मज़दूर मोर्चा ब्यूरो नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) ने आठवीं कक्षा की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार विषय क्या शामिल किया, भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत आपे से बाहर हो गए। उन्होंने एनसीईआरटी को लताड़ लगाते हुए माफी मांगने और चैप्टर हटाने के सख्त आदेश जारी किए। परेशानी इतनी कि एनसीईआरटी के माफीनामे को भी मानने से इनकार कर दिया और उसे माफीनामे से ज्यादा अपने पक्ष में सफाई देने वाला पत्र करार देकर अपने दिल के छाले फोड़े।
दरअसल, एनसीईआरटी द्वारा न्यायपालिका को नंगा करना सीजेआई सूर्यकांत को इसलिए पसंद नहीं आया क्योंकि उनको अपने कपड़े भी उतरते नजर आ रहे हैं। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने उनके खिलाफ आरोपों की पूरी सूची तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा को सौंपी थी। हुआ यह था कि 11 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश की थी। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के ही एक जज आदर्श गोयल ने सूर्यकांत पर भ्रष्ट आचरण में लिप्त होने, अनैतिक रूप से संपत्ति बटोरने के गंभीर आरोप लगाते हुए सीजेआई को विस्तृत चि_ी लिख कर उन्हें मुख्य न्यायाधीश बनाने का विरोध किया था। यह तथ्य भी बताया था कि मुख्य न्यायाधीश बनाने के लिए जस्टिस सूर्यकांत से सीनियर जस्टिस एके मित्तल को नजरअंदाज किया जा रहा है। जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ जांच पूरी होने तक उन्हें नियुक्ति दिए जाने से रोका था।
हालांकि सीजेआई दीपक मिश्रा भी सरकारी जस्टिस ही साबित हुए थे, ये वही दीपक मिश्रा हैं जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीश जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस रंजन गोगोई ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गंभीर आरोप लगाए थे। समझा जा सकता है कि सीजेआई दीपक मिश्रा क्यों सरकार के चहेते जस्टिस सूर्यकांत पर लगे गंभीर आरोपों पर चुप्पी साध गए थे। सूर्यकांत ने अपना कॅरियर 1984 में हरियाणा के हिसार की अदालत से शुरू किया था। 2010 में उन्हें पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में महाधिवक्ता बनाया दिया गया, चार साल इसी पद पर रहने के बाद इसी कोर्ट जज बना दिए गए। कारवां मैग्जीन ने जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ आरोपों की लंबी फेहरिस्त छापी है। इसके अनुसार अगस्त 2012 में चंडीगढ़ के कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट कारोबारी सतीश कुमार जैन ने जज सूर्यकांत पर बकाया भुगतान न करने और 7 करोड़ 73 लाख रुपये हड़पने का आरोप लगाते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसएच कपाडिय़ा को पत्र लिखा था। जैन ने शिकायती पत्र में अगस्त 2010 और मार्च 2011 के बीच सूर्यकांत के कहने पर खरीदी और बेची गई संपत्तियों की सेल डीड के दस्तावेज भी भेजे थे। सीजेआई की ओर से जवाब मिला था कि चार सप्ताह के भीतर सुबूत के दस्तावेज और हलफनामा दें अन्यथा सुनवाई नहीं होगी। जैन ने एक सप्ताह के भीतर ही शपथपत्र सहित शिकायती पत्र सुप्रीम कोर्ट को भेजी थी।
