अस्पताल आए मरीज तो सम्भलते नही, कम्पनियों में जाकर मरीज देखेंगे फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एनएच तीन स्थित ईएसआई कॉर्पोरेशन के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्रतिदिन 4500 वे मरीज इलाज के लिए ओपीडी में आते हैं जिनके वेतन से कॉर्पोरेशन नियमित वसूली करता है। जुलाई माह तक लगभग संतोषजनक सेवाएं देने वाले इस अस्पताल का सत्यानाश करने के बाद अब कॉर्पोरेशन ‘अस्पताल ऑन व्हील्स’ यानी पहियों पर चलकर अस्पताल पहुंचेगा मरीजों के पास, सेवा शुरू करने का दावा करता है।
न केवल फरीदाबाद बल्कि मानेसर, गुडग़ांव, गाजियाबाद, दिल्ली, नोएडा से चलकर आने वाले मरीजों को देखने के लिए अब यहां न तो पर्याप्त डॉक्टर रहे हैं और न ही काउंटर से पर्याप्त दवाएं मिल पा रही हैं। अस्पताल का बजट घटाने के नाम पर वरिष्ठ एवं महंगे डॉक्टरों को भगाने तथा दवाओं में कटौती करने के साथ-साथ मरीजों के भोजन तक में भी कटौती करते हुए कॉर्पोरेशन को कतई कोई शर्म नहीं आई। रेडियोलॉजी में न तो पर्याप्त अल्ट्रासाउंड व एक्सरे मशीनें हैं और न ही एमआरआई व सीटी स्कैन के लिए कंट्रास्ट उपलब्ध है। विदित है कि कंट्रास्ट, डॉक्टर को ऐसी व्यवस्था उपलब्ध कराता है जिसके द्वारा डॉक्टर मरीज की भीतरी स्थिति को सही ढंग से देख व समझ सकता है। इस छोटी सी आवश्यक औषधि के उपलब्ध न होने से मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मरीजों की ओर से जब भी इन मामलों को लेकर मांग उठाई जाती है तो डीन की ओर से सदैव एक ही रटा रटाया जवाब मिलता है कि डॉक्टर व अन्य स्टाफ की पोस्टें स्वीकृत हो गई हैं, भर्ती के लिए विज्ञापन जारी कर दिए गए हैं, लोकल परचेज की दवाओं को आरसी में डाला जा रहा है, शीघ्र ही ये सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। डीन के ये जवाब सुनते-सुनते चार महीने हो चुके हैं। वैसे मज़दूरों की ओर से डीन को ये बता दिया गया है कि डॉक्टरों व अन्य स्टाफ की पोस्टें बीते तीन-चार साल से स्वीकृत होने का नाटक चला आ रहा है।
कॉर्पोरेशन की इस नाटकबाजी के चलते इस अस्पताल में मरने वालों की दर अपेक्षाकृत बढ़ गई है। यद्यपि कॉर्पोरेशन मृत्यु के आंकड़े छिपा कर रखता है, फिर भी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस मामले में अगस्त 2024 में जहां यह संख्या 117 थी वहीं अगस्त 2025 में यह संख्या बढ़कर 122, इसी प्रकार सितम्बर 2024 में 115 से बढ़कर सितम्बर 2025 में 128, अक्टूबर 2024 में 100 से बढ़कर 2025 अक्टूबर में 137 और नवम्बर 2024 में 97 से बढ़कर नवम्बर 2025 में 145 हो गई। इसका एक मात्र कारण कॉर्पोरेशन का लक्ष्य मरीजों की जान बचाना न होकर खर्च घटाना रह गया है। जाहिर है कि महंगे एवं वरिष्ठ डॉक्टरों की जगह नौसिखिए डॉक्टरों तथा सस्ती दवाओं से काम चलाया जाता है। इलाज की सुविधा न होने के बावजूद मरीज को रेफर भी नहीं किया जाता।
