या तो मैं कविता लिखता हूं…

या तो मैं कविता लिखता हूं…
October 25 06:34 2025

डॉ रामवीर 

या तो मैं कविता लिखता हूं
या लिखता हूं व्यंग्य
इन दो से ही मेरे दोस्त
हो जाते हैं तंग।

तंग हरेक नहीं होता है
कुछ होते हैं दंग
कैसी भी हो उठती तो है
मन में कोई तरंग।

क्या लेखन की विषयवस्तु है
क्या लेखक का विचार
तदनुसार ही प्रकट करता है
लेखक स्व उद्गार।

कुछ जन वैचारिक अन्तर को
मानें जैसे पाप
उनके वश में हों तो दे दें
दुर्वासावत् शाप।

मैं कहता हूं मैं तो मैं हूं
और आप हैं आप
भिन्न भिन्न होता है सबके
दिलो-दिमाग का नाप।

हर इन्सां की शक्ल अलग है
अलग है सबकी अक्ल
कुदरत की ऐसी ही मर्जी
व्यर्थ है देनी दख्ल।

गिने चुने कुछ ही क्षेत्रों में
सहमति होती वांछित
घृणा द्वेष दुर्भाव आदि में
समता कतई अवांछित।

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