फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) गोंच्छी उप तहसील में रजिस्ट्री कार्यालय के कंप्यूटर ऑपरेटरों की हरामखोरी और निकम्मापन इस हद तक बढ़ गया है कि लोग लाइन लगाए खड़े रहते हैं और वो सीट छोड़ कर चले जाते हैं। दरअसल, इन कंप्यूटर ऑपरेटरों को एसडीएम त्रिलोकचंद, तहसीलदार नेहा सरन, नायब तहसीलदार उमेश कसाना और डीआरओ सुशील कुमार का वरद्हस्त और अभयदान प्राप्त है। यही कारण है कि शिकायत किए जाने पर भी ये अधिकारी अपने कमाऊ पूत कंप्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते।
उप तहसील में सप्ताह में केवल तीन दिन सोमवार-मंगलवार और शुक्रवार को रजिस्ट्री का कार्य होता है। इसके लिए आवेदकों को पहले से टोकन खरीदना पड़ता है यानी स्टांप शुल्क, रजिस्ट्री फीस आदि पहले ही जमा करवानी पड़ती है। बीते सोमवार को भी रजिस्ट्री का काम चल रहा था।
एक वकील अपने विक्रेता-क्रेता मुवक्किल के साथ जमीन बेचने संबंधित दस्तावेज और टोकन लेकर पहुंचे। वहां मौजूद कंप्यूटर ऑपरेटर विनोद और सुधीर ने रजिस्ट्री करने से इनकार कर दिया। वकील ने कारण पूछा तो दोनों ने कहा कि साहब यानी डीआरओ सुशील कुमार ने मना कर रखा है, हम काम नहीं करेंगे। रजिस्ट्री बंद होने की जानकारी होने पर सोमवार का टोकन लेकर लाइन में लगे करीब पचास आवेदक परेशान हो गए। वकील गजेंदर सोलंकी, अश्वनी लाला, देवकरन आदि ने कहा कि अभी तक पंद्रह-बीस रजिस्ट्री हो चुकी हैं तब क्या डीआरओ ने मना नहीं किया था। इतना सुनते ही विनोद भड़क गया और सभी कंप्यूटर ऑपरेटरों को काम बंद कर सीट छोडऩे को कहा। उसकी आवाज पर सभी कंप्यूटर ऑपरेटर कुर्सी छोड़ कार्यालय का गेट बंद कर बाहर निकल गए। कुछ लोगों ने काम पर लौटने की मिन्नत कीं तो उनसे अभद्र व्यवहार करते हुए कहा गया कि हम नहीं बैठेंगे जाओ जहां से बने वहां से रजिस्ट्री करा लो।
कंप्यूटर ऑपरेटरों की अभ्रदता और काम बंद करने से गुस्साए एक वकील ने तहसीलदार नेहा सरन को फोन कर शिकायत की, उन्होंने टाल मटोल वाले अंदाज में जवाब दिया। पुलिस को फोन किया गया, दो पुलिस कर्मी आए लेकिन कुछ किए बिना ही चले गए। ऑपरेटरों के न आने पर नेहा सरन को कई बार कॉल की गई लेकिन उन्होंने शाम छह बजे तक किसी का फोन नहीं उठाया। उप तहसील में न तो डीआरओ सुशील वर्मा मौजूद थे न ही नायब तहसीलदार उमेश कसाना, न ही इन लोगों ने फोन उठाए। बेचारे क्रेता-विक्रेता शाम तक भूखे प्यासे परेशान होते रहे और निराश होकर लौटने को मजबूर हुए।
