फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) वैसे तो नगर निगम चुनाव हमेशा से ही सत्ता पक्ष के ही माने जाते हैं लेकिन इस चुनाव में भाजपा को भितरघातियों से जूझना पड़ेगा। भाजपा ने बीस निवर्तमान पार्षदों के टिकट काट कर उनकी जगह नए चेहरों को मौका दिया है। इनमें से अधिकतर जन प्रतिनिधि पार्टी के इस विश्वासघात का जवाब विश्वासघात से ही देने की तैयारी में हैं।
इधर लगभग ग्यारह साल से सत्ता से दूर रही कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव आसान नजर नहीं आ रहे, वह तो पूरे 46 वार्डों में अपने प्रत्याशी भी नहीं उतार सकी। वार्ड 36 में तो कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में नामांकन ही वापस ले लिया। बसपा ने अपने ऊपर भाजपा की बी टीम होने के आरोप को चरितार्थ करते हुए उन्हीं छह वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं जहां भाजपा कमजोर नजर आ रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार से हतोत्साहित आम आदमी पार्टी ने प्रत्याशी तो उतारे हैं लेकिन उनमें जोश की कमी नजर आ रही है।
जनता के रोष से डरी भाजपा बीते तीन साल से स्थानीय निकाय चुनाव कराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। तगड़ी सत्ता विरोधी लहर होने के बावजूद अप्रत्याशित रूप से तीसरी बार भी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल होने से उत्साहित भाजपा सरकार ने लोहा गर्म देख कर स्थानीय निकाय चुनाव की घोषणा कर दी। सत्ता का चुनाव होने के कारण जीत पक्की समझ टिकट के सबसे ज्यादा दावेदार भाजपा के खेमे में ही नजर आए। सबको लगा कि अदलखा जैसा भ्रष्टाचारी, दलाल, भूमाफिया भी भाजपा के टिकट पर विधायक चुना जा सकता है तो टिकट मिलने पर वह भी पार्षद बन जाएगा। इसीलिए एक एक वार्ड में चार-चार-पांच-पांच दावेदार थे।
पार्टी के निवर्तमान पार्षद भी अपना टिकट पक्का समझ रहे थे और जनता के बीच प्रचार प्रसार में भी जुट गए थे। लेकिन भाजपा को जनहित के मुद्दे उठाने वालों की जरूरत नहीं है, उनकी जगह उसे तो पार्टी आला कमान की जी हुजूरी करने वाले यस मैन चाहिए थे, इसीलिए जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले बीस निवर्तमान पार्षदों के टिकट काट कर नए चेहरे उतार दिए। निवर्तमान पार्षदों में भी केवल उन्हें ही टिकट दिए गए जो निवर्तमान मेयर सुमनबाला की तरह गूजर-अदलखा की यस डॉल थीं या जिन्होंने लोकसभा चुनाव में कृष्णपाल गूजर के लिए जी तोड़ मेहनत की थी।
इन हालात में हालांकि भाजपा को चुनाव आसान नजर आ रहा है लेकिन बीस वार्डों में तो टिकट कटने से नाराज पार्षद खेल बिगाड़ेंगे बाकी वार्डों में भी वह लोग पार्टी के साथ दगा कर सकते हैं जो लंबे अर्से से पार्षद चुनाव की तैयारी कर रहे थे लेकिन उन्हें टिकट ही नहीं दिया गया। वार्ड नंबर 16 से संजय महेंद्रू तो निर्दलीय मैदान में उतर कर भाजपा प्रत्याशी मनोज नासवा के लिए वोट कटवा साबित होने वाले हैं। वार्ड 24 में भाजपा ने वफादार कार्यकर्ता अवनेश कुमार और बिल्लू पहलवान की जगह अजय प्रताप भड़ाना को टिकट दे दिया। अवनेश तो निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं बिल्लू पहलवान भी विश्वासघात से दुखी हैं, चुनाव में इन दोनों का गुस्सा भाजपा प्रत्याशी को भारी पडऩे वाला है। हालांकि चर्चा है कि जिन भाजपाइयों को कृष्णपाल गूजर ने टिकट नहीं दिलवाया है उन्हें हरवाने और अपने चिन्टू को जिताने के लिए गूजर बिसात बिछा रहे हैं, बिल्लू पहलवान भी गूजर का एक चिन्टू बताया जा रहा है। निवर्तमान भाजपा पार्षद और भाजपा महिला मोर्चा की उपाध्यक्ष सोमलता भड़ाना का टिकट काट दिया गया, वह वार्ड 26 से भाजपा प्रत्याशी लाल कुमार मिश्रा को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनौती दे रही हैं।
