‘गंगा जमुनी तहजीब’ मिथक या हकीकत

‘गंगा जमुनी तहजीब’ मिथक या हकीकत
February 13 10:01 2026

राम पुनियानी
भारतीय संस्कृति क्या है? क्या वह विशुद्ध हिन्दू संस्कृति है या फिर कई संस्कृतियों का मिश्रण है? इन दिनों इस तरह के कई सवाल उठ रहे हैं। हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र के पैरोकार हिन्दू दक्षिणपंथियों का दावा है कि भारतीय संस्कृति, दरअसल हिन्दू संस्कृति है। इस संस्कृति पर मुस्लिम आक्रान्ताओं ने जबरदस्त हमले किए मगर उसने इन हमलों का पुरजोर प्रतिरोध किया। यह सही है कि हिन्दू धर्म त्यागकर इस्लाम अपनाने वालों में से कुछ अपने हिन्दू अतीत से पूरी तरह कट नहीं पाए। हाल में कलकत्ता में आयोजित ‘हिन्दू धर्म की हिन्दुत्व से रक्षा आवश्यक है’ विषय पर विचार-विनिमय के दौरान यह मसला एक बार फिर सामने आया।

हिन्दुत्ववादी विचारक इस आशय की दलीलें लम्बे समय से देते आ रहे हैं कि भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति एक ही हैं। इनमें से एक, जे। साईं दीपक, जो कोलकाता में हुए विचार-विमर्श में शामिल थे, कहते हैं कि ‘जिसे गंगा-जमुनी तहजीब कहा जाता है, उस अजीब-से प्राणी का महिमामंडन आज़ादी के बाद जवाहरलाल नेहरू और उनके द्वारा जुटाए गए मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकारों द्वारा इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का नतीजा है।’ उनका कहना है कि 1916 से 1923 के बीच इस सोच ने जोर पकड़ा।

गंगा-जमुनी तहजीब क्या है? मोटे तौर पर इसका मतलब है हिन्दुओं और मुसलमानों के करीब एक हजार साल साथ-साथ रहने के दौरान विकसित हुई मिलीजुली संस्कृति। सातवीं सदी में भारत में इस्लाम के आगमन के साथ हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे को प्रभावित करने लगे। यह मिलीजुली संस्कृति मध्यकाल में फली-फूली। सल्तनत और मुगल सम्राटों का लक्ष्य स्थानीय संस्कृति को नष्ट करना नहीं था बल्कि उनकी प्राथमिकता थी सत्ता और दौलत हासिल करना. उन्होंने भारत के एक बड़े इलाके पर राज किया और उसके दौरान ही समन्वयात्मक परंपराएं विकसित हुईं, जिनमें से कई हमारे देश के अनेक हिस्सों में अब भी कायम हैं।

इस मिली-जुली संस्कृति की शुरूआत मुस्लिम राजाओं के शासनकाल में हुई, विशेषकर उत्तर भारत के गंगा और जमुना नदियों के आसपास के क्षेत्रों में। और इसी वजह से इसका यह नाम पड़ा। आजादी के आंदोलन के कई नेताओं ने इसे रेखांकित किया। लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उदासीनता का रवैया अपनाने वाले मुस्लिम और हिन्दू राष्ट्रवादियों ने हिन्दुओं और मुसलमानों के इस मेल-मिलाप को पसंद नहीं किया। सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में हिंदुओं और मुसलमानों की यह अंत:क्रिया मध्यकालीन भारत में फली-फूली और आज भी कई स्थानों पर जारी है, हालांकि यह उतनी साफ नजर नहीं आती।

अध्येता बी. एन. पांडे इसका सार अति उत्तम शब्दों में प्रस्तुत करते हैं ”इस्लाम और हिन्दू धर्म-जो प्रारंभ में परस्पर विरोधाभासी नजर आते थे-अंतत: घुलमिल गए। दोनों एक दूसरे की पूरी गहराई में समा गए और इनके मिलन से प्रेम और निष्ठा के मजहब भक्ति और तसव्वु$फ विकसित हुए, जो अलग-अलग धर्मों और पंथों के लाखों लोगों के दिलो-दिमाग में बस गए। इस्लामिक सूफी पंथ और हिंदू भक्ति पंथ की धाराएं मिलकर एक विशाल नदी बन गए जिसने पुराने उजाड़ इलाकों को फिर से हरा-भरा बना दिया और देश का चेहरा बदल दिया…इससे मध्यकाल में कलात्मक स्मारकों, साहित्य, चित्रकला, संगीत और काव्य का सृजन हुआ और प्रेम से प्रेरित धर्म विकसित हुआ जो भारतीय इतिहास की विरासत है।

मुस्लिम राजाओं, इस्लाम और स्थानीय संस्कृति के मिलेजुले प्रभाव से जीवन के सभी क्षेत्रों में संस्कृति की एक मिलीजुली धारा प्रवाहित हुई। संगीत में ख्याल, गजल और ठुमरी इस अंत: क्रिया के परिणामों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत को हम आज जिस रूप में जानते हैं, वह हिंदू और मुस्लिम तत्वों के मिलन की 500 सालों से जारी प्रक्रिया से हासिल हुआ है। बीजापुर के इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय (1580-1626) के दरबार में 300 हिंदू गायक थे। मुसलमानों में इस संगीत को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने स्वयं उर्दू में किताब-ए-नवरंग नामक पुस्तक की रचना की, (जिसमें 59 कविताएं थीं और पहली कविता में देवी सरस्वती की स्तुति थी)।

