बजट में भी बल्लबगढ़-पलवल-गुडग़ांव में नये रेल नेटवर्क के लिए 27 हजार करोड़ घोषित
फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जनहित में धरातल पर काम करने की अपेक्षा भाजपाई नेतृत्व झूठे आश्वासन व जुमलेबाजी के बल पर जनता को बांधे रखना चाहता है। इस कला में भाजपा सरकार को पूरी महारत हासिल है। अभी तक स्थानीय सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर व पूर्व सीएम खट्टर बल्लबगढ़-पलवल मेट्रो रेल का जो राग अलापते थे उसका असली राज मौजूदा बजट देखने के बाद समझ में आया कि इस जुमलेबाजी में खुद प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल हैं।
केन्द्रीय बजट में बताया गया है कि उक्त मैट्रो प्रोजेक्टों के लिए 28,740 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसमें यह नहीं बताया गया कि उक्त रकम इसी वर्ष जारी कर दी जाएगी या आगामी 10-20 वर्षों में की जाएगी। वैसे भी मोदी जी 2047 से पहले तो किसी तरह के विकास की बात तो करते ही नहीं। संदर्भवश, मुंबई से अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने के लिए मोदी जी ने 2015 में 60 हजार करोड़ का प्रावधान किया था। जो अब बढ़ते-बढ़ते तीन लाख 85 हजार करोड़ के पार हो चुका है। इसके अतिरिक्त करीब एक हजार करोड़ रुपये का कर्जा जापान से भी लिया गया था। इसके बावजूद वह बुलेट ट्रेन कहीं नजर तो आई नहीं। सुधी पाठक समझ सकते हैं कि इस प्रोजेक्ट के अलावा ऐसे सैंकड़ों प्रोजेक्ट बीते कई वर्षों से आधे अधूरे लटके पड़े हैं। मूर्ख अंधभक्तों की तो कहते नहीं, समझदार पाठक समझ सकते हैं कि कैसी मैट्रो रेल चलने वाली है?
पलवल-दिल्ली मार्ग पर लाखों दैनिक यात्री आवागमन करते हैं। इनके लिए सबसे सस्ता व सरल साधन रेल सेवा रहा है। दर्जनों शटल सेवा के अतिरिक्त मथुरा-कोसी से आने वाली पैसेंजर ट्रेनें भी इनकी यात्रा को सुगम बनाती रही हैं। डीएमआरसी (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन) के शुरू होने से पहले इस यात्रा का साधन केवल रेलवे तथा बस सेवा ही रहा है। कोरोना महामारी से पहले बल्लबगढ़ से दिल्ली तक रेल भाड़ा मात्र 10 रुपये था। मासिक पास तो मात्र 110 रुपये में ही बन जाता था। इसके विपरीत बल्लबगढ़ से मैट्रो का किराया तो कम से कम 54 रुपये लग जाता है, मंथली पास इसमें होता ही नहीं। जाहिर है कि किराए में इतना भारी अंतर होने के चलते केवल साधन-सम्पन्न अथवा मजबूरी में ही लोग साधारण रेल को छोड़कर मैट्रो में यात्रा करेंगे। कोरोना के नाम पर बंद की गई रेल सेवा को जब धीरे-धीरे चालू किया गया तो इसका भाड़ा तीन से चार गुना तक बढ़ाने के लिए शटल ट्रेनों पर ‘स्पेशल सेवा’ लिख दिया गया। भाड़ा तो बढ़ाया सो बढ़ाया ट्रेनों की संख्या भी घटा कर आधी कर दी गई। इसके परिणामस्वरूप जहां एक ओर इन ट्रेनों में असहनीय भीड़ बढ़ी वहीं दूसरी ओर मैट्रो रेल तथा सड़क परिवहन पर भी दबाव बढ़ गया।
विदित है कि दिल्ली से पलवल के बीच पहले केवल 3 रेलवे ट्रैक ही हुआ करते थे लेकिन 2020 के बाद से 4 ट्रैक चालू हो चुके हैं, उसके बावजूद भी भारत सरकार इस मार्ग पर पर्याप्त सेवा देने की बजाय बीते 10 वर्षों से मेट्रो रेल चलाने का झुनझुना दे रही है। मान लो यदि भाजपा सरकार का यह दिवास्वप्न साकार हो भी जाए तो क्या यात्रीगण पलवल से बल्लबगढ़ के बीच रेल सेवा को छोड़़ कर चार गुना अधिक भाड़ा खर्च करके मैट्रो रेल से यात्रा करना चाहेंगे? शायद चन्द साधन-सम्पन्न यात्री। डीएमआरसी इस तथ्य से भलीभांति परिचित है। इसे देखते हुए वह कभी भी इस घाटे के सौदे को करना नहीं चाहेगा। विदित है कि बल्लबगढ़ से बाटा मोड़ तक मेट्रो रेल में बहुत कम सवारियां रहती हैं। असली भीड़ अजरौंदा के बाद ही शुरू होती है। इसी तथ्य से डीएमआरसी भली-भांति समझ रहा है कि पलवल से बल्लबगढ़ के बीच सेवा देने के बदले उसे घाटे के सिवाय कुछ नहीं मिलने वाला।