वार्ड 28 से भाजपा के मनोनीत पार्षद विजेंद्र शर्मा लंबे अर्से से जनता के बीच काम कर रहे थे लेकिन दो नावों पर पैर रखने यानी कृष्णपाल गूजर और राजेश नागर दोनों का खास बनने में किसी ने उन्हें अपना नहीं माना और उनका पत्ता साफ कर दिया गया। उनकी जगह अमित को टिकट दे दिया गया। बेचारा विजेंद्र शर्मा निर्दलीय चुनाव लडऩे की हुंकार भरता रहा लेकिन दोनों नावों ने उसे जमीन दिखाने की घुड़की दी तो चुपचाप बैठ गया। निवर्तमान पार्षद ओम प्रकाश रक्षवाल का टिकट भले ही कट गया लेकिन उनके सैकड़ों समर्थक भाजपा प्रत्याशी को तगड़ा झटका देने की तैयारी में साफ नजर आ रहे हैं। कमोबेश ऐसे ही हालात भाजपा प्रत्याशियों के लिए लगभग हर वार्ड में हैं। ईवीएम तथा चुनाव की नजरे इनायत है तो बागियों से क्या घबराना।
भाजपा सरकार के कैबिनेट मंत्री राव नरबीर सिंह बोले अगर जनता क्रिमिनल को मेयर बनाएगी तो फिरौती का काम चल पड़ेगा लेकिन उनकी ही पार्टी ने खनन माफिया, आपराधिक क्रियाकलाप में लिप्त वार्ड बीस से संदीप चपराना और वार्ड 21 से बिंदे भड़ाना जैसे अनेक असामाजिक तत्व कहे जाने वालों को टिकट दिया है, दरअसल, भाजपा साबित करना चाहती है कि उसकी वाशिंग मशीन में सारे भ्रष्टाचारी, अपराधी बेदाग हो जाते हैं। वार्ड नंबर 21 से ही खांटी भाजपाई भूमाफिया, दलाल मनोज भड़ाना ने तो टिकट नहीं मिलने पर बगावत का सुर बजाते हुए निर्दलीय पर्चा भरा और बिंदे भड़ाना को करारी हार देने के बड़े बोल बोले। मंत्री कृष्णपाल गूजर ने घुड़की दी तो सारा तेवर समुद्र के झाग की तरह बैठ गया, नामांकन वापस लेने का समय निकल चुका तो वह तो नहीं कर सके लेकिन अब सबसे कहता घूम रहा है कि अगर मुझे वोट देना था तो अब बिंदे भड़ाना को देना।
इधर, तीन टर्म से सत्ता से दूर कांग्रेस के लिए अपने आप को साबित करने के लिए यह नगर निगम चुनाव बहुत अहम है। इसके मद्देनजर पार्टी को चुनाव में पूरे दमखम से उतरना चाहिए था लेकिन वह 46 प्रत्याशी ही नहीं जोड़ सकी। केवल 39 प्रत्याशी ही मैदान में उतारे लेकिन वार्ड 37 में तो कांग्रेस प्रत्याशी राहुल चौधरी ने भाजपा प्रत्याशी कुलदीप साहनी के पक्ष में नामांकन ही वापस ले लिया। हालांकि कांग्रेस प्रत्याशियों को भितरघात का भय नहीं है लेकिन उन्हें अपनों की कमी का सामना करना पड़ेगा। कार्यकर्ताओं की टीम न होने के कारण कांग्रेस प्रत्याशी को अकेले ही जनता का समर्थन प्राप्त करने की मशक्कत करनी पड़ रही है, दस साल से सत्ता से दूर रहने के कारण उनके पास पार्टी की उपलब्धि बताने को भी कुछ नहीं है, ले देकर भाजपा के भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों को उजागर कर जनता को अपने पक्ष में खड़ा करने की रणनीति पर ही काम करना पड़ रहा है। हालांकि चुनाव भाजपा और कांग्रेेस के बीच माने जा रहे हैं लेकिन बसपा और आप भी मैदान में हैं। क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के सत्यवीर सिंह का कहना है कि मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी, भाजपा-संघ की सेवा, उसे चुनावों में जिताने की व्यवस्था सिर्फ लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ही नहीं करती है। जहां कहीं भी, जिस स्तर के चुनावों में उनके आक़ा संघी मुसीबत में होते हैं, बीएसपी अपनी सेवाएं तत्काल उपलब्ध कराती है।
