डॉ. सोना चौधरी (बबीता) परवरिश किसी को नीचा दिखाकर ऊँचे नहीं उठाती। सच्ची परवरिश प्रेम, विश्वास और चेतना के विस्तार से खिलती है। जबकि केवल पालन अक्सर साझा तो बढ़ा देता है, पर चेतना को सीमित कर देता है। बच्चा भले ही छोटा हो, पर विकसित चेतना वाला बालक छोटे शरीर में भी पूर्णता का स्वामी होता है। आज का युवा सचमुच अद्भुत है। वह हमारी कल्पना से कहीं अधिक संवेदनशील, जागरूक और प्रतिभाशाली है। आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विचलन अब बाहर नहीं, हाथ में है—एक फोन, एक नोटिफिकेशन, एक संदेश और मन दिशा बदल देता है। फिर भी, यही युवा अपने भीतर शांति, संतुलन और उद्देश्य बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। यह कार्य आसान नहीं है—क्योंकि उनके सामने केवल पढ़ाई का ही दबाव नहीं है, बल्कि साथियों की प्रतिस्पर्धा, माता-पिता की अपेक्षाएँ, सामाजिक तुलना और स्वयं को साबित करने की निरंतर बेचैनी भी है।
इसके बावजूद बच्चों का आगे बढऩा, सीखना, खुद को नया बनाना—यह बताता है कि आज की पीढ़ी कितनी मजबूत है। जब हम अपनी पीढ़ी को देखते हैं तो स्पष्ट होता है कि आज के बच्चे कहीं अधिक समझदार हैं। हम पैसे का प्रबंधन कहाँ समझते थे? हम परिवार की बात ज़रूर सुनते थे—पर क्या हम उतने संवेदनशील थे जितने आज के बच्चे हैं? विशेषकर घर की महिलाओं की भावनाएँ, उनकी थकान, उनकी भूमिका—इन सबको समझने में आज का बच्चा कहीं आगे है। आज का युवा भावनाओं को समझने में परिपक्व, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजग, और गलतियों से सीखने में निपुण है।
यह परिवर्तन केवल पालन से नहीं, बल्कि सच्ची, प्रेमपूर्ण और चेतना-वर्धक परवरिश से संभव हुआ है। परवरिश का उद्देश्य बच्चे को मोडऩा नहीं, बढ़ाना है—उसकी आत्मा, सोच और संभावनाओं को। जब हम बच्चे को सुनते हैं, झिड़कते नहीं… जब हम मार्गदर्शन देते हैं, दबाव नहीं… जब हम प्रेम देते हैं, तुलना नहीं…
तभी चेतना विकसित होती है। आज का युवा इसलिए विशेष है क्योंकि— वह टूटा नहीं चलता, सीखकर उठता है। वह दबाव में नहीं डूबता, दिशा खोजता है। वह केवल भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की उम्मीद है। हमारी भूमिका बस इतनी है— उनके भीतर की चेतना को सीमित न करें, बल्कि उसके विस्तार का सहारा बनें। क्योंकि यही चेतना भविष्य का चरित्र और दुनिया का निर्माण करती है। भारतीय फ़ुटबॉल कप्तान, लेखिका एवं शैक्षिक प्रशिक्षक