फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) कोरोना को ताली-थाली बजवा कर भगाने वाले नरेंद्र मोदी भविष्य में देश के सबसे अनपढ़, अदूरदर्शी, बिना योजना के घोषणा करने वाले अयोग्य प्रधानमंत्रियों में शुमार किए जा सकते हैं। उनका 2025 में भारत को टीबी मुक्त कराने का दावा भी झूठ और जुमला ही साबित हुआ है। मर्ज बढ़ता गया ज्योंं ज्यों दवा की, की तर्ज पर केवल फरीदाबाद में बीते पांच वर्षों में टीबी मरीजों की संख्या आठ हजार से बढ़ कर साढ़े दस हजार तक पहुंच गई है। नाकामी छिपाने के लिए सरकार ने मल्टी ड्रग्स रेजिस्टेंस (एमडीआर) और एक्ट्रीम ड्रग रेजिस्टेंस (एक्सडीआर) मरीजों के आंकड़े ही गायब कर दिए हैं, क्योंकि इस प्रकार के मरीज इलाज मुहैया कराने में सरकार की नाकामी बयान करते हैं।
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना कोई तैयारी आधारभूत ढांचा बनाए, कार्यक्रम को लागू करने के लिए जरूरी मानव संसाधन, बजट आदि पर रिसर्च किए बिना कोई भी घोषणा कर देते हैं, और जो बजट होता है उसको अपने विज्ञापनों पर खर्च कर देते हैं यानी कि काम करने से ज्यादा जरूरी उसका ढोल पीटना है। नोटबंदी, जीएसटी, लॉकडाउन आदि में उन्होंने अपने इसी कौशल का प्रदर्शन किया था। इसी तर्ज पर उन्होंने भारत को 2025 तक टीबी मुक्त करने की भी घोषणा कर दी। घोषणा तो कर दी लेकिन मरीजों की पहचान कर उनका पूर्ण इलाज पक्का करने के लिए न तो जरूरत के हिसाब से मानव संसाधन बढ़ाए और सबसे ज्यादा जरूरी टीबी रोग के इलाज के लिए जरूरी डॉट्स यानी डायरेक्टली ऑब्जव्र्ड ट्रीटमेेंट शॉर्ट कोर्स की किट भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं करा सके। नतीजा यह हुआ कि देश भर में लाखों टीबी मरीजों का डॉट्स कोर्स पूरा नहीं हो पाया। सुधी पाठकों को बताते चलें कि डॉट्स कोर्स में यदि किसी मरीज की एक दिन की दवा मिस हो जाती है तो उसे पूरा कोर्स दोबारा करना पड़ता है, जो छह महीने का होता है।
यदि दवा कई दिन तक छूट जाती है तो मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस यानी एमडीआर श्रेणी में आ जाता है। ऐसे मरीजों का इलाज भी एक साल तक चलता है और दवांए भी ज्यादा दी जाती हैं। इसमें भी यही नियम लागू होता है कि दवा एक दिन भी छूटनी नहीं चाहिए। छूटी तो मरीज एक्सडीआर श्रेणी में आ जाता है जिसके बचने की संभावना तो लगभग शून्य होती है और वह अन्य लोगों में एक्सडीआर टीबी का संक्रमण भी फैला सकता है। केवल घोषणाओं से तो टीबी भागना नहीं था, दवाओं की कमी के कारण मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती ही चली गई। जिला क्षय रोग उन्मूलन कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष मात्र तीन महीनों में जिले में 2131 मरीज मिल चुके हैं। इसी तरह वर्ष 2024 में 9410 टीबी मरीज मिले थे ये संख्या 2025 में 12 फीसदी बढ़ कर 10649 तक पहुंच गई। ये तब हुआ जब पीएम मोदी का 2025 में टीबी मुक्त लक्ष्य पाने के लिए कागजों पर हर साल 100 दिन का निक्षय कैंपन चलाया जाता रहा और मरीज भी बढ़ते रहे।
स्वास्थ्य सेवाओं से पल्ला झाड़ रही सरकार टीबी मरीजों को भी निजी हाथों को सौंपने की चुपचाप तैयारी कर रही है। इसी के तहत गांव गांव जाकर टीबी मरीज ढूंढने के लिए दिसंबर 2024 में अम्मा अस्पताल के सहयोग से दो मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) वैन चलाई, इस वैन ने टीबी मरीज तो उतने नहीं ढूंढे जितने कि अम्मा अस्पताल चलाने के लिए दूसरे मरीज। टीबी तो खत्म नहीं हुई, लेकिन इसकी रोकथाम के नाटक के लिए बुधवार को खेड़ी कला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में ट्रूनेट मशीन का उद्घाटन किया गया। यह मशीन सैंपल लेकर दो घंटे में टीबी संक्रमण की जानकारी देती है। मशीन तो टीबी मरीजों की पहचान कर लेगी लेकिन जब दवा ही नहीं होगी तो मरीज ठीक कैसे होगा। हालांकि टीबी विभाग एमडीआर और एक्सडीआर मरीजों के आंकड़े छिपा रहा है लेकिन विभाग के सूत्र बताते हैं कि बीते तीन-चार वर्षों में इन मरीजों की संख्या बढ़ी है क्योंकि समय पर डॉट्स किट नहीं मिलने से उनके शरीर में मौजूद टीबी के बैक्टीरिया में इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई। टीबी विभाग में काम करने वाले कहते हैं कि सरकार सिर्फ घोषणाएं करती है, मरीजों को दवा समय पर पहुंचे इसके कोई इंतजाम नहीं किए जाते। सरकार का जो रवैया है उससे तो लगता है कि 2030 में भारत से टीबी समाप्त होना तो दूर, यह सबसे ज्यादा एमडीआर-एक्सडीआर मरीजों की संख्या वाला देश बन जाएगा।