नाटक बन कर ही न रह जाए सीवर लाइनों का सर्वे

नाटक बन कर ही न रह जाए सीवर लाइनों का सर्वे
December 16 07:19 2024

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) धनेश अदलखा भले ही विधायक बन गए लेकिन कुंए के मेंढक की तरह ही उनकी सोच अभी नगर निगम से बाहर नहीं निकल सकी है। बडख़ल विधानसभा क्षेत्र में उन्हें केवल नगर निगम द्वारा कराए जाने वाले विकास कार्य ही नजर आ रहे हैं। दरअसल, नगर निगम में कहां कहां से पैसा बनाया जा सकता है यह बात दो सौ करोड़ के घोटाले में बतौर पार्षद और वित्त कमेटी के सदस्य शामिल रहे धनेश अदलखा को अच्छी तरह से मालूम है। संभवता यही कारण है कि विधायक बनते ही उन्होंने नगर निगम अधिकारियों के साथ बैठक की न कि बडख़ल विधानसभा क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ।

अदलखा ने अपनी भ्रष्टाचारी नजर से परख लिया कि सीवर लाइन की मद में बहुत मोटा पैसा बनाया जा सकता है, सो उन्होंने बडख़ल विधानसभा क्षेत्र में सीवर लाइनें डालने के लिए सर्वे कराने का आदेश जारी कर दिया। लूट कमाई के लिए नगर निगम कम था इसलिए खट्टर सरकार ने भ्रष्टाचार में माहिर सेवानिवृत्त अधिकारियों की फौज जोड़कर एफएमडीए का गठन किया था, तो सीवर लाइन की मरम्मत करने और नई लाइनें डालने के लिए दोनों ने सर्वेे शुरू करवा दिया।

पहले एफएमडीए ने सीवर लाइनों का सर्वे शुरू करवाया क्योंकि उसके पास छह सौ मिलीमीटर व्यास या उससे अधिक वाली सीवर लाइनें हैं। बताते चलें कि एनआईटी एक, दो, तीन और पांच में सीवर लाइनें छह दशक पहले उस समय की आबादी के आधार पर डाली गई थीं, छह दशक में एनआईटी की आबादी लगभग ढाई गुना बढ़ चुकी है आबादी के हिसाब से मकानों की संख्या भी बढ़ी, इसका असर यह हुआ कि छह दशक पुरानी सीवर लाइन ओवरलोड और जर्जर होने के कारण काम के लायक नहीं बची। गौरतलब, कि कोई भी सीवर लाइन चालीस पचास साल के लिए नहीं डाली जाती, आने वाले सौ साल में बढऩे वाली आबादी और नियमानुसार बनने वाले मकानों की संख्या के आधार पर विकसित की जाती है, लंदन इसका उदाहरण है। यहां वो दूरदृष्टि नहीं दिखाई गई सीवर लाइन डालते समय भविष्य का ध्यान नहीं रखा गया। संभव है कि सीवर लाइन दस बीस साल और चलती लेकिन निगम के खाऊ अधिकारियों ने अपनी जेबें भरने के लिए खूब अवैध निर्माण कराए, पांच-पांच मंजिला इमारतें बनवा डालीं, सीवर लाइन ओर सीमित संसाधनों पर चार गुना से ज्यादा बोझ पड़ा तो चरमराना लाजिमी था। जानकारों के अनुसार पुरानी और जर्जर लाइनें हटा कर नई लाइनें डाला जाना ही समस्या का समाधान होगा।

बावजूद इसके एफएमडीए सर्वे कराने के नाम पर लाखों रुपये डकार रहा है। सर्वे के बाद भी कुछ किया जाएगा कहना मुश्किल है। पूर्व सीएम खट्टर ने 2015 में एनआईटी की सीवर लाइन डाले जाने की घोषणा की थी। तब इसका बजट 165 करोड़ निर्धारित किया गया था। तब से आज तक न तो सरकार ने बजट जारी किया और न ही नई सीवर लाइन डाली गई। रही बात पुरानी सीवर लाइन की तो आरएमसी सड़कों के नीचे दब जाने के कारण इनकी सफाई भी होना मुश्किल हो गया जिससे इनकी हालत और भी ज्यादा खराब है। जानकारों के अनुसार पूरे एनआईटी में नई सीवर लाइन ही डाली जानी चाहिए।

एफएमडीए के बाद अब नगर निगम भी सर्वे कराने में जुट गया है। दरअसल उसके पास छह सौ एमएम से कम व्यास वाली सीवर लाइनें हैं। यह भी बताया जा रहा है कि सीएम खट्टर ने जिन अवैध कालोनियों को रेगुलराइज करने की घोषणा की है उन कालोनियों में भी सीवर लाइन डाली जानी है। तो नगर निगम इसका सर्वे कराएगा। सवाल यह है कि सीवर लाइन का काम किसी एक को ही पूरी तरह से क्यों नहीं सौंप दिया जाता।

ऐसा इसलिए नहीं किया जा रहा कि भ्रष्टाचार होने पर दोनों एक दूसरे की गलती कह पल्ला झाड़ लेंगे जैसा कि पेयजल आपूर्ति में गड़बड़ी होने पर होता है। जानकारों के अनुसार सर्वे का केवल दिखावा किया जा रहा है, सर्वे करने वाली कंपनियां भी संघ-भाजपा के किसी नेता की होगी, जिसे मोटा भुगतान किया जाएगा और सबको अच्छा कमीशन भी मिलेगा। रही बात सीवर लाइन डालने की तो जब भाजपा सरकार बीते दस साल में 156 करोड़ रुपये जारी नहीं कर सकी वह और भी ज्यादा बड़े प्रोजेक्ट के लिए धन देगी, मुमकिन नहीं लगता।

हां धनेश अदलखा जनता के बीच सीवर लाइनों का सर्वे कराने को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करेगा और उसकी हां में हां मिलाने वाले अधिकारी भी जनता के सामने सीवर लाइन जल्द पडऩे का झूठ उसी तरह दोहराते रहेंगे जिस तरह से पिछले दस साल से बोलते आ रहे हैं।

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Mazdoor Morcha
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