वार्ड 3 आज़ाद नगर सहित क्षेत्र की तमाम झग्गियों में संघियों के चक्कर लगने तेज़ तो उसी दिन से हो गए थे जिस दिन से कॉमरेड नरेश को पार्षद चुनाव में उतारने का फैसला किया गया था। भाजपा प्रत्याशी, रवि भगत के दिल में आज़ाद नगर क्षेत्र के तमाम मज़दूरों के प्रति अचानक प्यार का गुबार उठ खड़ा हुआ। ऐसा सघन प्यार 10 फऱवरी से पहले कभी नहीं देखा गया। संघ-भाजपा ने रवि भगत की दावेदारी कमजोर पड़ती देख गोद में बैठी बहुजन समाज पार्टी से नवाब अली उफऱ् ‘पप्पूÓ को वार्ड नं. 3 से प्रत्याशी घोषित करा दिया। बस्ती में दलित और मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं।
संघ की सेवा और डॉ. आंबेडकर के नारे के बीच बीते रविवार को आज़ाद नगर का सामुदायिक केंद्र नीले रंग के झंडों से पटा था। ‘भाजपा-संघ-बीएसपी गठजोड़Ó शायद यह नहीं जानता कि ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चाÓ के सदस्य और समर्थक, इन झांसों की हक़ीक़त अच्छी तरह जानते हैं। भाजपा संघ को मज़दूरों की झुग्गी बस्तियों से कितनी मुहब्बत है, गऱीबों के लिए उनके दिल में कितना सघन प्यार है, यह असलियत भी मज़दूर बहुत अच्छी तरह जानते हैं।
इसी तरह वार्ड एक में बसपा ने केशव वर्मा को उतारा है क्योंकि यहां भाजपा के मुकेश डागर कांग्रेस के मुकेश डागर पुत्र हेतराम के आगे कमजोर नजर आ रहे हैं। वार्ड 14 में भाजपा के नरेश नंबरदार और कांग्रेस के गुलाब सिंह के सीधे मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिए बसपा ने उसी दीनदयाल गौतम को पट्टा पहना दिया जो अब से पहले तक ख्रुद कांग्रेस का टिकट पाने के लिए एडिय़ां रगड़ रहा था, जानकारों की मानें तो बीते विधानसभा चुनावों के दौरान यह महाशय कभी लखन सिंगला का प्रचार करते नजर आते तो अगले ही दिन विपुल के खेमे में प्रकट हो जाते थे। इसी तरह वार्ड 21 में भाजपाई बिंदे भड़ाना को टक्कर दे रहे कांग्रेस के कैलाश बैंसला के लिए वोट कटवा के रूप में बसपा ने रतनपाल को मैदान में उतारा है। जहां तक सवाल भाजपाई और कांग्रेसी प्रत्याशियों का है, दोनों में से एक सांपनाथ तो दूसरा नागनाथ है। दोनों समय एवं आवश्यकतानुसार कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस में रह चुके हैं। आम आदमी पार्टी को भी सभी वार्डों में प्रत्याशी नहीं मिल सके हैं, लेकिन जहां जहां भी उसने प्रत्याशी खड़े किए हैं वह भाजपा और कांग्रेस के लिए चुनौती साबित होने वाले हैं।
यह सच है कि सत्ता हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद में माहिर भाजपाई भले ही विपक्षी पार्टियों को कम करके आंक रहे हैं और जीत के दावे कर रहे हैं लेकिन यह चुनाव विपक्षी पार्टियों से ज्यादा जनता के अपने अधिकार हासिल करने का है। जनता अपने हित और विकास को चुनेगी या फिर गंदगी, जलभराव, लूट-कमाई, प्रॉपर्टी आईडी जैसे दुस्वप्न को गले लगाएगी, यह तो समय बताएगा। चुनाव उपरांत दस दिन तक मतगणना न करना का अर्थ भी किसी से छिपा नहीं है।