भाजपा राज में भ्रष्टाचार बना शिष्टाचार मज़दूर मोर्चा ब्यूरो जनता को भ्रष्टाचार के विरुद्ध ज़ीरो टॉलरेंस का झांसा देने वाले सीएम खट्टर के राज में भ्रष्ट नेताओं के गठजोड़ से नगर निगम के हरामखोर अधिकारियों ने करीब 1400 करोड़ की बंदरबांट कर डाली। निगम अधिकारियों की हरामखोरी और भ्रष्टाचार का खुलासा विधानसभा की शहरी स्थानीय निकाय एवं पंचायती राज संस्थाओं से संबंधित मामलों की कमेटी द्वारा वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान किए गए वित्तीय लेन-देन की जांच में हुआ। समझने वाली बात है कि यह आंकड़ा तो केवल वित्त वर्ष 2019-20 का है, यदि तब से आज तक का रिकॉर्ड जांचा जाए तो यह गबन की गई धनराशि कहीं ज्यादा बढ़ चुकी होगी, क्योंकि कमेटी ने पाया कि केवल 2018-19 से 2019-20 के बीच ही बिना हिसाब के खर्च की गई या यूं कहें कि हड़पी गई धनराशि में करीब अस्सी करोड़ का इजाफा हुआ था।
प्रदेश के दस नगर निगमों में हुए इस घोटाले की जानकारी बीते दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सिरसा की सांसद कुमारी सैलजा ने प्रेस से साझा की थी। उनके द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार विधानसभा की उस कमेटी ने जांच में पाया कि दस नगर निगमों के वित्तीय लेन देन की जांच की तो सामने आया कि अधिकारियों ने विभिन्न विकास कार्यों के नाम पर 1398.98 करोड़ रुपये पेशगी तो लिए लेकिन आज तक इस धनराशि का कोई हिसाब नहीं दिया गया। अब क्योंकि सरकारी धन के गबन (कमेटी के शब्दों में धनराशि का हिसाब नहीं दिेए जाने) का मामला है तो प्रदेश के भ्रष्ट नगर निगमों में प्रथम स्थान पर रहने वाले फरीदाबाद नगर निगम ने यहां भी खिताब अपने पास रखा है। गबन की गई धनराशि का 56 प्रतिशत यानी 781.75 करोड़ रुपया अकेले फरीदाबाद नगर निगम के भ्रष्ट अधिकारियों ने विकास के नाम पर इधर-उधर कर डाला। यह तो होना ही था क्योंकि दो सौ करोड़ के घोटाले से मुग्ध सीएम खट्टर ने इस विधा में माहिर चीफ इंजीनियर डीआर भास्कर से लेकर, नगर निगम में सुधार का अध्ययन करने के लिए संदिग्ध धन खर्च कर लंदन का टूर करने वाली सोनल गोयल, एम शाईन, अनीता यादव और पांच लाख का लहंगा पहनने व सोने के बिस्कुट की शौकीन मोना ए श्रीनिवास जैसे चुने हुए मोहरों को निगम की बागडोर सौंपी। नगर निगम में केंद्रीय मंत्री का भ्रष्ट ‘बेटा’ ओमदत्त भ्रष्टाचार के आरोप में दिखावे के लिए निलंबित करके मुख्यालय अटैच किया जाता है लेकिन चंद दिनों में फिर बहाल कर दिया जाता है। सत्तापक्ष के नेता और उनके समर्थकों को फायदा पहुंचाने के लिए अवैध रूप से ‘सशर्त’ अनुमति पत्र जारी करने वाले सीटीपी सतीश पाराशर को सजा के तौर पर बेहतर नगर निगम गुडग़ांव भेजा जाता है फिर वहां से पदोन्नत कर वापस फरीदाबाद नगर निगम भेजा जाता है ताकि वह अरावली के संरक्षित वन क्षेत्र की जमीन मंत्री, विधायक और उनके चेलों को दिलाने के रास्ते बना सके। फर्जी डिग्री वाले इंजीनियर पद्म भूषण आदि विकास के नाम पर लूटपाट ही करेंगे।