अपनी इस मज़दूर विरोधी नीति से ध्यान भटकाने एवं प्रोपेगेंडा के लिए कॉर्पोरेशन ने, दान में प्राप्त दो बसों को कम्पनियों में घुमाने की योजना बनाई है। एक को चलता-फिरता अस्पताल तो दूसरी को चलती-फिरती लेबोरेट्री बताया गया है। लेकिन यह नहीं बताया गया कि मरीज दवा कहां से लेंगे? अगर कॉर्पोरेशन इतना ही मेहरबान हो गया है कि वह मरीजों को उनकी कम्पनियों में जाकर देखेगा तो दवाई भी तो वहीं वितरित करनी चाहिए। वास्तव में यह एक नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो अस्पताल अपने यहां आए मरीजों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं करा सकता, वह दर-दर जाकर क्या खाक उपलब्ध कराएगा? विदित है कि कॉर्पोरेशन द्वारा दो साल पूर्व, 60 वर्ष से ऊपर वाले मरीजों को घर पर दवा देने व सैम्पल लेने का जो कार्यक्रम चलाया था वह भी अब बंद कर दिया गया है।
दिल्ली के बीमाकृतों पर हो रहे खर्च में घोटाला जहां दिल्ली के बीमाकृत (आईपी) पर कॉर्पोरेशन औसतन साढ़े दस हजार वार्षिक खर्च कर रहा है वहीं हरियाणा के आईपी पर महज 3,239 रुपये वार्षिक खर्च किया जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में कुल बीमाकृत मज़दूरों की संख्या 14 लाख 52 हजार 530 है, जिन पर कॉर्पोरेशन कुल 1572 करोड़ वार्षिक खर्च करता है। मजे की बात तो यह है कि यहां सारा खर्च अकेले कॉर्पोरेशन ही करता है।
हरियाणा के कुल 27,24,020 आईपी के लिए हरियाणा सरकार 500 करोड़ का बजट बनाती है जिसका केवल आठवां भाग राज्य सरकार व सात भाग कॉर्पोरेशन अदा करता है। इसके अलावा फरीदाबाद का मेडिकल कॉलेज अस्पताल व गुडग़ांव के दो छोटे-छोटे अस्पताल पूर्णतया कॉर्पोरेशन द्वारा चलाए जाते हैं, इनके लिए राज्य सरकार का कोई येागदान नहीं होता। यहां गम्भीरता से सोचने वाली बात यह है कि दिल्ली के मरीजों को बड़ी संख्या में फरीदाबाद धकेल दिए जाने के बावजूद वहां के आईपी पर साढ़े दस हजार का खर्च कैसे आ रहा है? बसई दारापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में नाममात्र की ओपीडी तथा 600 में से 300 बेड ही भरे रहते हैं। नोएडा तथा गाजियाबाद तक के मरीज दवाई लेने के अलावा एमआरआई, सीटी स्कैन आदि के लिए फरीदाबाद भेजे जाते हैं। इस सबके बावजूद भी वहां प्रति आईपी साढ़े दस हजार खर्च होना किसी बड़े घोटाले की ओर संकेत करता है। हो सकता है कि आईपी के नाम पर दिखाया जाने वाला यह खर्च मुख्यालय तथा मंत्रालय के बाबूओं पर हो रहा हो। यह एक जांच का विषय है।
हरियाणा सरकार ईएसआई का बजट तो पास कर देती है लेकिन उसे रिलीज नहीं करती। इसके चलते इस वर्ष अभी तक न तो पर्याप्त दवाईयां खरीदी गई हैं और न ही बीमित मरीजों द्वारा खरीदी गई दवाओं के बिल पास हो सके हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है लगभग हर साल ऐसा ही होता है। कारण यह बताया जाता है कि पहले हरियाणा सरकार को खर्च करना पड़ता है और बाद में कॉर्पोरेशन अपना हिस्सा अदा करता है। यह लेन-देन साल में दो बार होता है। हरियाणा सरकार के पास तमाम तरह की फिजूल खर्चियां करने के लिए तो धन की कोई कमी नहीं रहती लेकिन अपने नागरिकों पर एडवांस पैसा खर्च करने में सरकार को मौत पड़ती है। कॉर्पोरेशन की तो इसमें बल्ले-बल्ले रहती है क्योंकि न तो हरियाणा सरकार पूरा खर्च करती है और न ही कॉर्पोरेशन को अपना हिस्सा अदा करना पड़ता है।