अनन्या सजने -धजने के अवसर का लॉजिक देके करवाचौथ को justify मत कीजिए ना ही डिटॉक्स करने वाला लॉजिक देकर इसे scientific certificate दीजिए। और खुद की मर्जी के कुतर्क भी ना दें, सोची समझी साजिश है ये भयंकर पेट्रियारिकी छिपी है जिसे जश्न के माहौल में छिपाया जाता है और औरतों को बेवकूफ बनाया जाता है। कभी कपड़ों पर सेल निकाल करके,कभी छुट्टी करके।
कहानी, बिंदियां, कंगना, मेंहदी ये सब साजन के प्रेम के लिए नहीं बल्कि साजन की गुलामी के लिए है। ऐसा आदमी जो बराबरी से बात नहीं कर सकता है,जो कभी भी अपमान कर सकता है, जो प्रेम और पति व्रत के नाम पर अपने कच्छे तक धुलवाता है, मार पीट भी सकता है और जो कभी भी किसी के भी सामने पत्नी को बेवकूफ साबित कर सकता है उसके लिए करवाचौथ नहीं बल्कि विरोध करना चाहिए। अपने आस -पास खंगाल कर देख लीजिए इन व्रतों से बिगड़ैल पतियों का सुधरने का कोई चांस नहीं है,और न ही ये व्रत कोई मुहब्बत का गारंटी कार्ड है, न ही इससे पतियों की उम्र लंबी होती है अगर आंकड़ों को ध्यान में रखा जाए तो साफ़ पता चलता है कि भारतीय लोगों से बाहर देशों के लोग लम्बा जीवन जीते हैं जबकि वहां ये व्रत भी नहीं रखा जाता है। खैर थोड़ा सामने वाले को इंसान मानकर इंसान की तरह बात करके देखिए तब पता चलेगा कितनी मुहब्बत है और जीया जाने वाला एक -एक दिन कितना सुंदर है।अपने जीवन साथी के प्रेम करने के लिए व्रत की जरूरत नहीं होती आपसी समझ की जरूरत है एक- दूसरे का साथ दीजिए, प्यार से बोलिए, एक- दूसरे का ब्लड-प्रेशर न बढ़ाएं उम्र भी लम्बी हो जाएगी और वो भी दोनों की।
वैसे इधर कुछ सालों में एक और चलन आया है कि अब तो पति भी अपने प्रेम को जाहिर करने के लिए पत्नियों के लिए व्रत रखते हैं मतलब एक गलत चीज को दूसरी गलत चीज से संतुलित करना, इससे से वो खुद को तो अच्छा और संवेदनशील तो महसूस कर लेंगे पर इससे पितृसत्तात्मक सोच खत्म नहीं होती। काश, के थोड़े से अच्छा बनने की कोशिश करने वाले पतियों को प्रेम जाहिर करने का कोई दूसरा प्लेटफार्म भी सूझे और प्रेम में पुजारिन बनी पत्नियों को थोड़ी सद्बुद्धि मिले, न्याय की नजर मिले ताकि वो व्रत, त्योहार, श्रृंगार के पीछे छिपी चालाकियों को पहचान पाएं। अपनी जबान में कहें सच-सच जो चाहती है जो महसूस करती है वो भी बिना किसी तीज-त्योहार व्रत और श्रृंगार के बहाने से। केवल समर्पण नहीं सम्मान को भी महसूस करके देखें, पति पत्नी के रिश्ते में ये भी संभव है । बराबरी ज्यादा खूबसूरत बनाती है इस संबंध को।
आज के बेटों और कल होने वाले पतियों को थोड़ी सद्बुद्धि मिले और वो जिम्मेदारी ले अपने संबंध को गरिमामय बनाने की । और कम से कम पढ़ी लिखी लडकियां इसमें शामिल ना होकर अपनी ज़हानत का परिचय दें और संवाद करें । ये कोई इतनी मासूम सी चीज नहीं है कि इसे बार-बार इमोशन से जोडक़र देखा जाए और बेचारा समझ कर छोड़ दिया जाए। मजबूत तर्क के साथ दूसरों से इस बारे में बातचीत कीजिये।