मज़दूर मोर्चा ब्यूरो गौ-रक्षा की राजनीति खेलने में माहिर हरियाणा के भाजपाई मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने घोषणा की है कि जिस गौ-सेवा आयोग के लिए वर्ष 2014-15 में दो करोड़ रुपए रखे गए थे, उसे अब बढ़ाते-बढ़ाते 510 करोड़ ले आए हैं। सैनी ने यह भी बताया कि इसमें से गायों के चारे के लिए 216.25 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। गौ-चारण की भूमि से अर्जित आय गौ-शालाओं पर खर्च की जाएगी। वैसे यह आय पहले भी इसी काम पर खर्च दिखाई जाती रही है।
गौ-शालाओं में कैद गौ-वंश को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए पशु-चिकित्सक भी नियुक्त किए जाएंगे, जबकि ग्रामीण पशु पालकों के लिए इनका नितांत अभाव रहता है। इस काम के लिए कुछ मोबाइल पशु चिकित्सालय भी बनाए जाएंगे जो गौ-शालाओं में जाकर गायों की चिकित्सा आदि करेंगे।
विदित है कि 2014 में आई भाजपा की खट्टर सरकार ने अपने इस पाखंड का प्रोपेगंडा करते हुए बाकायदा गौ-सेवा आयोग का गठन किया था। इसके चेयरमैन पद पर पलवल के किसी भानीराम को नियुक्त किया गया था। समझा जा सकता है कि किसी गाय को चारा-पानी मिले या न मिले परन्तु चेयरमैन को चंडीगढ़ में आलीशान कोठी, कार्यालय, कार व गन मैन आदि का पूरा लाव-लश्कर मिलता है। अपने इस पद के सहारे इस तरह के चेयरमैन सत्ता की जो दलाली करते हैं वो अलग से।
करीब एक वर्ष पूर्व फरीदाबाद नगर निगम के आयुक्त जितेन्द्र दहिया ने बताया था कि शहर भर में पांच हजार से अधिक लावारिस गायें सड़कों पर घूमती रहती हैं। उन्होंने दावा किया था कि आगामी दो साल में करीब ढाई हजार गायों को नव-निर्मित गौ-शालाओं में बंद कर दिया जाएगा। इस तरह की सरकारी आंकड़ेबाज़ी को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है। कोई कैसे गिन सकता है कि पांच हजार गायों में से कौन सी ढाई हजार गाय गौशाला में भेज दी गई हैं? इस तरह के दावे केवल जनता को भ्रमित करने के लिए ही पेश किए जाते हैं। फरीदाबाद में आज भी ऐसे सैंकड़ों कूड़े के ढेर मौजूद हैं जहां दर्जनों भूखी गाय कूड़ा-कचड़ा खाकर गुजारा कर रही हैं। इनके अतिरिक्त सड़कों पर दुर्घटनाओं का कारण बनने वाली गायों का तो कोई हिसाब ही नहीं। इन लावारिस गायों से परेशान किसानों की व्यथा भी किसी से छिपी नहीं है।
सरकार द्वारा संचालित गौशालाओं की दुर्दशा इतनी बढ़ चुकी है कि सरकार की गोद में बैठा मीडिया भी इसे छुपा नहीं सका। बीते तीन वर्षों में अम्बाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल व पानीपत आदि जि़लों में स्थित इन गौ-शालाओं में सैंकड़ों गायें भूख-प्यास और बीमारी से तड़प-तड़प कर मर गईं। फरीदाबाद के निकट पाली गांव स्थित गौशाला की दुर्दशा का विस्तृत विवरण ‘मज़दूर मोर्चा’ के 11-17 अगस्त 2024 अंक में ‘संघ की गोशालाओं मेें भुखमरी से मर रहीं गायेें, कहां है गोरक्षक’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया था। इसमें दर्शाया गया था कि बड़ी संख्या में भूखी प्यासी गायों को बैठने के लिए पर्याप्त सूखी जगह न होने की वजह से कीचड़ में ही धंसे रहना पड़ता है। अंधभक्तों को छोड़ कर बाकी सुधी नागरिक बखूबी समझ सकते हैं कि भाजपा के लिए गाय एक राजनीतिक पशु है। इसके द्वारा यह पार्टी न केवल वोट की राजनीति खेलती है बल्कि गौ-तस्करों व गौमांस विक्रेताओं से मोटा माल भी मारती है।