अनुरोध शर्मा मैं नहीं जानता और, मैं ग़लत था। इन दोनों के मूल में हमारा अहंकार छिपा है कि हम सब कुछ जानते हैं, और जब हम सब कुछ जानते हैं तो हम ये कैसे कह दें कि ‘मैं नहीं जानताÓ या ‘मैं ग़लत थाÓ। —————— हमारे वक्त के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग की किताब है theory of everything जिसमें उन्होंने कहा है कि ये ब्रह्माण्ड लगातार फ़ैल रहा है। तर्क ये है कि अगर ये सीमित होता तो ग्रहों के आपसी गुरुत्वाकर्षण (एक दूसरे को अपनी ओर खींचने की ताक़त) की वजह से एक बिंदु में समा जाता। कैसे? क्यूंकि ब्रह्माण्ड के छोर के सबसे आखिरी ग्रह पर तो बाहर की तरफ़ कोई शक्ति नहीं लग रही है जो उसे खींचे। पर हांं अन्दर की तरफ़ काफ़ी पिण्ड हैं जो उसे अपनी ओर खींच रहे हैं। तो सारे बाहरी ग्रह अन्दर की ओर ही आयेंगे और उसके बाद एक के बाद एक ये सिलसिला ऐसा चलेगा कि सब कुछ अन्दर आता हुआ एक बिंदु में समा जायेगा। अब ब्रह्माण्ड तो अनंत हैं। स्टीफन हाकिंग बहुत बड़े वैज्ञानिक थे और तार्किक रूप से ये विचार सही भी लगता है लेकिन ये सही ही हो, इसे तो साबित नहीं किया जा सकता। ये बिलकुल वैसा ही विचार है जैसा कि हमने सृष्टि की शुरुआत को The Big Bang Theory से परिभाषित किया है। यानी कि सृष्टि से पहले कुछ नहीं था और फिर एक भयानक विस्फोट हुआ जिससे अनंत ग्रह, उपग्रह, पिण्ड निकले। जैसे एक छोटी चट्टान में विस्फोट करें तो हज़ारों कंकर-पत्थर दूर जाकर गिरते हैं बिलकुल वैसा ही क्चद्बद्द क्चड्डठ्ठद्द के साथ हुआ। उसकी ऊर्जा इतनी ज़्यादा थी कि आज भी ब्रह्माण्ड बाहर की तरफ फ़ैल रहा है। पर फिर भी, हैं सिफऱ् ये विचार ही, जो पूर्णत: सही हैं या नहीं, कोई नहीं जानता। कोई भी नहीं। ——————– वेदों को अपौरुषेय माना जाता है यानी कि ये किसी ने रचे नहीं हैं ये तो प्रकट हुए हैं। अब ये बात तो हजम होने वाली है नहीं। कोई रचना है तो उसका रचनाकार भी होगा। प्रकट कुछ नहीं होता। धरती से मूर्तियां प्रकट होती हैं, तो वो भी रात के अंधेरे में वहां छिपाई जाती हैं ताकि धर्म के नाम पर ज़मीन कब्जाई जा सके। इसलिए ऐसी बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। आस्था अपनी जगह है और मूर्खता अपनी जगह। दोनों का घालमेल करना ठीक नहीं, ये बेहद घातक होता है।
फिर भी, क्यूंकि हमें नहीं पता कि वेदों को लिखने वाला कौन था या वो लोग कौन थे हम नहीं जानते, तो हमने ये श्रेय ब्रह्मा को दे दिया। जैसे कबीर ने लिखे नहीं लेकिन बहुत से दोहों को हमने कबीर के नाम से चलाया हुआ है। आजकल गुलज़ार या प्रेमचंद या चाणक्य के नाम पर ऐसा ही कुछ हम देखते रहते हैं। होता क्या है कि किसी बड़े नाम से जोड़ देने से उस रचना की स्वीकार्यता बढ़ जाती है। गुजऱे ज़माने में स्वीकार्यता बढाने के लिए ये काम ब्रह्मा, विष्णु और शिव के साथ किया जाता रहा है। ——————– लेकिन ये अपौरुषेय वेद