फरीदाबाद, (मजदूर मोर्चा ) खबर लिखे जाने तक जिस बात की आशंकाएं थीं उससे कहीं बढ़ कर परिणाम सामने आया है। संभावना केवल तबादले तक की ही नजर आती थी लेकिन अब सुनने में आ रहा है कि अलवर के डीन डॉ. असीम दास को निलंबित करके हाजिरी के लिए गुलबर्गा तथा डॉ. पांडेय को निलंबन उपरांत हाजिरी के लिए गोहाटी भेजने की बात हो रही है। यद्यपि इस बाबत कोई अधिकृत बयान कहीं से भी सामने नहीं आ रहा लेकिन मुख्यालय से छन छन कर आ रही खबरों से ऐसा ज्ञात हुआ है।
मध्य रात्रि के बारह बजे डॉ. असीम दास को प्राप्त हुए ई मेल में कहा गया है कि उनके स्थान पर बसई दारापुर के डॉ. ओपी लखवानी को डीन नियुक्त कर दिया गया है। उसी मेल में फरीदाबाद के लिए भी केके नगर ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. कालीदास दत्ताराया को डीन नियुक्त करने की बात कही गई है। इसी मेल में फरीदाबाद के हड्डी विशेषज्ञ एसोसिएसट प्रोफेसर डॉ. ब्रजेश, कॉर्डियोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अरविंद को बसई दारापुर तथा फोरेंसिक के डॉक्टर महेश को नोएडा भेजने की बात कही गई है। खबर लिखे जाने तक इन सबको व्यक्तिगत आदेश प्राप्त नहीं हुए। मुख्यालय की यह कार्रवाई स्पष्ट संदेश है कि उन्हें फरीदाबाद के मेडिकल कॉलेज अस्पताल द्वारा प्राप्त की गई उच्च उपलब्धियों की आवश्यकता नहीं है, उन्हें केवल बसई दारापुर स्टाइल मेें अस्पतालों को चलाना ज्यादा पसंद है इसके सबूत के तौर पर मजदूर मोर्चा पहले भी कई बार लिख चुका है, जिन चिकित्सा अधीक्षकों ने बसई दारापुर के अस्पताल को बर्बाद किया उन्हें बारी बारी से पदोन्नत करके मेडिकल कमिश्नर के पद से नवाजा गया और अब बढिय़ा काम करने वाले डॉक्टरों दास व पांडेय का हश्र सामने हैँ। इस सारे षणयंत्र में मेडिकल कमिश्नरों के अलावा वे दफ्तरी बाबू भी शामिल हैं जिन्हें ज्वाइंट डायरेक्टर या इंश्योरेंस कमिश्नर आदि कहा जाता है। दरअसल, ये दफ्तरी बाबू प्रशासनिक अधिकारी होने के नाम पर डीन को अपने इशारों पर नचा कर अपनी मु_ियां गर्म करने की फिराक में रहते रहे हैं। इससे संबंधित पूरी जानकारियां उपलब्ध होने पर पाठकों को अवगत कराया जाएगा।
मरीजों की जो ऐसी तैसी होनी है वह तो होगी ही, लेकिन कॉर्पोरेशन को यहां की बढ़ती भीड़ से जरूर निजात मिल जाएगी। जाहिर है जब वांछित इलाज ही मरीज को नहीं मिलेगा तो वे काहे को यहां भीड़ लगाएंगे। इसके साथ-साथ कार्पोरेशन के खर्चो में भी बड़ी भारी बचत हो जाएगी। यहां भी बसई दारापुर की तर्ज पर आधे बेड खाली ही रहा करेंगे। इस बाबत मज़दूर संगठन क्या कर पाएंगे यह तो समय ही बताएगा।