प्रति वर्ष 6,000 टन दुर्लभ खनिज निकालने की घोषणा

प्रति वर्ष 6,000 टन दुर्लभ खनिज निकालने की घोषणा
February 06 13:27 2026

नई दिल्ली (मज़दूर मोर्चा) पूरी दुनियां को दुर्लभ खनिज की आपूर्ति करने का सबसे बड़ा स्रोत चीन बन गया है। ये खनिज इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि इनके बिना वे तमाम बड़े-बड़े उद्योग ठप्प हो सकते हैं जिनमें इलेक्ट्रॉनिक चिप आदि का इस्तेमाल होता है। मोबाइल फोन, टेलीविजन, तमाम तरह की कारें, हवाई जहाज, फौज के तमाम आधुनिक युद्धक उपकरण आदि अनेकों ऐसे उत्पाद हैं जो इनके बिना बनाए नहीं जा सकते। विदित 10 वर्षों में चीन ने इस क्षेत्र में गहरी खोज-बीन व कड़ी मेहनत करके अपने आप को इन खनिजों का सबसे बड़ा उत्पादक बना दिया है बल्कि अपना एकाधिकार सा ही स्थाप्ति कर लिया है।

भारत भी बड़े पैमाने पर चीन से इन खनिजों का आयात करता है जिस पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च की जाती है। इस खर्च को बचाने के लिए अब भारत सरकार ने भी अपनी एक योजना घोषित की है। इस पर प्रकाश डालते हुए केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक बयान में बताया कि 7, 280 करोड़ की इस योजना को मंजूरी मिल गई है। क्या मंजूरी मिलना ही बहुत बड़ा काम है? यह मंजूरी न तो पाकिस्तान, चीन अथवा अमेरिका से लेनी थी, इसे तो खुद भारत सरकार ने ही देना था। फिर इसे देने या लेने में दसियों वर्ष का समय कैसे और क्यों लगा?

मोदी सरकार के पास वाहियात की योजनाओं पर खर्च करने के लिए तो लाखों-करोड़ रहे हैं, उद्योगपतियों के कर्जे माफ करने के लिए लाखों-करोड़ सरकार के पास हैं। दुनियां भर में आवारागर्दी करने के लिए 8500 करोड़ का विमान तो खरीदा गया लेकिन दुर्लभ खनिज निकालने के लिए 7, 285 करोड़ रुपए का जुगाड़ इस सरकार के पास नहीं बना। जाहिर है कि इस तरह की योजनाएं सरकारी एजेंडे पर नहीं रही। अभी भी इस घोषणा में यह नहीं बताया गया है कि धरातल पर कब और कहां काम शुरू होगा, यह सरकारी क्षेत्र में होगा या अडाणी जैसे किसी पालतू उद्योगपति द्वारा कराया जाएगा?

समझने वाली बात तो यह है कि चीन ने अपनी दूरदर्शिता के आधार पर इन खनिजों के महत्व को दसियों वर्ष पहले ही पहचान लिया था। इसकी बदौलत उसने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को भी नकेल डाल दी। पिछले दिनों जब अमेरिका ने चीन को आंखे दिखानी चाही तो उसने इन खनिजों की आपूर्ति ऐसे नियंत्रित की कि यह अमेरिका तक न पहुंच सकें। भारत सहित जिन देशों को भी ये खनिज निर्यात किए जाते हैं उन पर इतना कड़ा नियंत्रण लगा दिया कि वे इनकी आपूर्ति किसी अन्य देश को न कर सकें। एक बार तो भारत में भी इनकी भारी कमी के चलते मोटर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उद्योग बंद होने की स्थिति मेें पहुंच गए थे। भारत सरकार ने गिड़गिड़ा कर बड़ी मुश्किल से अपनी सप्लाई बहाल करवाई।

एक ओर तो चीन की सरकार है जो अपने देश को उन्नति की ओर बढ़ाती है और दूसरी भारत में मस्जिदों के नीचे मंदिर ढूंढने व हिन्दू-मुस्लिम फसाद कराने तथा धर्मध्वजा में देश को लपेटने में लगी रहती हैं। उपर से तुर्रा यह कि वे विश्वगुरु बन गए हैं। केवल लफ्फाजी एवं धर्म की अफीम चटाने से कोई देश महान अथवा विश्वगुरु नहीं बन जाता। इसके लिए चीन की तरह देश के औद्योगिक उत्पादन बढ़ा कर अर्थिक मजबूती प्राप्त करना जरूरी होता है। इसी मजबूती के बल पर आज चीन न केवल सैन्य शक्ति में भारत से तीन गुना है बल्कि पूरे एशिया में उसका दबदबा बढ़ता जा रहा है। इसके विपरीत भारत के तमाम छोटे-बड़े पड़ोसी देश उसे आंखे दिखाने से नहीं घबराते।

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Mazdoor Morcha
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