2017 में पंजाब में एक कैदी ने सूर्यकांत पर आठ मामलों में रिश्वत लेकर जमानत देने का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी। इस शिकायत पर कॉलेजियम ने छह साल तक सुनवाई नहीं की और वह पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने रहे। उनके खिलाफ शिकायतों का निवारण किए बिना अक्तूबर 2018 में उन्हें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। बाद में सरकार की इसी पिट्ठू कॉलेजियम ने सूर्यकांत को सीजेआई बनाने की सिफारिश की। समझा जा सकता है कि कॉलेजियम भी सरकार के इशारे पर ही इस तरह की सिफारिशें करता है। यानी संविधान ने न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका की तरह स्वतंत्र रखा था, लेकिन कार्यपालिका ने अपने चहेते भ्रष्ट और निकम्मे जजों को उपकृत कर न्यायपालिका को अपने अधीन कर लिया। सीजेआई सूर्यकांत पर भ्रष्टाचार के ही नहीं जातिवादी होने के भी आरोप लगे हैं कि वह अपने सजातीय वकीलों व मजिस्ट्रेटों को पदोन्नति के अधिक से अधिक अवसर प्रदान कराते हैं। संबंधित किताब में छात्रों को बताया गया है कि प्रत्येक जज एक आचार संहिता से बंधे होते हैं। उन्हें अदालत के अंदर और बाहर दोनों जगह बेहतरीन आचरण रखना होता है। यदि कोई जज खराब आचरण करता है तो उसके खिलाफ सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (सीपीजीआरएएमएस) में शिकायत की जा सकती है। किताब में यह भी बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच जजों के खिलाफ 1,600 से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुई थीं। किताब में भारत के पूर्व सीजेआई बीआर गवई के एक बयान का भी जिक्र है। उन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भी भ्रष्टाचार और गलत आचरण की घटनाएं सामने आई हैं। इससे जनता का भरोसा कमजोर होता है। ऐसे मामलों में पारदर्शी और सख्त कार्रवाई करना जरूरी है, ताकि लोगों का विश्वास दोबारा मजबूत हो सके। समझा जा सकता है कि जिस देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार और अनैनिक आचरण के इतने सारे आरोप हों तो वह छात्रों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार विषय कैसे पढऩे देता। उसे डर लगा होगा कि कोई जागरूक और उत्सुक छात्र विषय का गहराई से अध्ययन करेगा तो इंटरनेट पर उसे कारनामों के काले चि_े सामने आ जाएंगे। संभवत: यही डर था कि सीजेआई सूर्यकांत ने एनसीईआरटी की इस कवायद का कठोरता से विरोध किया।
जस्टिस सूर्यकांत ने पद का इस्तेमाल करते हुए एनसीईआरटी को पाठ्यक्रम से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार चैप्टर हटाने का आदेश तो दे दिया लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि एनसीईआरटी भी खुद कुछ नहीं कर सकती, ये चैप्टर भी उसने सरकार के इशारे पर ही शामिल किया था। ये बात अलग हो सकती है कि सरकार ने यह चैप्टर पिछली सरकारों द्वारा न्यायपालिका का किस तरह दुरुपयोग किया गया यह बताने के लिए पाठ्यक्रम में शामिल कराया होगा। जोड़तोड़ के जरिए सीजेआई पद तक पहुंचे सूर्यकांत को भाजपा की डबल इंजन सरकारों में न्यायपालिका का भयंकर दुरुपयोग और संविधान और उसके मौलिक अधिकारों को खास कर समता के सिद्धांत को ताक पर रख कर सुनाए गए फैसलों की भलीभांति जानकारी है। संभवत: उन्हें यह डर सता रहा होगा कि यदि ये चैप्टर शामिल कर लिया गया तो न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता बढ़ेगी और भविष्य में जनता के सामने इसकी कथित पवित्रता की गंदगी सामने आ जाएगी। मोदी भक्तों का मानना है कि न्यायपालिका को पूर्णतया: अपने पंजे के नीचे दबाने के लिए यह जरूरी है कि तमाम न्यायपालिका को इस कदर बदनाम कर दिया जाए कि जनता के बीच उनकी कोई साख ही न रह पाए। इसके चलते जब मोदी जजों पर कड़ा प्रहार करके उनके ठिकाने लगाने लगे तो जनता की कोई सहानुभूति जजों के प्रति न रह पाए। इसके लिए जरूरी है कि पूरी न्यायपालिका को इस कदर बदनाम कर दिया जाए कि हर बच्चा बच्चा न्यायपालिका में विश्वास करने की अपेक्षा मोदीजी की चरणवंदना करना बेहतर समझे।