भी कुछ नहीं होगा बस हमारा रोजग़ार छिन जाएगा। हमने हमारी कई साथियों को अपमानित कर काम से निकाले जाते हुए देखा है।
2) सिनेमा में हीरोइन से लेकर मज़दूर तक लगभग हर महिला को कोई भी छोटे से छोटा काम पाने के लिए कई-कई लंपटों के साथ सोना पड़ता है और यह सिलसिला कभी भी पूरी तरह बंद नहीं होता।
3) काम की जगह, आराम करने की जगह, सामूहिक वाहन में आते-जाते तथा रात को ठहरने की जगह भयानक शारीरिक शोषण, हमले, गाली-गलौज, झिड़कियां और मार-पीट तक झेलने पड़ते हैं।
4) रोजग़ार के लिहाज़ से ओहदेदार व्यक्ति की सेक्स की मांग को ठुकराते ही हमारा जीवन दूभर कर दिया जाता है।
5) सिनेमा के सेट पर हमारी मूलभूत नागरिक ज़रूरतों, मानवाधिकारों जैसे महिला शौचालय तथा कपड़े बदलने के लिए प्राइवेट रूम का भी सम्मान नहीं होता।
7) हमें हर जगह कोई भी काम करते वक़्त पुरुषों से अपनी सुरक्षा की गंभीर चिंता लगी रहती है। हम बहुत ही असुरक्षित और घुटन भरे माहौल में जीती हैं, काम करती हैं।
8) सिनेमा उद्योग में कोई श्रम क़ानून लागू नहीं। कभी भी किसी को भी काम से निकाल दिया जाता है। हर तरह के शोषण जुल्म-ओ-ज़बर सहन करते रहने की यह सबसे प्रमुख वज़ह है।
9) फिल्म उद्योग में कोई अनुशासन नहीं है। हर वक़्त शराब तथा ड्रग का इस्तेमाल होता है और फिर इन नशेडिय़ों से ख़ुद को बचाना
10) फिल्म उद्योग में पुरुषों का वर्चस्व तथा पित्रसत्तात्मकता सबसे भयानक है, बहुत मुश्किल हो जाता है।
11) महिलाओं को कमज़ोर और कमतर बताने वाली, ज़लील करने वाली अश्लील टिप्पणियां, झिड़कियां यहां आम बात हैं।
12) हमारे साथ जो वेतन व सेवा-शर्तों का समझौता होता है उसका पालन मालिक लोग कभी नहीं करते। तय-शुदा वेतन हमें कभी नहीं मिलता। पुरुष और स्त्रियों के वेतन में भयंकर अंतर है।
13) काम ख़त्म कर घर पहुंचने पर भी हमें शोषण से मुक्ति नहीं मिलती। ऑनलाइन अश्लीलता, लंपटता शुरू हो जाती है।
14) फिल्म उद्योग में महिलाओं को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं है। कोई सिखाने-समझाने वाला भी नहीं है। कोई ऐसी अथॉरिटी भी नहीं जिसके सामने जाकर हम अपना दुखड़ा रो सकें, इंसाफ मांग सकें। हम घुट-घुट कर जीते हैं।