जिनके लिए कहा जाता है कि इनमें दुनिया का सारा ज्ञान समाया गया है, ये खुद क्या कह रहे हैं? सबसे पहले वेद, ऋग्वेद, में लौकिक और धार्मिक जीवन से सम्बंधित बहुत सारे सूक्त हैं जिन्हें दार्शनिक सूक्त कहा जाता है। ऋग्वेद के दार्शनिक सूक्तों में पुरुषसूक्त, वाक्सूक्त, हिरण्यगर्भसूक्त, नासदीयसूक्त प्रसिद्ध हैं। हम नासदीय सूक्त के सात मन्त्रों को पढ़ेंगे तो हैरान रह जायेंगे।
सातों मंत्र इंसान की गहरी जिज्ञासा से भरे हुए हैं। ऐसे ग्रन्थ जिन्हें हमने सिफऱ् धर्म से जोड़ दिया है वो इंसानी फलसफे के विकास की संभवत: सबसे शुरूआती सीढ़ी है। जब दर्शन या विज्ञान की बात आती है तो ना जाने क्यूं हम यूरोप के आगे इतने नतमस्तक रहते हैं जबकि जिस काल में यूरोप अन्धकार में डूबा हुआ था, तब एशिया ज़ेहनी तरक्की की ऊॅंचाइयांं छू रहा था। यूरोप की सारी तरक्की एशिया और अफ्रीका की लूट से हुई है और इन लुटेरों के आगे हम साष्टांग रहते हैं। हैरानी होती है मुझे अपने यहाँ के तरक्कीपसंद दिमागों पर।
नासदीय सूक्त इंसान की जिज्ञासा, सृष्टि के निर्माण के प्रति उसकी उत्सुकता और सवालों से भरा हुआ है। ये सात मंत्र सोचते हैं, अंदाजा लगाते हैं, जवाब देने की कोशिश करते हैं और फिर खुद ही उन सारे जवाबों को निरस्त भी कर देते हैं। अंत में ये यही कहते हैं कि भई, हम नहीं जानते। सृष्टि के निर्माण से पहले क्या था, हमें नहीं पता। सृष्टि से पहले ना सत था ना असत, ना अन्तरिक्ष, ना आकाश। जो सब कुछ आज मौजूद है वो सब कहा छिपा था? उस समय तो जल भी नहीं था कि वो सभी कुछ अपने में समा लेता।
कौन है, जो इस बात को जानता है? शायद देवता!!! नहीं, वो नहीं जानते। या शायद सृष्टि का अध्यक्ष (इंद्र)!!! ना, वो भी नहीं जानता। सृष्टि का रहस्य कोई नहीं जानता, कोई भी नहीं। —————— वेद, जिन्हें कुछ अज्ञानी सम्पूर्ण ज्ञान की खान मानते हैं वो बिना किसी हिचक के अपने अज्ञान को स्वीकार करते हैं। वेदों के रचनाकारों में कोई अहंकार नहीं। वो तो खुलकर कहते हैं कि ना तो हम सृष्टि का रहस्य जानते हैं और ना ही हमारा सबसे बड़ा देवता इंद्र ही इससे वाकिफ़ है। इससे ज़्यादा अपने अज्ञान का स्वीकार और क्या होगा? इससे ज़्यादा विनम्रता कोई कैसे दिखाएगा? आज किसी आस्थावान की हिम्मत है कि वो ये कह सके कि ईश्वर नहीं जानता या अल्लाह नहीं जानता या गॉड नहीं जानता। आस्था के ये खाली कनस्तर सब कुछ जानने का दावा करते कितने हास्यास्पद नजऱ आते हैं, इन्हें खुद नहीं पता। वैसे याद रखिये कि सूक्तों में जो ये कहे गए हैं, ये मंत्र कहलाते हैं, श्लोक नहीं। मंत्र और श्लोक में फ़र्क होता है। इस फ़र्क को जानने के लिए किसी अच्छे स्रोत को देखें। मैं यहां नहीं बता पाऊंगा क्यूंकि, ……… मैं नहीं जानता। ——————-