चैतन्य महाप्रभु और अन्य वैष्णव संतों के प्रभाव में कई मुसलमानों ने उनकी तरह का लेखन किया। रहीम और रसखान की गिनती अत्यंत लोकप्रिय हिन्दी कवियों में होती है जिन्होंने बृजभाषा में भगवान श्रीकृष्ण की कीर्ति का बखान किया है। सैयद वाजिद शाह ने ‘हीर और रांझा’ लिखी जिसकी गिनती मध्यकाल की महानतम रचनाओं में होती है। शेख मोहम्मद का मराठी साहित्य में बड़ा योगदान है।
फारसी बोली और दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली पश्चिमी हिन्दी के मिश्रण से एक नई भाषा उत्पन्न हुई जिसे बाद में उर्दू के नाम से जाना गया। कई महान हिन्दू साहित्यकारों ने उर्दू को न केवल प्रशासनिक भाषा के रूप में अपनाया बल्कि उन्होंने उर्दू में साहित्य रचना कर उस भाषा के साहित्य भंडार को समृद्ध किया। हिन्दू वास्तुकला को मुस्लिम वास्तुकला की बारीक नक्काशी ने प्रभावित किया। इन दोनों के मिश्रण ने उस दौर में अनेक शानदार इमारतों को आकार दिया। आगरा के किले में स्थित जोधाबाई के महल, फतेहपुर सीकरी और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की मेहराबों में यह सम्मिश्रण देखा जा सकता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की हवेलियाँ और जोधपुर, बीकानेर व जैसलमेर की इमारतें भी भारत-अरब स्थापत्यकला के नमूने हैं। $फारसी तकनीक और गहरे हिन्दू रंगों के मिश्रण से लघु चित्रकला की एक मनमोहक शैली विकसित हुई।

समाज में एक-दूसरे के त्यौहारों का मनाया जाना इस हद तक एकदम आम बात थी कि दीवाली जैसे हिन्दू त्यौहार को जश्न -ए-चिराग के रूप में मनाया जाता था और होली को जश्न -ए-गुलाबी नाम से। टीपू सुल्तान के राज वाले मैसूर में बादशाह के संरक्षण में दशहरा दस दिन तक मनाया जाता था। ताजिए के जुलूसों में सभी समुदायों की भागीदारी होती थी। ये परंपराएं आज भी कायम हैं। शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता इरफान इंजीनियर हाल में वर्करी डिंडी में शामिल हुए। उनके अनुसार ‘जब वारी (वरकारी तीर्थयात्रा का एक भाग) ईद या अन्य मुस्लिम त्यौहारों के दौरान किसी मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरती है, तो मुस्लिम समुदाय या तो अपने आयोजन स्थगित कर देता है या अपना भोजन वरकारियों के साथ सांझा कर उन्हें अपने उत्सव में शामिल कर लेता है। कई मुसलमान वारी में शामिल भी हो जाते हैं”। हम अकबर के हिन्दू नवरत्नों बीरबल और टोडरमल के बारे में अच्छे से जानते हैं। प्रोफेसर अतहर अली के अनुसार औरंगजेब के दरबार के लगभग 33 प्रतिशत अधिकारी हिन्दू थे, जिनमें राज जयसिंह और राजा रघुनाथ बहादुर भी थे। मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज के कई सैन्य अधिकारी मुस्लिम थे। हमारे सामाजिक जीवन में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं।

हमारी संस्कृति पर टिप्पणी करते हुए जवाहरलाल नेहरू अपनी महान पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडियाÓ में गंगा जमुनी तहजीब का जिक्र करते हैं। यह कोई अभिप्रेरित टिप्पणी नहीं थी बल्कि हमारे अतीत और वर्तमान का हिस्सा है। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में सभी धर्मों के लोगों ने समान उत्साह और लगन से भागीदारी की, सिवाए उनके जो बहुलता और लोकतंत्र के खिलाफ थे। नेहरू हमारे अतीत का अत्यंत उत्तम तरीके से विवरण देते हैं। उनके अनुसार भारत एक प्राचीन स्लेट की तरह है जिस पर इतिहास, संस्कृति और विचारों (जैसे मुगल, ब्रिटिश आदि) की नई परतें पुरानी के ऊपर चढ़ती गईं, लेकिन नई परतों ने पुरानी परतों को पूरी तरह नहीं मिटाया, जिससे एक सतत, जटिल सभ्यता निर्मित हुई जिसमें विविधता के बावजूद गहन एकता थी। यहाँ जोर किसी परंपरा को मिटाने पर नहीं बल्कि उसे अपना बनाने पर था। इसी दृष्टिकोण के आधार पर वे एक आधुनिक, लोकतांत्रिक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे। वर्तमान समय में जब साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए घृणा प्रेरित हिंसा को हवा दी जा रही है, ऐसे में गंगा जमुनी तहजीब के मूल्यों को कायम रखना अत्यंत आवश्यक है।
(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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