फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) घोटालों का गढ़ बन चुके नगर निगम पर चोरी का आरोप था कि पेयजल आपूर्ति में क्लोरीन नहीं मिलाते। इन चोरों से पीछा छुड़ाने के लिए खट्टर ने ‘ईमानदार’ एफएमडीए का गठन किया और उसे ही शहर की पानी आपूर्ति का जिम्मा सौंप दिया गया। एफएमडीए वाले तो और बड़े चोर निकले, क्लोरीन का पैसा ही हज़म करने लगे।
नगर निगम पे चोरी का आरोप था कि वो क्लोरीन नहीं डालते हैं तो उससे काम छीन कर एफएमडीए को दिया गया, वो तो नगर निगम से भी बड़े चोर निकले। उनके आने के बाद न तो पेयजल आपूर्ति में कुछ सुधार हुआ है और न ही पानी का क्लोरीनीकरण कर उसे विसंक्रमित किया जा रहा है। नगर निगम और एफएमडीए के अधिकारी ये आंकड़े ही नहीं दे पा रहे कि शहरवासियों को विसंक्रमित और किटाणुमुक्त पेयजल आपूर्ति करने के लिए प्रतिदिन कितनी क्लोरीन का उपभोग किया जा रहा है। अधिकारियों की हरामखोरी के कारण ही शहर की सत्तर प्रतिशत आबादी नगर निगम द्वारा आपूर्ति किए जाने वाला दूषित जल पीने को मजबूर है।
गर्मी और बरसात के मौसम में जल जनित बीमारियां तेजी से बढ़ती हैं। इसके मद्देनजर जन स्वास्थ्य विभाग ने नगर निगम द्वारा शहर के ट्यूबवेलों से आपूर्ति वाले पानी के 130 नमूने भरे थे। एक सप्ताह पहले आई रिपोर्ट में इनमें 90 नमूने फेल निकले, यानी इन नमूनों में क्लोरीन की मात्रा पूरी तरह से नदारद थी।
जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा पानी के नमूनों में पल्ला के ट्यूबवेल नंबर एक, तीन और चार, गांव गोंच्छी, एसी नगर, राम नगर, सेक्टर-14 टयूबवेल, पंडितों का मोहल्ला बडख़ल, सेक्टर 18, भीम बस्ती और डबुआ के नमूने फेल पाए गए। सुधी पाठक जान लें कि दस हजार लीटर पानी को विसंक्रमित करने के लिए एक किलोग्राम क्लोरीन तरल या पाउडर की जरूरत होती है। नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार शहर में प्रतिदिन 1818 ट्यूबवेलों से 91 एमएलडी पेयजल की आपूर्ति की जाती है। यानी इतने पानी को विसंक्रमित करने के लिए प्रतिदिन 9100 लीटर क्लोरीन की आवश्यकता है।
क्योंकि जन स्वास्थ्य विभाग ने केवल ट्यूबवेल द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले पानी का नमूना लिया था और इनमें सत्तर प्रतिशत नमूने फेल आए थे। यदि इस आधार पर देखा जाए तो 1292 ट्यूबवेल बिना क्लोरीन के चलाए जा रहे हैं यानी इन ट्यूबवेलों में प्रतिदिन 6300 किलोग्राम क्लोरीन की बंदरबांट की जा रही है।
समझने वाली बात यह है कि शहर में प्रतिदिन 219 मिलियन लीटर डेली (एमएलडी) पानी की आपूर्ति एफएमडीए और नगर निगम द्वारा की जाती है। यानी प्रतिदिन 21 हजार 900 लीटर क्लोरीन की आवश्यकता होती है। बाजार में क्लोरीन का सबसे कम थोक भाव 16 रुपये प्रति किलोग्राम है। इस आधार पर प्रतिदिन 219 एमएलडी पानी विसंक्रमित करने के लिए न्यूनतम तीन लाख 50 हजार 400 रुपये की क्लोरीन लगती है, यानी प्रतिमाह एक करोड़ 5 लाख 12 हजार रुपये।
पानी के 130 नमूनों में से 90 के फेल होना बताता है कि कागजों पर तो क्लोरीन का उपभोग दिखाया जाता है लेकिन हकीकत में नहीं। पाठक अंदाजा लगा सकते हैं कि पानी के क्लोरीन विसंक्रमीकरण के नाम पर अधिकारी क्या खेल कर रहे हैं। नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार क्योंकि पानी की आपूर्ति एफएमडीए करता है, पानी को विसंक्रमित करने के लिए क्लोरीन मिलाना एफएमडीए का ही काम है, नगर निगम तो केवल बूस्टरों के जरिए घरों तक पानी पंहुचाता है। नगर निगम इसलिए पानी में क्लोरीन नहीं मिलाता कि एफएमडीए डालता है। यदि यहां भी मिलाया गया तो क्लोरीन की मात्रा दोगुनी हो जाएगी जो सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकती है। खैर, जनता तो खाऊ नगर निगम और उससे भी बड़े हरामखोर एफएमडीए की धींगामुश्ती में दूषित पानी पीने को मजबूर है।