स्टेडियम निर्माण के लिए बेनाम सी गुजराती कंपनी रणजीत बिल्डकॉन को मोटा ठेका देने, प्रॉपर्टी आईडी बनाने का अनुभव नहीं रखने वाली संघी कंपनी याशी कंसल्टेंसी हो या ईकोग्रीन कंपनी, निगम के भ्रष्ट अधिकारियों ने मोदी-खट्टर की मंशा के अनुरूप इन कंपनियों पर खूब धन लुटाया, जाहिर है कि उनके नाम पर अधिकारियों ने भी बहती गंगा में खूब हाथ धोए ओर मोटा माल बनाया। फरीदाबाद नगर निगम में अधिकारियों ने सरकारी धन की बंदरबांट की तो गुडग़ांव नगर निगम वाले क्यों पीछे रहते। वहां भी अधिकारियों ने एडवांस के नाम पर 403.86 करोड़ रुपये बिना हिसाब रखे खर्च कर डाले।
समिति की रिपोर्ट से यह तो स्पष्ट है कि सरकार ने दो सौ करोड़ के घोटाले के बाद भी भ्रष्टाचारियों को ढील दिए रखी। इसी का नतीजा है कि करीब पांच साल पहले तक भ्रष्ट अधिकारी विकास कार्य कराने के लिए एडवांस के नाम पर 781 करोड़ से अधिक रकम डकार गए। यह रकम अब तो कहीं ज्यादा हो चुकी होगी। कुमारी सैलजा के अनुसार फिलहाल ऑडिट रिपोर्ट पर विधानसभा की समिति चर्चा कर रही है। सीएम सैनी इस रिपोर्ट को सार्वजनिक कर अपनी सरकार की थुक्का फजीहत तो कराएंगे नहीं। ऐसे में जनता को समझना होगा कि उसको सुनहरे सपने दिखा कर सत्ता में आई भाजपा की डबल इंजन सरकारें उसकी गाढ़ी कमाई को किस तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा रही हैं और भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देने के लिए उस पर प्रत्यक्ष-परोक्ष करों का बोझ लगातार बढ़ाती जा रही हैं। समय आ गया है कि जनता खुद सड़क पर उतर कर सरकार से अपने पैसों का-अधिकारों का हिसाब मांगे, अन्यथा इसी तरह लुटने पिटने को तैयार रहे।
लूट कमाई वाले विभागों का रिकॉर्ड ही नहीं दे रहे अधिकारी करीब 1400 करोड़ रुपये तो वो सरकारी धन है जो भ्रष्ट अधिकारी चट कर गए। निगमों में घोटाला तो इससे भी बड़ा हो सकता है। ये भ्रष्ट अधिकारी सबसे ज्यादा लूट कमाई वाले विभाग संपत्ति कर, भवन योजना, बकाया आदि का रिकॉर्ड ही ऑडिट के लिए सरकार को नहीं भेज रहे हैं। कुमारी सैलजा के अनुसार किसी भी नगर निगम या नगर पालिका परिषद ने बीते कई वर्षों में अर्जित किए गए संपत्ति कर, भवन योजना आवेदन, बकाया प्रमाण पत्र आदि के अभिलेख सरकार को भेजे ही नहीं है। भेजें भी कैसे, खट्टर के संघी दोस्त की याशी कंसल्टेंसी 95 फीसदी गलत प्रॉपर्टी आईडी बनाकर 57 करोड़ का भुगतान लेकर चलती बनी।
निगमों के भ्रष्ट अधिकारियों ने गलत प्रॉपर्टी आईडी की आड़ में जनता से खूब बढ़ा बढ़ा कर संपत्ति कर मांगा और इसे ठीक करने के नाम पर करोड़ों रुपये पीटे। भवन योजना का खेल तो सबके सामने है, अधिकारियों की मिलीभगत से बिना सब डिवीजन, सीएलयू और नक्शा पास कराए धड़ाधड़ इमारतें बन रही हैं। बिल्डिंग बाईलॉज का उल्लंघन कर चार-पांच मंजिला इमारतें धड़ल्ले से बनाई गईं। कार्रवाई करने के बजाय खट्टर इन्हें रेगुलराइज करने की पॉलिसी ले आए, जाहिर है कि खट्टर अपने भ्रष्टाचारी अफसरों को बचाने और सत्ता पक्ष के बिल्डरों को लाभ पहुंचाने के लिए ही यह पॉलिसी लेकर आए थे। समिति ने इन पिछले कई वर्षाे अभिलेख नहीं होने पर कड़ी आपत्ति तो जताई है लेकिन वह या सीएम सैनी कुछ ठोस कार्रवाई करेंगे, ऐसा प्रतीत नही होता।