लिटरेचर तो हो जाता है और एसएस बेकार है इसलिए हम उन्हें ज़्यादा नहीं पढ़ाते ये बात शब्दश: एक कोचिंग स्कूल के संचालक ने मुझसे कही थी। एसएस का मतलब सोशल साइंस या सामाजिक विज्ञान। उनके हिसाब से सिवाय विज्ञान और गणित के कोई और विषय पढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। वो तो हो जाते हैं। हो जाने से उनका मतलब है कि रट लो तो नंबर आ जायेंगे। और क्या चाहिए? ज़्यादा से ज़्यादा नंबर ही तो हमारा लक्ष्य है।
साहित्य-फाहित्य हम मानते ही नहीं हैं। इतिहास बकवास है। दर्शन को तो पढ़ाना ही बंद कर देना चाहिए क्यूंकि ‘मैं कौन हूं और कहां से आया हूंÓ ऐसे सवाल वो लोग करते हैं जो फ़ालतू बैठे हैं।
हे परम ज्ञानियों! ये जो तुम सुबह से शाम विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना की रट लगाए रहते हो, क्या तुम ये नहीं जानते कि विज्ञान की पैदाइश दर्शन से हुई है। —————— इंसान की समझ विकसित हुई है तो वो क्या सिफऱ् एक विषय के सहारे हुई है। प्रकृति ने तो ये नहीं कहा था कि तुम मुझे अलग-अलग विषयों में बांंट दो। ये तो हमने हमारी सहूलियत के लिए अलग अलग विषयों के खांचे बना दिए हैं। वरना सम्पूर्णता में देखा जाए तो प्रकृति को समझने के लिए हमें विज्ञान, दर्शन, इतिहास, कला, साहित्य, भाव, तर्क सभी की ज़रूरत पड़ेगी।
अब अचानक से आप खड़े होकर ये कह दो कि हम तो ना दर्शन मानते, ना साहित्य, ना इतिहास और ना भाव.. तो मत मानो। जो कटौती होगी वो आपके व्यक्तित्व में होगी। कुदरत तो सम्पूर्ण है और बिना सम्पूर्ण को जाने कुदरत को नहीं जाना जा सकता। ठीक है, अब सब पेट भरने के लिए कंप्यूटर या बिजनेस ही पढऩा चाह रहे हैं लेकिन वो बाकी सब विषयों को खोकर जीवन में जो खो रहे हैं, उसका अंदाजा तो उन्हें नहीं है। और तिस पर भी उनका ये गर्व कि हम सब कुछ जानते हैं।
नहीं, आप सब कुछ नहीं जानते। ——————- दुनिया के सबसे महान दार्शनिकों में से एक सुकरात ने कहा कि वही ज्ञानी है जो ये जानता है कि वो नहीं जानता। उसकी बात उसके शिष्यों अफलातून (प्लेटो) और अरस्तू ने दोहराई। मुझे ये बात पहले से पता थी लेकिन ये अधूरी बात है। पूरी बात मैंने कल ही पढ़ी जिससे मुझे ये पता चला कि अधूरा ज्ञान नुकसान करता है।
पूरी बात ये है कि एक ज्ञानी कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो ये स्वीकार करता है कि वो बहुत कुछ नहीं जानता और यही स्वीकार उसे कष्ट देता है। उसके मन ये ये तड़प पैदा करता है कि वो जो कुछ नहीं जानता उसे जानने का प्रयास करे। दार्शनिकों ने पहले-पहल ये सोचना शुरू किया कि ‘मैं कौन हूंँ और कहां से आया हूं और सदियों तक इस सवाल से लड़ते-भिड़ते बात यहाँ तक पहुंच गयी कि इससे समूचे विज्ञान का जन्म हुआ। ————————– मानव सभ्यता का सारा विकास ‘ना जानने के स्वीकार पर टिका हुआ है। ये स्वीकार ही सवालों को पैदा करता है। इस दिमाग को सवालों की खान होना चाहिए। जवाब तो मिल ही जायेंगे। मुश्किल तो तब होगी जब हमारे दिमाग में सवाल उपजना ही बंद हो जायेंगे।