उप तहसील सूत्रों के अनुसार यहां बिना लेन देन के रजिस्ट्री होना नामुमकिन है। रजिस्ट्री की कीमत के हिसाब से क्लर्क नजराना राशि वसूलते हैं। ये नजराना केवल वो ही अकेले नहीं रख लेते। तहीसलदार महोदया यहां आती नहीं, डीआरओ और नायब तहसीलदार भी नहीं बैठते, दस्तावेजों पर इन अधिकारियों के हस्ताक्षर कराने के लिए उनके घर जाना पड़ता है, खासकर नेहा सरन के यहां। ये अधिकारी हिस्सापत्ती मिलने के बाद ही हस्ताक्षर करते हैं अन्यथा फाइल लटका दी जाती है। हालात ये हैं कि रजिस्ट्री तो आज हो गई लेकिन मैडम व अन्य अधिकारियों के हस्ताक्षर के लिए एक एक हफ्ते तक रुकी रहती है, जब हस्ताक्षर होंगे तब मिलेगी।
सूत्र बताते हैं कि बिना मुट्ठी गर्म किए रजिस्ट्री नहीं की जाती, वकील तो रिश्वत देने से रहे। सोमवार को कुछ वकील अपने क्लाइंटों की रजिस्ट्री कराने आए थे, उनसे रिश्वत की राशि नहीं मिली तो काम ही बंद कर दिया गया। वकीलों ने दबाव डाला तो क्लर्कों ने डीआरओ से लेकर तहसीलदार नेहा सरन को बता दिया कि वकील बिना जेब भरे ही काम करवाना चाहते हैं, साहब ने उन्हें काम बंद करने को कह दिया। अब साहब का हाथ हो तो फिर एचकेआरन के कच्चे कंप्यूटर ऑपरेटर किसी को गिनती में क्यों लेते। साहब ही नहीं मैडम नेहा सरन ने भी कमाऊ पूतों को संरक्षण दिया और वकीलों के फोन उठाने ही बंद कर दिए।
करीब दस वकीलों ने सेक्टर 55 चौकी और नायब तहसीलदार कार्यालय में कंप्यूटर ऑपरेटर विनोद, सुधीर आदि के खिलाफ शिकायत दी है। शिकायत में आरोप लगाए कि इन कर्मचारियों के कार्यालय समय में अपनी सीट छोड़कर जाने, सरकारी काम में लापरवाही बरतने के कारण करीब पचास टोकन धारी रजिस्ट्री के लिए परेशान हुए। कई क्रेता-विक्रेताओं के बीच धनराशि का लेन-देन भी हो चुका था लेकिन रजिस्ट्री नहीं होने से क्रेताओं को पैसा डूबने का डर सता रहा है। कई विक्रेता दूसरे राज्य या जिलों से आए थे, उन्हें दोबारा अपने काम का नुकसान करके रजिस्ट्री के लिए आना होगा। वकीलों ने कंप्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। शिकायत दिए चार दिन बीत चुके हैं लेकिन पुलिस और न ही नायब तहसीलदार ने कोई कार्रवाई की। समझा जा सकता है कि जो अधिकारी ही भ्रष्टाचार करवा रहे हों वो अपने रिश्वतखोर मातहत के खिलाफ कार्रवाई नहीं ही करेंगे।
उप तहसील में आधारभूत सुविधाएं भी नहीं उप तहसील गोंच्छी 2016 में बनाई गई थी तब इस इमारत को अस्थायी रूप से इस्तेमाल के लिए लिया गया था। तब से इसे जल्द ही शिफ्ट किए जाने की बात हो रही है लेकिन आज तक कुछ नहीं किया गया। हालात ये हैं कि यहां पीने के पानी और शौचालय की व्यवस्था नहीं है। शौचालय नहीं होने के कारण यहां घंटों इंतजार करने वालों खास कर महिला, बुजुर्गों और बीमारी से पीडि़त लोगों को बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है। पेयजल की व्यवस्था नहीं होने से लोगों को बाहर से महंगे दाम पर पानी खरीद कर प्यास बुझानी पड़ती है। यही नहीं बरसात में फर्श पर जलभराव हो जाता है, आवेदकों को आने जाने के लिए खुद ईंट रख कर रास्ता बनाना पड़ता है, यह काम भी उप तहसील के कर्मचारी नहीं करते।