फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) तिगांव निवासी राजेश नागर 12 वीं जमात में फेल होने के बाद इधर-उधर काफी समय तक भटकने के उपरांत घर-घर अखबार बांंटने में लग गया था। शहर के विस्तार के साथ-साथ अखबार कम्पनियों ने अपने वितरण सेंटर बढ़ाए तो एक सेंटर भतोला गांव में भी बन गया। वहां से पंजाब केसरी का वितरण काम राजेश को मिल गया। राजेश के वितरण काम से खुश होकर कम्पनी ने राजेश को पत्रकार का दर्जा दे दिया। यह बात अलग है कि वितरण करने वाले इस 12 वीं फेल शख्स को बेशक पत्रकारिता का ककहरा भी न आता हो लेकिन फिर भी पत्रकार का दर्जा तो मिल ही गया, फर्जी ही सही।
पत्रकार का दर्जा पाने के बाद इस व्यक्ति ने कुछ लिखना-पढऩा सीखने के बजाय कृष्णपाल गूजर व अपने इलाके के एवं अपने ही नाम राशि राजेश नागर जैसे नेताओं की चापलूसी व दल्लागिरी करनी शुरू कर दी। इनके सानिध्य में इसने थाने तहसील व अन्य सरकारी दफ्तरों में भी अपनी अच्छी-खासी पैठ जमा ली और अच्छी-खासी दलाली शु़रू कर दी। शायद इतना भी इसने पर्याप्त नहीं समझा और अपने नेताओं से सम्बन्धित प्रचार की भी ठेकेदारी ओढऩे लगा।
‘मज़दूर मोर्चा’ में जब भी कोई समाचार कृष्णपाल अथवा राजेश नागर से सम्बन्धित छपता तो उनका यह वफादार ‘मज़दूर मोर्चा’ के वितरण को हर तरह से रोकने का प्रयास करता रहा। लेकिन इसके बावजूद भी सुधी पाठकों ने अपने बूते पर क्षेत्र के हॉकरों के माध्यम से ‘मज़दूर मोर्चा’ लेना जारी रखा।
पंजाब केसरी द्वारा अपने व्यावसायिक हितों को देखते हुए इसे पत्रकार का दर्जा देना तो किसी हद तक समझ आता है। लेकिन हरियाणा सरकार द्वारा ऐसे आदमी को राजेश नागर जैसे मंत्री का मीडिया सलाहकार बनाना समझ से बाहर है। समझा जा सकता है कि मंत्री राजेश नागर ने इसकी वफादारियों की कीमत चुकाते हुए तथा इसे अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप पाते हुए यह दर्जा दिलाया है। इस पद पर सरकार की ओर से अच्छा-खासा, शायद 45000 रुपये मासिक वेतन भी मिलता है। इसकी नियुक्ति को देख कर एक प्रसिद्ध गाने के बोल याद आते हैं-राम चन्द्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा जब हंस चुगेगा दाना दुनका कौव्वा मोती खाएगा। सो पाठकों वही युग आज प्रत्यक्ष दिख रहा है। इतना ही नहीं शहर के अनेक हंसों ने भी इस कौवे की सरपंची को स्वीकार करते हुए इसे वरिष्ठतम पत्रकार मान लिया है। इसकी अध्यक्षता में कोई पत्रकार संगठन भी खड़ा कर लिया गया बताते हैं।